लंबी कविता ::
जयंत शुक्ल
आज 7 मार्च है और अज्ञेय का जन्मदिन है। उनकी एक बड़ी अच्छी कविता है पिता पर। आज मेरे पिता का भी जन्मदिन है। मैंने कई बार उस कविता को पढ़ा और अपने पिता का चेहरा याद करता रहा। पर उनके इस पृथ्वी से विदा लेने के बाद उनके चेहरे के साथ-साथ कई ऐसी बातें भी याद आती हैं जिनके बारे में सोचते हुए अपनी कलई खुल जाती है।
अज्ञेय ने अपने उपन्यास ‘शेखर : एक जीवनी’ में पिता का जैसा वर्णन किया है, मेरे पिता वैसे नहीं थे। पर सोचता हूँ कि अगर वैसे ही होते, तो अधिक पिता होते।
क्या अर्थ है अधिक पिता होने का? सबके अपने तरीक़े होते हैं, अपने भाव और अपनी अभिव्यक्ति होती है; पर अपने पितापन को दर्शाने का, उनका क्या ढंग था—मैं नहीं समझ पाया।
अब सोचता हूँ कि कहीं मैं भी तो अपने पिता जैसा नहीं हो रहा हूँ… उनसे बहुत दूर (मैं उनके निकट नहीं जाना चाहता), पर उनके ही समान।
— जयंत शुक्ल
7 मार्च 2026

मृत्यु और सांत्वना
एक
मौत नहीं चुनती किसी को
आदमी चुनता है अपनी मौत।
बीमारी नहीं आती अचानक
दरवाज़ा खटखटाते हैं हम उसका
और तिलक लगाकर करते हैं प्रवेश।
आपकी आदतों का
सी.टी. स्कैन बताता है
मरने का तरीक़ा
और परिवार के चलने का रास्ता
तय करता है आपका आख़िरी ई.सी.जी. चार्ट।
रक्त जो रिस रहा है
शरीर से पसीने की तरह
और दर्द जो जला रहा है आग-सा
वह अब दो दिन की बात है
उसके बाद सब ठंडा।
अस्पताल बड़े या छोटे नहीं होते
काम करने वाले आलसी या प्रोफ़ेशनल होते हैं।
प्रोफ़ेशनल!
कितना भी क़ाबिल हो डॉक्टर
पर उनके पेशे में मौत
एक साधारण घटना है।
हैलो!
बॉडी पैक कर रहे हैं।
इंसान तमाम ज़िंदगी
एक नाम से जीता है
और अंत में ‘बॉडी’ हो जाता है।
अस्पताल में पहुँचता है फलाना
और घर पहुंचती है ‘बॉडी’।
माँ!
गाँव चलना होगा…
बताना है
समझाना है
सँभालना है
कई लोगों को
और ख़ुद को भी।
आते हुए मैंने देखा
भरी बाल्टी लेके जाते हुए
मांसल स्त्री के हाथों को…
स्त्रियाँ अब भी सबल हैं
तुम भी हो
मुझे तुम पर भरोसा है माँ!
वहाँ देखो,
एक गाय का दूध पी रही है बछिया
मुझे भी तुम्हारे दूध की ज़रूरत है।
मेरे गाल पर अपना हाथ रखे रहो
तुम्हें उठने के लिए
मेरे सहारे की ज़रूरत नहीं है,
जैसे अभी तक हो यहाँ
आगे भी रहना है,
हमारे लिए
अपने लिए
अपने बसाए-बचाए इस संसार के लिए।
दो
औरतें रो नहीं रही हैं
वे गा रही हैं,
गाना इतना बुरा कभी नहीं लगा,
इतना शोक
इतना क्रोध
पर इतनी हँसी
कभी नहीं आई,
ये नाटक अजीब है।
माँ!
इतनी कमज़ोर!
दस मिनट का रोना
और दस मिनट की बेहोशी!
मैं क्या करूँ?
