लंबी कविता ::
शचीन्द्र आर्य

चालीस का होने पर
एक
पीछे मुड़ता हूँ
राख दिखाई देती है
बढ़ नहीं पाता, एक क़दम भी
रुक जाता हूँ, देखता हूँ
घूर कर राख और उसके आस-पास
तभी वहीं उसी राख में दिखाई दिए अंगारे, चमकते हुए
जैसे किसी रात में
उजाला न रहने पर दिखाई दे जाए एक जुगनू
मुझे दिन में (भी) तारे और जुगनू
दोनों दिखाई देते रहे हैं बहुत समय से
तब भी पढ़ नहीं पाता जो लिखा है
जो पढ़ता हूँ, लगता है
सभी सही अर्थ समझ पाए हैं मेरे सिवा
मुझे कुछ भी सीधा और सरल नहीं लगता
सब उलट-पलट गया कल्पना और वास्तविक जीवन में
कमरे में बैठा रहा,
यह पंक्ति चवन्नी की तरह घिस चुकी है,
अब मुझे भी किसी रिजर्व बैंक की तरह
इस पंक्ति को अपनी कविताओं से वापस ले लेना चाहिए
देर तो मुझे इतनी हो गई इस काम में
अब तो हज़ार के नोट भी नहीं चलते
पाँच सौ के नोट भी ग़ायब हो गए
तब भी, यह काम, अभी भी किया जा सकता है
एक क़मीज़ है,
गेरुए या कत्थई या गहरे लाल में
थोड़ा काला मिल गया हो शायद
इसी रंग की क़मीज़
दस साल से पहन रहा हूँ,
कॉलर फटने को है, तब भी नहीं उतारता
लगता है,
इसे रख दिया तो कैसे अपनी भाषा बरत पाऊँगा
कैसे इसके बिना
उन दिनों की तरल स्मृति को साथ रख कर जी पाऊँगा?
सपने आना बंद हो गए
या सब देखे सपने सच हो गए
इसका भी कोई तयशुदा जवाब मेरे पास नहीं है
सिर्फ़ विस्मयबोधक चिह्न (!) की तरह मेरा खुला मुँह है
होंठ के इर्द-गिर्द बासी राल की लकीरों पर मक्खियाँ भिनभिनाती घूम रही हैं
कुछ मक्खियाँ दाढ़ी में देख नहीं पा रहीं, वह राल अभी सूखा नहीं है
तकिये के खोल को हटाता नहीं
नहीं तो दिख जाएँगी मेरी रातें
रातों में सपनों को देखता मेरा खुला पयजामा
सपनों में किसी चलती हुई तस्वीर की तरह
चाचा छत की मुँडेर पर बैठे-बैठे
अपनी कलाई पर आई लकीरें किसे दिखा रहे हैं,
याद नहीं आता, आँख मलते हुए उठने पर
कभी नाना, मामा, नानी
दादी, बाबा कोई नहीं आए
चाचा आए, अभी परसों दुबारा
क्यों आ रहे हैं, दुबारा किसी झूठे जीवन की तरह
उनसे पूछ नहीं पाया
कभी किसी सपने में पूछ पाऊँगा, नहीं पता
नहीं पता आने वाले सालों में
कुछ ऐसी बातें भी लिख पाऊँगा
जो अभी तक नहीं लिख पाया ?
अभी तो अपना पिछला लिखा
तरतीब से लगाते-लगाते दो साल बीत गए
तब भी बेतरतीब ही है, सब लिखा हुआ
अब बैठ नहीं पाता
इतनी देर किसी भी काम के लिए
जितनी देर बैठे रहते हूँ, किसी फ़िल्म को देखते हुए
आँखें दुखने लगती हैं, भूख दुबारा लग जाती है,
नींद भी बग़ल खड़े-खड़े सूरजमुखी के फूल की तरह मुरझा जाती है,
वह भी थक जाती है, रात के तीन बजे तक आते-आते
फिर लगता है, रात तीन बजे को, रात के तीन बजे नहीं कहना चाहिए
एक घंटे में सुबह होने वाली होती है और हम दोनों, तब जाते हैं सोने
दो
इस सबमें कैसा दिखने लगा हूँ,
यह भी नहीं बताया अभी तो
इन सालों में ऐसा होता गया हूँ,
इसे ख़ुद से सवाल की तरह पूछता हूँ
शक्ल?
