लंबी कविता ::
अंचित

क़ुबूलनामा : आख़िरी कविता
असु के लिए
निराशा के भँवर देखने मैं जिस नदी की ओर जाता था,
जहाँ वह बनते और फिर उसी प्रवाह में घुल जाते थे,
वह अब बहुत दूर चली गई।
मैं वह घाट नहीं अब जिसको सहलाने
वह क्षण भर रूकती, ठहरती, थोड़ा टूटती, सँभलती, सँभालती
अपनी यात्राएँ बनाती, पूरी दुनिया में फैलती थी।
अपना अतिक्रमण ख़ुद मुझसे अनदेखा रहा और
मैं शहरों की तबीयत की माफ़िक़ बढ़ता गया—बढ़ता गया
भूलता लाल रौशनी में खिली वह बरसाती शामें
जिनके बदले मैं इतराता एक दिन नीली रौशनी ख़रीद लाया।
इसमें तुम्हारा क्या दोष रहा कि
सभ्यता के सबसे गहरे कोनों में दबी अमानुषिक अनुभूतियाँ मैं चाहता था
यह जानते हुए कि मैं तुम्हारी हत्या कर रहा हूँ।
इस बड़ी जेल के भीतर एक छोटी जेल है
जिससे कोई रिहाई नहीं मिलती
इसलिए मैंने जितनी कविताएँ लिखीं,
उनका कोई अर्थ नहीं बनता
इसलिए मैंने जो भी जीवन जिया उसका भी।
स्मृति आती है चाबुक की तरह,
याद दिलाती है उम्मीदों का जश्न
जिनके बरअक्स अब हताशा के लंबे आख्यान रखे हुए हैं।
मैंने तुम्हें खो दिया है,
बिसरती तुम दूर दीयर की ओर चली गई हो
जो जितनी जगह लेता है, उतनी छोड़ता है
जितना तुम सहलाती हो, उतना सहलाता है
वहाँ लाशों की कोई गंध नहीं है
सड़े मुर्दे, गंदा पानी—
कुछ बहता हुआ नहीं आता
दुनिया के होने का एक आदर्श स्वप्न जो सिर्फ़
मेरी कल्पना में बचा है, संशयों से टकराता, पीठ पर कोड़ों के निशान की तरह,
धौंकते सीने में रिसते धुएँ की तरह, काँपते हाथों पर किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की तरह
कि मैं अब अपने टूटने की गति से भी उकता गया हूँ।
जिनके पास अभी भी आशा बची है, वे पहली पंक्ति में खड़े हों, वे दुनिया बचा पाएँगे
जो कायर नहीं हैं, वे युद्ध में जाएँ कि उनको लड़ना आता है
लेकिन यह अंतिम सत्य बना रहे कि कई बार कोई कवि
अधूरी ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर मर जाता है,
फिर याद नहीं आता
कि ज़िंदगियों में कई बार लगता है कि वबा टूटकर बरसी है,
आख़िरी वबा तक।
यह तुम्हारा दर्द है, पागल दिल बहादुर बनो, कहकर निराशाएँ समेटता आदमी
किसी और से नहीं हारता—
वह अपनी की हुई हत्याओं के बोझ से दब जाता है एक दिन,
एक साधारण दिन जब धूप निकलती है,
लोग-बाग़ काम पर जाते हैं, चिड़िया बोलती है,
संगीत बजता है, तुम नई ऊर्जा से भरी, मिलने निकलती हो किसी से, प्रेम से भरी
उस ओर, जिधर वह तुम्हारा इंतिज़ार करता है जो तुममें भरोसा करता है,
जिससे तुम जुड़ गई हो वैसे, जैसे पेड़ों की छाया में घनी घाम में निकला
कोई टेक पाता है।
मैं कुछ नहीं हो सका तुम्हारे लिए,
किसी उत्साह से नहीं, स्वीकार से कहता हूँ
मेरे पास हद से हद एक डिस्प्लेस्ड मेटाफर है,
एक नाम से बदला हुआ एक दूसरा नाम,
जिससे वह घाव बना है जो मैंने तुम्हें दिया है
हद से हद एक रहस्य जो अब लेकर मैं यहाँ से बहुत दूर चला जाना चाहता हूँ
मुझे दिखने लगी हैं मेरी दी गाँठें उनकी देह पर
जिन्होंने मुझसे नि:स्वार्थ प्रेम किया और मेरे बाद भी भोगेंगे उनके दुख।
मैं यही छोड़कर जा रहा हूँ यहाँ पीछे
जो जितनी जल्दी बिसर जाए, सबसे अच्छा हो,
इसलिए अच्छा है भूल जाना सब बीते सालों का घटा हुआ,
यह मान लेना कि मैंने कितनी चतुराई से झूठ बोला
इतने बरस कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।
मैंने जो फैंटेसी बनाई थी,