शव उठाता हूँ,
भारी है!
क्या बचपन में
मैं भी था इतना भारी?
पिता!
इतने ठंडे कैसे?
अभी तक चिता नहीं जली
अभी तक आप बात कर सकते हैं
कोशिश करो
आपने बहुत कोशिश की है
एक बार और
हाँ! आख़िरी बार,
हो सके तो,
अब क्या ही हो सकता है
ख़ैर, गंगा में नहलाया जाए।
मुझे मोतीचूर के लड्डू पसंद हैं,
आपको कैसे पता?
कैसे पता आपको, क्योंकि
आप लाए हैं मोतीचूर के लड्डू
मेरे हाथों से
मेरे पिता के
बेजान और ठंडे हाथों में रखवाने के लिए।
अब क्या बिना कुछ बोले ही
जल जाएगा यह ठंडा बदन।
हाँ, जो होना था हुआ
आगे ऐसा ही होता है।
मैंने आग तो आज ही देखी है
पानी और आग एक साथ
एक ही दिशा की ओर हैं
इस दृश्य में भी…
लय है
संगीत है
कविता है।
मैं आपको बता सकता हूँ
कवि होने का सबसे बड़ा नुक़सान,
आपको अपने पिता के शव पर भी
दिखेगी कविता,
चिता पर मिलेंगे शब्द और लय।
ये सारे कर्मकांड
ये सारी बातें
ये एक अच्छी कविता हो सकते हैं,
मैंने बहुत पहले ही सोच लिया था
और यह लिखते हुए मैं सोच रहा हूँ
कविता की महानता के बारे में
और देख रहा हूँ
महान् होती हुई कविता को!
चिता अब ढह रही है
जैसे ढह गया शरीर,
एक लकड़ी
अब दूसरी लकड़ी
और अब अचानक पैर का पंजा
गिर गया
अलग होकर।
माँ!
कहाँ हो?
मैं हूँ यहीं
भैया भी हैं!
हमारे साथ रहो,
हम साथ हैं।
तीन
पाँच रोज़ बाद
घर तो लगभग खंडहर है
लोगों को देखना होगा…
नीम के फूल बहुत हैं
नीम से ज़्यादा ज़मीन पर
हमारे कपड़ों पर
बालों में
मिट्टी के साथ!
कुत्ते हैं
गाय और भैंसें भी
मोर भी हैं
बबूल, नीम, आम, पीपल
सब तो हैं,
पर इन्हें देखने में
इनकी सुंदरता सराहने में
एक ग्लानि है,
अपने प्रति क्रोध भी है
और एक सांत्वना भी।
माँ!
अब बाक़ी है
बहुत कुछ होना
नाई आएगा
महापात्र आएँगे
(जिन्हें नहीं बैठने दिया जाता है
घर की कुर्सी पर साल भर
अब वे सिर पर बैठाए जाएँगे!)
जिसने किया है अंतिम संस्कार
वह रहेगा सबसे अलग—दस दिन।
यही तो परंपरा है।
परंपरा के हिसाब से चलो…
सब चिल्लाते हैं—परंपरा!
और कोई नहीं जानता
कि अस्ल तरीक़ा क्या है
कुछ भी करने का।
सब हुआ जाता है
दिन बीते जाते हैं
लोग सँभलते जाते हैं
बस वह नहीं!
सब चल रहा है एक हिसाब से
आख़िर बात तो वही है कि
ये सब उनकी आत्मा की शांति के लिए है
कोई फ़र्क़ पड़ता भी है?
माँ!
अब धीरे-धीरे फेंको उदासी
और तमाम ज़िंदगी ये ख़ुशी मनाओ
कि अब ये दुःख दुबारा लौटकर नहीं आएगा
(सांत्वना मात्र!)
जयंत शुक्ल से परिचय के लिए यहाँ देखिए : यह संसार एक पेड़ है और अब इस पर सिर्फ़ एक पत्ती बची है