ख़ुद से पूछकर थोड़ा अपने में हँसता हूँ
शक्ल तो मेरी ऐसी है
डीटीसी बस का कंडक्टर
पैसे ले लेता है, टिकट नहीं देता
हर बार वह थोड़ी देर
मेरा दिया दस रुपए का सिक्का
अपनी मुट्ठी में दबोचे
साही के काँटे की तरह मुझे चुभता रहता है
चाहे तो हर बार कसैली-सी गाली मुँह में भरकर
पान की पीक की तरह मुझ पर थूक दे
उससे तनिक पहले वह दूसरे हाथ से
टिकट मेरी तरफ़ बढ़ा देता है हर बार
वहीं बस की सीट पर
बैठे-बैठे सोचता हूँ
पेट निकल आया है
वज़न भी थोड़ा बढ़ गया लगता है
कभी-कभी लगता है, पिता ने अपना वज़न मुझे दे दिया हो जैसे
जैसे ताक़त और फ़ुर्ती भी उनके हिस्से से मुझ तक आ गई हो
अब पिता दुपहर लेट जाते हैं थोड़ा,
थोड़ी नींद उन्हें भी दुपहर में आने लगी है
मैं इस उम्र में भी क्यों दुपहर में लेट जाता हूँ, समझ नहीं पाता
कभी तो लगता है, यह सब लिखा फ़िज़ूल है
यह जीवन सारा दिया हुआ है माता-पिता का
मेरा क्या है इसमें, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं
चुप बैठ जाता हूँ, किसी कोने में
तब लगता है,
अम्माँ ने रौशनी और आकाश की
हर आवाज़ सुनने को कान (दे) दिए
सच, आँखें और कान भी कम काम करते हैं अब अम्मा के
कभी-कभी सुन नहीं पाती हैं बात,
उसी पल जब कही जाती है
खो-सी जाती हैं,
किसी पुराने दिन की किसी याद में लगातार
दुबारा कहना पड़ता है, उसी बात को दो बार
ऊँचा सुनती होंगी, कह नहीं सकता
यह कह सकता हूँ,
अब कभी-कभी ध्यान नहीं देती हैं, कही जा रही बात पर
उन्हें लगता होगा, क्या ही ज़रूरत है हर बात सुनने की
यह बातें मुझे पता है, नहीं बताई हैं उन्हें
बस चुपके से लिखे दे रहा हूँ, वह नहीं पढ़ पाएँगी, इतने छोटे-छोटे अक्षर
पिता पढ़ेंगे ये बातें, कविता की तरह एक झूठ मानकर
कि कविता में लिखा है, झूठ ही लिखा होगा
तीन
दोस्तों की क्या कहूँ
सब एक-एक कर दिल्ली से लौट गए
अपने किराये के कमरों को यहीं छोड़कर
सब अब फ़ोन में फ़ोन नंबर की तरह हैं
नंबर सामने है, बात हो सकती है
एक बटन दबाते ही
तब भी बात नहीं होती साल-साल भर
बिन बात हुए भी हम दोस्त रह सकते हैं
यह एक दिन हम बताएँगे इस दुनिया को
बात करने की ज़रूरत को किसी भी तरह
दोस्ती के लिए ज़रूरी नहीं कह सकते
ज़रूरी है, बेकार से दिनों में एक जैसे मन लिए
बेकार गलियों में नाली की गाद की तरह पड़े रहना
जो हम अभी तक भूले नहीं हैं
भूल जाएँगे, तो दोस्त भी नहीं रहेंगे
इनके अलावा
कोई नहीं है बात करने वाला
