कवितावार में मंगलेश डबराल की कविता :: https://www.youtube.com/watch?v=8ee5XNyAsKw&feature=youtu.be इन सर्दियों में पिछली सर्दियाँ बहुत कठिन थीं उन्हें याद करने पर मैं इन सर्दियों में भी सिहरता हूँ हालाँकि इस बार दिन उतने कठोर नहीं पिछली सर्दियों में मेरी माँ चली गई थी मुझसे एक प्रेमपत्र खो...
कविता :: देवेश पथ सारिया पेड़ हलाक होते हैं, शहीद नहीं एक इमारत के निर्माण के लिए धरती समतल करने को उन्होंने काट डाला बाँसों का झुरमुट आँधी और बरसात के समय उन बाँसों की चीत्कार से जो लड़की डर जाती थी सबसे ज़्यादा दुखी वही हुई उनके काटे जाने पर और...
कविताएँ :: मनीषा जोषी स्त्री बस स्टेशन के सार्वजनिक शौचालय की दीवार पर पहली बार पढ़ा था मैंने— तेरी माँ की योनि उस वक़्त वहाँ बस स्टैंड के एक कोने में चाय की एक दुकान थी और उसकी बग़ल में था एक अख़बार विक्रेता का स्टॉल तब से...
कविताएँ :: कुशाग्र अद्वैत बहुत नहीं जीना गई सर्दियाँ आख़िरी सर्दियाँ थीं उतनी ख़ुशनुमा कहाँ पता था आख़िरी-सा लगता वह चुम्बन सचमुच, आख़िरी हो जाएगा किसी भी क्षण थम जाएँगे हाथ जो देते रहे थाप, बजाते रहे जीवन ढोलक चलते-चलते थकेगा, रुक जाएगा यह गतायु लोलक एक पेड़ छतनार ढाँप देगा झरोखे से तनि-तुनि दिखता बदराया आकाश आएगी तुम्हारी सिरफिरी...
कविताएँ :: सुदीप्ति प्रेमिकाएँ पहले-पहल वे बोलती हैं तो फूल झरते हैं। शुरू-शुरू में जब उनकी नज़रें उठती हैं तो हवाएँ भी दम साध लेती हैं। फिर? फिर और ज़रूरी काम आ जाते हैं। और फिर कई सारे ग़ैरज़रूरी मसले भी उतने ही गंभीर हो उठते...
कविता :: कृष्ण कल्पित डूब मरो मैं तुम्हारे तलुओं पर जैतून के तेल की मालिश करना चाहता हूँ जिन हाथों से थामा था तुमने साइकिल का हैंडल मैं उन हाथों को चूमना चाहता हूँ गुरुग्राम से दरभंगा तक अपने घायल पिता को कैरियर पर बिठाकर ले जाने वाली...