कविताएँ ::
गोसिया बानो

गोसिया बानो

ज़ेर-ओ-ज़बर

मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है
न हसीन चेहरा
न उजला रंग
न सूरजमुखी-सी आँखें
न गुलाबी होंठ
न ऐसी हँसी कि गालों में भँवर पड़ जाएँ
न सुरीली आवाज़
न कोई शृंगार
न कोई शाज़
न ऐसी अदाएँ
जिससे तुम्हारा दिल ख़ुश हो जाए

कभी न कभी तो
तुम्हारे मन में भी आ ही जाएगा
गुलाब-सी चेहरे वाली
मेरी शरीक-ए-सफ़र होती
तो अच्छा होता!
चूड़ियों-बालियों से सँवरी हुई
कोई लड़की होती
तो अच्छा होता!
महताब की नूर वाली
क़मर के अक्स वाली
मेरे आँगन चहक रही होती
तो अच्छा होता!

मगर मेरे दोस्त!
मैं वैसी नहीं जैसी तुम चाहोगे
शायद तुम उकता जाओगे
मेरी बातों के हर ज़ेर-ओ-ज़बर से
किसी मसनवी हर्फ़ के याद आने से।

बाबा के लिए

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
रोते नहीं हो तो कोई फ़रेब नहीं तुम में
लेकिन रुलाने के
आदी तो तुम नहीं हो?
तुम्हें ज़ायक़ा पसंद है
अपनी माँ के हाथों का
और होना भी चाहिए
लेकिन अपने लिए
किसी और का ज़ायका बदलने के
आदी तो तुम नहीं हो?
पेट भर खा कर
खाने में नुक़्स निकालने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
ख़ुशियाँ तुम्हें भी पसंद होंगी
लेकिन किसी की ख़ुशियाँ उजाड़ देने के
आदी तो तुम नहीं हो?
बच्चे मेरी दिल-ए-दुख़्तर को भी पसंद हैं
और तुम्हें भी पसंद होंगे
लेकिन बच्चों का बीज बो-बो कर
औरत को जर्जर कर देने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
बीमारियाँ तो इंसानी साथी हैं
लेकिन बीमारियों से डर कर
हाथ छोड़ देने के
आदी तो तुम नहीं हो?
कभी-कभी तो मुफ़लिसी सबके घर आती है
शायद तुम भी इससे बच नहीं पाओगे
लेकिन मुफ़लिसी में आव-बाव बकने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
ग़ुलामी किसी को रास नहीं आती
तुम्हें भी रास नहीं आती होगी
लेकिन औरत ज़ात को गुलाम समझने के
आदी तो तुम नहीं हो?
बेल्ट पतलून कसने के ख़ातिर होती है
उसका वहीं इस्तेमाल भी होता है
लेकिन बेल्ट को हथियार बनाने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
मौत आती है तो कोई बच नहीं पाता
मुनकर-नकीर ख़ाली हाथ वापस नहीं जाते
लेकिन अपनी मौत को बीवी के
अफ़्सा, चूड़ियों और नाक के
बुंदे से जोड़ देने के
आदी तो तुम नहीं हो?
सुफ़ेद को बेवा का रंग
लाल को सुहागन का रंग मानने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा मेरे लिए किसी को इंतिख़ाब करने से पहले
निकाह की रस्मों की शुरुआत करने से पहले
उससे एक बार पूछ लेना
मन भर जाने के बाद
बदन को नोच कर खाने के बाद
अपना काम करवाते-करवाते
बाँदी बना लेने के बाद
उसे पंखे से लटकाने के
आदी तो तुम नहीं हो?

बाबा तुम्हारे सवालात से
अगर वो डर जाए
तो तुम देर न करना
रिश्ता वहीं ख़त्म कर देना
रिश्ता ख़त्म हुआ तो बेटी बच जाएगी
रिश्ता सँभाला तो बेटी
एक दिन दुनिया से गुज़ार दी जाएगी
बाबा तुम्हारी सिसकियों का कोई फ़ायदा न होगा
पच्चीस बरस की मेहनत रायगाँ होगी
बाबा फिर तो रोने के लिए
मेरा कंधा भी तुम्हारे पास न होगा
बाबा तुम्हारे आँसुओं में
मेरी क़ब्र भीग कर ज़मींदोज़ हो जाएगी
बाबा तुम्हारा सालों का लाड
तुम्हारी ही आँखों पर बिखरा होगा।

क़मर का अक्स

यूँ तो प्यार करने में कुछ भी नहीं रखा है
लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है
कि चाहने वाले के बालों से
संगीत झरता हो
उसकी हर बात में गीत रखा हो
जब धूप की किरणें जिस्म पर सेंध लगाती हों
तब चुपके से वही दरख़्त छाँव देता हो
कहने को तो यूँ हो सकती हैं
तुम्हारी शबनमी आँखें
लेकिन अगर हो कहकशाँ-सा वो
तो उसमें कशिश का ग़ुबार हो सकता है

यूँ तो प्यार करने में कुछ भी नहीं रखा है
लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है
कि चाहने वाले की आदतों से
प्यार रिसता हो
उसकी हर एक नज़र में बहार हो
जिन बालियों की झिलमिल से
रूप तुम्हारा सँवरता हो
जिन चूड़ियों की खनखन से
तुममें शाद चहकता हो
वहीं कहीं उसका फिरोज़ी प्यार पलता हो
मैं क़मर को देर रात तक तकती हूँ
मुझे तो ये तुम्हारा अक्स लगता है।

उजला चेहरा

एक उजले रंग का चेहरा
उजली-उजली बातें करता था
समुंदर का लिहाफ़ पहने
नदियों के गीत गाता था
जिसके पैरों की आहट से
रातरानी चहकती थी
और वह मदहोश हो कर
अपनी शोख़ियाँ लुटाता था
बड़ी देर से कोई महफ़िल
याद आए जा रही थी
उस महफ़िल में बस एक ही गुलमोहर बैठा था
इसी गुलमोहर के सदक़े से
जितने भी सुख़नवर पल
जगमगाते हैं मेरे आँगन के आकाश में
उन्हीं की रुत पहनती हूँ
उन्हीं की टिमटिमाहट ओढ़ती हूँ।


गोसिया बानो [जन्म : 2003] की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह अमेठी [उत्तर प्रदेश] से हैं और फ़िलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में परास्नातक की विद्यार्थी हैं। उनसे gosiyabano34@gmail.com पर संवाद संभव है।

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