किसी से कोई बात नहीं होती,
जो मन में घूमती रहती है रोज़
साइकिल के पहिये की तरह
सब दीवारों की तरह बर्ताव करते हैं
जैसे उसने सबको समझा दिया हो,
दीवारों के सिर्फ़ कान होते हैं और वे
सिर्फ़ इश्तिहार चिपकाने की काम आती हैं
चुप रहकर जीवन जिया जा सकता है
यह कभी सोचा नहीं था, अब जी रहा हूँ
जी रहा हूँ, किसी को भी बिना दोस्त कहे
जी रहा हूँ, बिन बोले, एकदम चुप साधे
यह बातें मेरे हिस्से की बातें बनेंगी उन सबके लिए
जिनसे कभी बात भी नहीं करना चाहता था
न यह मालूम था, एक दिन बात करनी पड़ेगी इन सबसे
वैसे ही जैसे
कभी कविताएँ नहीं लिखना चाहता था
कभी नहीं सोचता था
कविताएँ भी लिखनी पड़ेंगी
किसी तक अपनी बात पहुँचाने के लिए
सोचता हूँ,
क्यों कविता का, इतने विलंब से, मेरे जीवन में प्रवेश हुआ
कुछ ख़ास दिखाई नहीं देता
बस दिख जाते हैं, पुराने दिन
जिन्हें दोस्त कहा, जिनके साथ बचपन बीतता रहा
वह और हम आपस में घेरे हुए थे सारा आकाश
कितनी सारी बातें, हम हर रात ख़त्म करना चाहते
तब भी ख़त्म न होती,
ख़त्म न होती, चलती रहती बात पर बात,
कहीं न कहीं से निकल ही आती कोई अनकही बात
सब चले गए इस जीवन से
अपना-अपना जीवन लेकर
तब चुप्पी ही हिस्से आई
एक दीर्घ, लंबी, उदास, ठंडी,
अँधेरी सुरंग-सी असमाप्य चुप्पी
ख़त्म होते, ख़त्म नहीं हो रही,
चले जा रही है, घड़ी की तरह टिक-टिक करते हुए लगातार
इसे ‘मौन’ भी नहीं कहा जा सकता
यह आवक (!) होकर ख़ुद में न लौट पाने की बेचैनी है
कोई दिन कभी लौट कर नहीं आया
और मैं मन ही मन पिछले दस सालों से
इन बीत गए दिनों पर कोई किताब लिखना चाहता हूँ
लगेगा, झूठ की किताब है पर सच होगी
झूठ जैसा जीवन सपने की तरह ही था
कोई नहीं मानेगा, हम ऐसे भी जी आए हैं,
अपने पुराने दिनों को रेशम के कीड़े और
तितली के एक दिन के जीवन की तरह
चार
ऊपर देखा तो याद आया
सवाल था, क्यों इतना विलंब हुआ
कविता लिखने में, क्यों देर से आई कविता मेरे पास
शायद यही जवाब मेरे पास है
खोया रहा उन दिनों में
इन्हें लिखने का ख़याल ही नहीं आया कभी
जो दिन तब बीत रहे थे,
उतने हिस्से को ही जीवन कह पाऊँगा
कभी नहीं लिखूँगा,
उन दिनों पर एक पंक्ति भी कविता में
इन सबमें बीते सालों को ग़ौर से देखते हुए
कभी यह समझ नहीं पाया
जो कोई अनजाना मिला, उससे
पहली मुलाक़ात में क्यों कह देता हूँ,
‘लिखा करो’ या
‘लिखते हो तो लिखते रहो’
क्यों कहता हूँ उन्हें ऐसा,
लिखने से क्या हो जाएगा?