स्वप्नों और यथार्थ को जोड़ते हुए अपने लिए
जहाँ मुझे लगा था, वह चक्रव्यूह खुल जाएगा
कि फिर बरसाती शामों में लाल रौशनियाँ जगमगाएँगी
कि मेरे पास देने के लिए एक उत्तरोत्तर समाधान होगा
जो पूरी सदी पर पसर जाएगा
वह भी खोखली थी, मेरी कायरता की तरह।
अब मान लेना चाहिए
कि मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकता था
सिर्फ़ चाह सकता था जैसे पुरुष चाहता है, जैसे शहर चाहता है
जैसे सरकारें चाहती हैं पहाड़ों से, नदियों से, हर मेहनतकश आदमी से
उनका होना भी छीन लेना।
कम से कम तीन हत्याओं का दोषी,
हँस सकता है अपनी निराशा में छिपी उम्मीद देखकर
कि जीवन ही सारे खेल खेलता है,
मजनूँ को निपट सुनसान में भी लैला दिखा देता है,
और देता है बरकत मुक्ति की—
“मुझे उधर ही ले चलो…
कोई हाथ थामता नहीं दीखता
मैं अकेला ही जाऊँगा उधर
माँगता साँसों के चलने तक विस्मृति का वरदान”
हारे हुए सैनिक नहीं जाते वल्हाला
हारे हुए लोगों की कोई जन्नत नहीं होती।
कितनी सुंदर हैं
सुंदर अंत की कल्पनाएँ
कि मैदान-ए-जंग में बादशाह
तुम्हारे होंठों पर तीर मारे
कि किसी विद्रोह में तुम कुचल दिए जाओ
हाथियों के पैर से
कि प्रेयसी के शानों पर तुम्हारा दम निकले।
इसलिए स्वप्न कविताओं का कोई अर्थ नहीं है
न उन बेनामी उदासियों का
जिनसे मैं बन-सँवर रहा था—
आख़िरकार सूखी लकड़ियाँ हैं,
एक दुबली-पतली पीली काया
धूल में लिथड़ी हुई, हरी चादर से लिपटी हुई,
लावारिस कि उसका कोई घर नहीं है
भले ही कोई बाप रहा हो नेपथ्य में अपने कलेजे को रगड़ता,
भूरी-भरी आँखों से इंतिज़ार करता
भले ही कोई माँ रही हो गीत-गोविंद की पंक्तियाँ गुनगुनाती,
अपनी सूनी आँखों से कोई मूर्ति देखती, फूट-फूट पड़ती
और उसके पीछे तुम्हारी निर्मम हँसी की छाया—
देह में पल रही किसी बीमारी की तरह
जो दाढ़ से भी आने की घोषणा कर सकती है
और पीठ के दर्द भर में निपटा सकती है,
जो धोखों की तरह वार करती है औ
र दबोचती है समुद्र और दुश्मन के बीच,
बमों की तरह आसमान से गिरती है।
यह सब छोड़ देना होता है पीछे
कि यह तुम्हारा बदला नहीं है।
भाषा में सब नहीं कहा जा सकता,
नहीं समेटा जा सकता त्रासदी का हर चिह्न
तुम्हारे उगने को मैंने ठीक से पहचाना नहीं,
स्वीकार करता हूँ
तुम जो कोमलता चाहती थीं,
मैंने उसे भ्रमों से बदल दिया, स्वीकार करता हूँ
तुम जो सत्य माँग रही थीं मुझसे,
मैं नहीं दे सका तुम्हें।
अब देर हो गई।
फिर भी
तुम्हारे भीतर कोई हत्यारा नहीं था,
समर्पण था, जो पढ़ने लायक नहीं था मैं
मैं जिस मौत मारा जा रहा हूँ
उसमें दुनिया, सरकारें, नौकरियाँ शामिल हैं
कि तुम्हारे बग़ैर की, कोई कल्पना नहीं है मेरे पास,
इतना भर, मैं हर क्षण जानता था।
तुमको अब नए रास्ते जाना है
जहाँ मेरा कोई चिह्न नहीं है
तुम अपनी मुश्किलों से निपट लोगी कि तुमको नए साथी मिलेंगे
या बिल्कुल अकेली भी, अपने होने के दंभ से भरी, मेरी आदर्श स्मृति की तरह,
गढ़ोगी नए गीत इस नए समय में।
मैं रात के आख़िरी दीये की तरह बुझ रहा हूँ
डूबती अँजोर में समेटे तुम्हारा प्यार कि एक दिन एक ख़ाली क्लासरूम में
हरा दुपट्टा ओढ़े, काले स्वेटर वाली फ़रवरी में, साथ न होने की आशंका ने हमें
एक अनचीन्हे भय से भर दिया था और हमारी आँखें भर गई थीं।
कितना सुंदर उजास था तुम्हारे चेहरे पर उस दिन…
अंचित से परिचय के लिए यहाँ देखिए : इस स्वप्न में—मैं एक बादल हूँ