कविताएँ ::
हर्षित मिश्र

हर्षित मिश्र

संभाव्यता

तुम संयोगों की भीड़ में
एक अप्रत्याशित घटना की तरह आईं
जिसके घटित होने की संभाव्यता
हर गणना में शून्य के समीप लिखी जाती थी
फिर भी तुम
मेरे जीवन की आकस्मिकता बनकर
धीरे-धीरे हर धड़कन में फैल गईं।

मैं एक साधारण परिणाम
जो अपने अकेलेपन के सूत्र में उलझा था
पर तुम्हारी प्रीति
एक अनदेखे प्रमेय की तरह
हर असंभव को संभावित बनाती रही।

तुम्हारे आने से
मेरे हृदय की प्रत्येक अनिश्चितता
संघटित होती गई
जैसे किसी असंगत शृंखला में
हर अंक अचानक संतुलन पा ले।

हमारा मिलन
एक अनिश्चित गणना का परिणाम
जहाँ अपेक्षित मूल्य तो शून्य के निकट
पर आशा अनंत अंकों तक फैली हुई
एक अंतहीन श्रेणी बन गई।

जब तुम हँसती तो लगता
असंभव घटना घट गई हो
और मैं उस चमत्कार का
साक्षी बन जाता।

पर नियति ने
हम दोनों को स्वतंत्र घटनाएँ मान लिया
और दूरी बढ़ते ही
मिलन की संभावना धीरे-धीरे
कम होती चली गई।

विरह एक शर्तबद्ध सत्य
जहाँ हर क्षण प्रेम का मान
धीरे-धीरे घटता हुआ दिखता है
फिर भी मेरी आत्मा में
स्नेह का संभाव्य अंतराल
कभी शून्य तक नहीं गिरा।

प्रेम किसी गणितीय क्षेत्र का बंधन नहीं
यह संभाव्यताओं का मुक्त आकाश है
जिसमें हर न्यूनतम संभावना भी
एक जीवंत आशा बनकर चमकती है।

किसी भविष्य-क्षण में यदि नियति
अपने प्रयोग बदल दे तो शायद हम
दो पृथक घटनाएँ नहीं
एक-दूसरे का पूर्ण समुच्चय बन जाएँ।

और यदि ऐसा न भी हुआ
तो भी मैं हर जन्म में
एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर लौटूँगा
ताकि तुम उत्तर बनकर
कभी तो
मेरे भीतर घटित हो सको।

और तब मेरी आत्मा की
हर अनिश्चित धड़कन
तुम्हारी प्रीति में परिवर्तित हो
बार-बार
हर जीवन में
अनंत तक।

अचानक

हर आकाशगंगा अपनी गति में धैर्य रखती है
हर तारा अपनी पथ-यात्रा में गहन रहस्य समेटता है
और जो हम अचानक मान बैठते हैं
वह केवल समय की धीमी समझ का परिणाम होता है।

धूमकेतु जब रात के आकाश में चमकता है,
हम सोचते हैं कि यूँ ही आ गया होगा
पर उसने तो वर्षों पहले
अपना मार्ग मोड़ लिया था
हमारी ओर लौटने के लिए।

भूकंप जब धरती को हिला देता है
हम घबरा जाते हैं कि यह क्या हो गया!
पर गहराइयों में चट्टानें
कब से अपनी ऊर्जा और संभावनाओं को
जमा करती आ रही थीं।

समुद्री लहरें जब अचानक मुँह खोल देती हैं
हम समझते हैं कि समुद्र क्रोधित हो गया
पर हवा की योजनाएँ
कबसे उसकी सतह पर बह रही थीं।

कोई ग्रहण जब दिन में अंधकार कर देता है
हम कहते हैं कि यह असामान्य है
पर आकाश का गणित
बहुत पहले तय कर चुका था
कि सूर्य और चंद्र एक रेखा में मिलेंगे ही।

सब कुछ जिसे हम ‘अचानक’ कहते हैं
वह समय की सबसे धैर्यवान् चाल होती है।

और तुम—
तुम मेरी ज़िंदगी में अचानक कहाँ आईं?