शायद ख़ुद भूल जाता हूँ,
लिखना मुझे तब मिला,
जब दोस्त नहीं रहे, घर छूट गया,
चुप रहने के बाद
जब बात नहीं कर पाया किसी से
सीधी पंक्ति में कहूँ तो
वे तब कुछ लिख पाएँगे,
जब मेरी तरह हो जाएँगे
तिरछी पंक्ति में कहूँ तो
वे सब भी शायद
जब छूट जाएँ छूटने से,
तब कुछ लिखें पहली बात
इन छूटने में
कभी-कभी ख़ुद को लगता है
चिड़चिड़ा-सा होता आया हूँ
बात करने की इच्छा नहीं होती किसी से
चेहरा एकदम सपाट,
कोई हाव-भाव आता जाता न हो जैसे
लोग मुझसे बात करने में पहल नहीं करते
जो मुझे जानते हैं, वह भी कतरा कर निकल जाते हैं कभी-कभी
उनके लिए यह मेरे हिस्से का सच होगा,
मेरे लिए एक झूठा जीवन जीने की कला है
इसी झूठे, काल्पनिक जीवन में
एक तुम हो और घर वाले हैं, सब जानते हैं
जो कहने से भी पहले समझ जाते हैं
कुछ भी कहा नहीं जाना चाहिए
किसी भी बात के लिए
हम बिन बोले कितने सालों से
साथ रहते आ रहे हैं
इसका कोई हिसाब नहीं लगा सकता
ख़ुद हम भी नहीं
हम जिन जगहों पर रहे बस रहे कुछ बोले नहीं
कई बार ऐसा लगता है
जैसे कोई क्षण
कभी प्रसन्न न कर पाता हो मुझे
किताबें, घूमना, ख़ाली बैठे रहना
कुछ न करना, यही सब मन में घूमता रहता है
हँसता भी हूँ तो भी आहिस्ते से हँसता हूँ
भाई-बहन साथ हों, तब आती है, ठहाके वाली हँसी
जैसे लौट आए हों, हमारे पुराने दिन
लेकिन गिनती के ही रह जाते हैं
कभी-कभी हमारे ठहाके,
किसी बात को याद करते-करते
पाँच
ख़ाली बैठा रहता हूँ,
ख़यालों में डूबे
खो जाता हूँ, खीझ जाता हूँ
मन में एक क़तरा भी कुछ नहीं बदलता
मन वैसा ही सपाट और भुरभुरा बना रहता है
इस सपाट मन में तब भी रहती हैं स्मृतियाँ
यह स्मृतियाँ मेरे ख़ुद के लिए
आश्चर्य का विषय है और कौतूहल का भी
इन्हीं में घूमते-घूमते दिनों को
रातों में तब्दील करने की ज़िद है
ज़िद को अपनी उम्र के कितने साल
दिए जा सकते हैं, सवाल यह नहीं है
सवाल है, दस-बीस रुपये के नोट की तरह
उनको इस उम्मीद में ख़र्च करना कि एक दिन
सब्ज़ी लेते हुए वह वापस मुझ तक पहुँच जाएँगे
कभी न वापस लौटकर
आने वाले इन दिनों में
कौन से दिन रहे जो लौट-लौटकर
समंदर की लहरों की तरह लौटे?
लौटा
बाबा के गाँव में
तरबूज़ काटने वाले दिनों में
कभी किसी शाम में,
जहाँ वह कल,
बीसवाँ के मेले के लिए रवे से ही
चीनी घोल कर लड्डू और पेड़े बना रहे हैं
लौटा
छत से नीचे भागकर
खपरैल के नीचे खाट पर
बरसात की रात में बूँदों को टप-टप
मिट्टी में गिरते हुए सुनने वाली रातों में
लौटा
नाना छत के नीचे
हाथ से बुनी हुई चारपाई पर
एक घुटना अपने हाथ में लिए
एक धुँधली-सी तस्वीर में बैठे हुए हैं,
जो ग़लती से खिंच गई थी कैमरे से
लौटा, लौटकर देखा
दादी हाथ में बेना लिए
धूप में बैठी हैं, गुलाबी शाल ओढ़े
नानी एक पल के बाद
इस दुनिया में नहीं रहेंगी,
उस एक पल पहले की याद में
जिसमें वह खाट पर लेटी हैं, तभी
हमारे नोट न गिन पाने वाले मामा
दरवाज़े से भीतर दाख़िल होते हैं
सब मृत्यु की तरह ठहर जाता है, दबे पाँव
हम सबको,
जो चारपाई को
चारों तरफ़ से घेरे खड़े हुए हैं
लगने लगता है,
नानी अभी उठ कर बैठ जाएँगी
वह बैठती नहीं है,
मामा को देखने की
ताक़त समेटते हुए ख़ुद सिमट जाती हैं
आजी को सब अपने कंधों पर उठाए
कहाँ ले जा रहे हैं, यह बिना समझे
घर वालों के पीछे चल पड़ने की याद
जिसमें नन्हे क़दम भी पहुँच गए,
जहाँ नहीं पहुँचना था, इतना छोटे होते हुए
तभी दुखते हुए मन से
घर में सबको कहता हूँ
लिखा करो सब कुछ-कुछ
कुछ-कुछ सब लिख लेते तो
बहुत कुछ आसान रहता मेरे लिए
नहीं लिखने पड़ते इतने सारे पन्ने,
नहीं गुज़रना पड़ता उन अनदेखे दिनों और शामों से
कुछ कम झूठ लिख पाता,
कुछ ऐसा लिखता जो सच लगता
गवाही नहीं देनी पड़ती सबके एवज़ में मुझे बारी-बारी से
अभी क्यों लिखते हुए सुरेस याद आ रहे हैं,
क्यों बाबा याद आ रहे हैं,
क्यों चाचा, छोटकी दादी सब याद आ रहे हैं
छह
छूट चुकी जगहें, दोस्त, गलियाँ, सपने
सब बारी-बारी लौटते हैं, मुड़ते हुए किसी दिन
जब नहीं होता, उनमें से किसी का इंतज़ार
जो अधूरा है, भीतर
किसी अजन्मे भ्रूण की तरह
जो कभी नहीं कहा,
जो कभी नहीं सोचा,
जो कभी नहीं मिला वक़्त पर
जिसका सिर्फ़ इंतज़ार रहा
कभी यह इंतज़ार भी नहीं रहा
जिन स्मृतियों को कभी
किसी चेहरे से याद नहीं रख पाया,
यहाँ याद को चेहरों से याद करने वाले
लोग चुक जाते हैं,
उन दिनों और उन सबको
याद कर पाने में सब असमर्थ हैं, सिवाय मेरे
भले कोई चेहरा नहीं बन पाया,
इन भ्रूणों से एक भी बार
हर बार थोड़े से हाथ,
कान और त्वचा ही बन पाई
मेरे पास मटर के दाने जितने बहुत से दिल
उग आए हर बार मन के भीतर
क्या इन अधूरे भ्रूणों की कोई याद मुझे
अपने पास नहीं रखनी चाहिए, सवाल यही है
जिसका कोई जवाब मेरे पास नहीं है
हर बार की तरह हम दोनों
चुप घर में बैठे, इंतज़ार कर रहे हैं
इंतज़ार कर रह हैं, रुलाई के फूटने का
फूट-फूटकर रोने से कुछ न भी हो
तो भी दर्द कुछ कम होता है, ऐसा लगता है
यहीं इसी पल से मेरी पृथ्वी
अपने अक्षों पर घूमना स्थगित कर देती है
वह रुकी हुई है, कोई सूरज नहीं निकला तबसे
कोई मौसम नहीं बदला, सुख की बारिश नहीं हुई
तपती हुई ज़मीन पर नंगा बैठा हुआ हूँ
आँख बंद किए, कुछ नहीं सोच रहा
बस सीलन भरी दीवार के सहारे,
नाख़ून के बल, कुछ न करता हुआ
दिमाग़ लगभग सुन्न
होने की कगार पर है
सोच रहा हूँ,
अकेले हम दोनों को कैसा लगेगा मिस्र घूमना
क्यों अकेले घूमें अजंता और एलोरा की गुफाएँ
अंडमान का समंदर सूख नहीं जाएगा हमें अकेला देखकर
आगरे का ताजमहल भी तभी नहीं गए अभी तक घूमने
घूमा कुछ नहीं, बस इंतज़ार करते रहे कि घूमेंगे एक दिन साथ-साथ
ग्यारह वर्ष की यातना कुछ कम पड़ गई है लगता
लगता है कुछ और समय भोगना है इस क़ैद को
इतनी अनमनी बातें कहकर और क्या-क्या
याद कर सकता हूँ अभी
बिल्कुल अभी, जो भूल रहा हूँ, याद नहीं आ रहा?