तुम्हारे आने से पहले
मेरे भीतर ऋतुएँ बदल चुकी थीं
शरद ने चुपचाप
मेरी भावनाओं के ताल में
चाँद का प्रतिबिंब रख दिया था
जैसे वह बता रहा हो कि
कोई रोशनी आने वाली है।

हेमंत ने सूखे पत्तों की सरसराहट में
मेरे मन को भर दिया था
कि सिर्फ़ सन्नाटा ही नहीं
कहीं कोई क़दम भी है
जो अभी सुनाई नहीं देता।

शीत ने धुंध की मोटी परतों से
मेरी दिशा छीन ली थी
शायद इसलिए
कि रास्ता बदलने वाला था।

और फिर
बिना किसी उद्घोषणा
बिना किसी ज्ञापन
वसंत लौट आया।

बयार में कोई नई महक थी
दरख़्त बिना कारण मुस्कुरा उठे थे
और मुझे कुछ समझ नहीं आया
जब तक तुम
मेरी आँखों के सामने
पहली बार नहीं आईं।

फूल अचानक नहीं खिलते
बीज बहुत पहले बो दिए जाते हैं।

तुम मेरे जीवन का चमत्कार नहीं
चमत्कार की लंबी प्रतीक्षा का परिणाम हो।

तुम्हारा प्रेम
शायद मेरे हिस्से में नहीं लिखा
पर तुम्हारा आना
मेरे भीतर आए वसंत की
सबसे गहरी सचाई है।

और अगर एक दिन
तुम चली भी जाओ
तो मौसमों के चक्र में
वसंत लौटता ही है…

तुम्हारे नाम की किसी सुगंध के साथ
फिर—
और फिर—
बार-बार।

धूल—एक विरह-वृत्तांत

धूल एक विरह-वृत्तांत है
प्रेम के सूने पड़ चुके आँगन से उठी
साँसों की खोखली गलियों में भटकती हुई
हर वस्तु पर वैसे ही बैठ जाती है
जैसे बिछुड़ने के बाद तुम्हारी यादें
चुपचाप दिल के किसी कोने में टिक जाएँ।

धूल बोलती नहीं
पर हर अधूरी बात की भाषा जानती है
वह अधखुला ख़त
जिसमें मैंने ‘प्रिय’ तक ही लिखा था
या वह तस्वीर जिसमें तुम मुस्कुरा तो रही थीं
पर मेरी ओर नहीं देख रही थीं।

हर प्रेम का कफ़न धूल ही बनती है
वही तो ढकती है
वे पल
वे जगहें
जहाँ हमने
चुप रहकर सबसे ज़्यादा कहा था।

स्मृति की भी एक उम्र होती है
पर धूल वह तो उम्र के पार रहती है
वह न शिकायत करती है
न पुकारती है
बस उतर आती है
एक उदासी की तरह
जिसे हटाते नहीं
बस सह लेते हैं।

सँभालकर रखा जाना चाहिए
धूल का यह विरह-वृत्तांत
ताकि हम याद रख सकें
कि प्रेम कभी मरता नहीं
वह बस किसी पुरानी किताब में
धूल बनकर रह जाता है।

डार्क मैटर में प्रेम

मैंने तुम्हें कभी छुआ नहीं
फिर भी
तुम मेरी समस्त गति में सम्मिलित रहीं
जैसे डार्क मैटर
जो स्वयं अदृश्य होकर भी
पूरा ब्रह्मांड थामे रखता है।

तुम्हारे बिना
मेरे मन की परिक्रमा विक्षिप्त हो गई है।

अब भावनाएँ
प्रकाश की गति से दौड़ती हैं
और अर्थ
किसी प्राचीन आकाशगंगा की छाया में
कहीं पीछे छूट जाते हैं।

तुम्हारा न होना
कोई रिक्तता नहीं है
वह एक ब्लैक होल है
जिसमें स्मृतियाँ
प्रकाश की अंतिम किरण की तरह
धीरे-धीरे समा जाती हैं।

जब तुम थीं
मैं एक मुख्य अनुक्रम तारा था—
स्थिर, संतुलित, उद्दीप्त!