प्रेमिकाएँ याद नहीं आतीं, होती तो भूलता नहीं
धोखा ख़ुद को देता रहा, दूसरों को देता तो याद रहता
झूठ ख़ुद से बोला, किसी को बोलकर दुख नहीं दिया
इसलिए भी याद नहीं रखा कोई भी झूठ कभी
माता-पिता की हर बात मानता गया
इसलिए अब तक नहीं जानता इच्छा क्या होती है
सिर्फ़ किताबों पर कुछ रुपये
उड़ा देने को अपने मन का करना नहीं कहते
चालीस साल का होने पर भी
कुछ नहीं किया मन का, जो किया मजबूरी में किया
यह लिखना मजबूरी बन गई है मेरी
अख़बार को मजबूरी बनने नहीं दिया
पढ़ना छोड़ दिया
कोई दस-बारह साल पहले
नहीं ख़रीद पाया, कोई मेरा दिमाग़ एक दिन के लिए भी
तब भी दिमाग़ में
कूड़ा भरा है, दुनिया जहान का
जो जीवन मिला,
उसे जिया जा सकता है
कुछ लिखे बग़ैर
यही सोच, पाँच साल में
ढाई सौ पन्नों की एक डायरी
नहीं ख़त्म कर पाया
पन्ने भरकर क्या होगा,
यह दिख रहा है
भीतर सब मवाद की तरह रिस रहा हो जैसे
जैसे पन्नों से कनखजूरे,
केंचुए बनकर लिपट गए हों
दीमक भी क्या कर लेगी इन पन्नों का,
पढ़ तो वह भी नहीं पाएगी मेरा लिखा कुछ भी
यहाँ से वापस लौट पाना
अपने मन में
बहुत मुश्किल है, वैसा ही जैसे
दलदल से निकलकर
दलदल की तरफ़ चले जाना लिथड़ते हुए
सात
जो काम हर घर में, घर की औरतें, बिना पैसा माँगे
और बाद में ख़ानसामाँ और हलवाई पैसों के लिए करते रहे,
उसे वह लड़का अपने शौक़ से करता रहा
और अब कहता है, मुझे मेरी रसोई ने बहुत कुछ दिया
मैं भी ऐसा ही कोई झूठ
बोल पाता तो क्या बात होती
मैं भी कहता, एक दिन,
मेरी कविता ने मुझे बहुत दिया
पर मुझे पता है, यह दलदल है,
इससे चाह कर भी बच नहीं पाया
लोग इसी उम्र को उम्र की तरह न जी कर
हामिद बनकर जीते रहे
मुझे नहीं चाहिए था, हामिद-सा जीवन
नहीं लौटना था मुझे किसी मेले से चिमटा लिए हुए
मुझे नहीं जीना, इस तरह
अब यहीं रुकता हूँ
चीज़ें मन में टूट रही हैं
बातें दोहरा रहा हूँ
नई बात अब नहीं निकल रही नसों से
सब आपस में गुँथ गया है
क्या सच है, क्या सच नहीं है
यह भेद मेरे मन में हमेशा के लिए मिट गया है
नहीं मिटना था, यही सोच जो कहा,
उसे पढ़ते हुए आपको यहाँ तक भी
आने की कोई ज़रूरत नहीं थी
अगर बता देता झूठ लिखता हूँ
आप पहले ही छोड़ चुके होते पढ़ना
अब थोड़ी गुज़ारिश है आपसे,
देखिए मुहावरों के अपने गिरेबान में
कुछ दिख रहा है? नहीं भी दिख रहा है,
तब भी उसी के साथ बंद जगह पर बैठ जाइए
मैल ज़्यादा नहीं है, धुल जाएगी दो-तीन बार की धुलाई में
जा रहा हूँ, छत पर थोड़ा टहलने
थोड़ा रियाज़ करने, कि
बात कैसे की जाती है, जब बात करने का मन न हो।
शचीन्द्र आर्य से परिचय के लिए यहाँ देखिए : नहीं भी सही जगह इस्तेमाल हो तो बच जाती हैं घटित होने से कई त्रासदियाँ