अब मैं एक सुपरनोवा हूँ
चमकता हुआ मलबा
जिसका तेज़ क्षणिक है
और नियति—बिखराव।

हमारा समय
शायद किसी वक्र समय-रेखा पर रहा
जहाँ मिलन केवल एक क्षण था
और विरह एक दीर्घ अंतराल।

अब मेरी प्रत्येक भावना
एक क्वासार बन गई है
एक दैदीप्यपूर्ण पुकार
जो किसी अनाम निहारिका की ओर
निरंतर गति कर रही है

और इस सघन अंधकार में
यदि कहीं कोई तितली
किसी ब्लैक-होल के क्षितिज पर
अपने पंख फड़फड़ाती है
तो शायद वह तुम हो
जो अब भी
मेरी विसंगतियों में
एक कंपन भर देती हो।

कॉस्मिक स्केल पर मनुष्य

इस विराट शून्य में
हमारी आवाज़
रोशनी की गति से भी
धीमी पड़ जाती है।

गैलेक्सियों की परिक्रमा में
हमारा अस्तित्व
सिर्फ़ आँकड़ों की त्रुटि भर है
और हमारा इतिहास
एक कण से गिरती धूल
जो प्रकाशवर्षों की दूरी तक
कहीं दर्ज नहीं होता।

सभ्यता का गौरव
एक तारे की तरह फैलता है
फिर अपने ही गुरुत्वाकर्षण में
धँसने लगता है।

हम अपनी ऊँचाई पर पहुँचकर
अपने भीतर के अंधकार से हारते हैं
जहाँ अहंकार
हाइड्रोजन को भी राख कर देता है
और मनुष्य
एक मृतप्राय तारा बन जाता है।

स्पेस-टाइम की तहों में हर संभावना
अनिश्चितता सिद्धांत की तरह डगमगाती है।

डार्क एनर्जी की अदृश्य पकड़ में
हमारी दिशाएँ असंतुलित हो जाती हैं
और भविष्य एक ऐसा समीकरण बन जाता है
जिसे हल करने से पहले
हर उत्तर समाप्त हो चुका होता है।

पर सुपरनोवा बताता है कि विनाश
पूर्ण विराम नहीं होता
सब कुछ विखंडित होकर भी
प्रकाश को जन्म देता है
सिंगुलैरिटी के अंधे कोटर में भी
एक संभावना अपनी पहली साँस लेती है
और क्वांटम एंटैंगलमेंट की भाँति
प्रेम—दूरी नहीं, बस जुड़ाव ढूँढ़ता है।

मनुष्य एक विस्मित गणित है
जो अपने ही उत्तर पर संदेह करता है।

एन्ट्रॉपी बढ़ती जाती है
हम खोते जाते हैं
पर हर खोया हुआ तारा
एक नए ब्रह्मांड का
बीज भी हो सकता है।

तो क्या हम
अर्थ खोजने लौटेंगे?
या फिर
शून्य की सबसे चुप परत में
अपने प्रश्नों समेत
दम तोड़ देंगे?

प्रकाश
अंधकार से नहीं हारता
वह बस देर से पहुँचता है।

शायद हम भी
थोड़ा देर से समझेंगे
कि अस्तित्व का ध्रुव
नाश नहीं
आशा है।


हर्षित मिश्र [जन्म : 2005] की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। वह रामानुजन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी [ऑनर्स] के छात्र हैं। वह हिंदी-कविता की भाषा में एक नवीन शब्दावली जोड़ते, एक नवीन विन्यास संभव करते प्रतीत हो रहे हैं। उनसे harshmishra3415@gmail.com पर संवाद संभव है।

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