कविताएँ ::
जतिन

जतिन

एक रोशनी थी

एक रोशनी थी
जो अक्सर खिड़की से
मेरे कमरे में आ जाया करती थी

उसके आते ही
मैं करवट बदल लेता
उसके जाने का इंतिज़ार करता

वह मेरे पलटने का इंतिज़ार करते-करते
वहीं सो जाती
मैं चुपके से करवट बदलकर देखता
कि वह गई या नहीं

वह मुझे मेरे पैरों पर लेटी हुई दिखाई देती

महीनों तक वह इसी तरह आती रही

मेरे पैरों के पास सोना
उसे अच्छा लगने लगा था
मैं भी उसे बिना परेशान किए सोने देता

अब नवंबर आ चुका है
अब मैं देर तक सोता हूँ
रोशनी कहीं ग़ायब-सी हो गई है
अब वह मुझे जगाने नहीं आती
बस! जिस पैर पर वह सोया करती थी
वहाँ एक दाग़ बना हुआ है।

तुम्हारा होना बचा रहेगा

तुम्हारा होना बचा रहेगा
और शायद बचा रहे
तुम्हारा न होना भी
तुम्हारे होने के बचे हुए का थोड़ा
मैं तुम्हें अभी जी लेता हूँ
छोड़ देता हूँ शेष को
तुम्हारे न होने के जीने में।

बरसात के बाद

बरसात के ठीक बाद का आकाश
नज़र आता है और भी नीला
अपनी सामान्य स्थिति से

हरे-भरे पेड़ों से छनते हुए गिरती हैं
पानी की बूँदें

गीली दीवारें देती हैं
अलग तरह की ख़ुशबू
ख़ुशबू जो आती है
जब माँ फेरती हैं पोता चूल्हे पर

सरसराती पत्तियों-से हिलते हैं
गाँव की पगडंडियों पर चलतीं
लड़कियों के केश

गड़गड़ाते बादलों की गूँज भी
किसी रेलगाड़ी-सी निकल जाती है
किसी गाँव की रेलवे चौकी से

बरसात के कारण ही
घर के आँगन में घुसे लोग
निकल आते हैं
अपनी-अपनी छतों पर
और देते हैं गालियाँ बारी-बारी
इन बादलों को…

घर के मुखिया
लगा देते हैं आवाज़ बहुरिया को
चाय के लिए

होती हैं बातें
चाय के आते ही
समाज पर
सरकार पर
बारिश के नफ़े-नुक़सान पर

इन बातों के बीच
मुखिया जी लगाते हैं
आख़िरी घूँट चाय का
और छोड़ देते हैं
एक आख़िरी घूँट
चीनी मिट्टी के कप में

यह उनकी पुरानी आदत है।

बादलों का उपकार

आसमान में हौले से चल रहे हैं बादल

ये बादल नहीं हैं
झाग हैं
किसी बाल्टी में घुले
किसी अप्रचलित सर्फ़ की महक लिए

ये महका रहे हैं आसमान

इनके साथ ही महक रही है
एक हरी-पीली पतंग
सभी छोटे-बड़े पक्षियों के साथ।

अनदेखे तारों का पुंज

अपने हिस्से का आकाश देखने के बाद
लोग देखते हैं अपने हिस्से के तारे
दूधिया रात में
जीवन-संगिनी के साथ
स्वयं का तारों की भाँति
आकाश में होना देखते हैं वे
मृत्यु के पश्चात्
इंसान के तारे बन जाने की
दादी-नानी की कहानियाँ
याद हो आती हैं
क्या सबके हिस्से आती हैं ऐसी रातें?
जब कोई देख लेता है
अपने हिस्से के तारे
और उनकी चमक से
चमकता जीवन-संगिनी का सौंदर्यपूर्ण चेहरा
जो नहीं देख पाते
अपने हिस्से के तारे
क्या वे अपने हिस्से का आकाश भी
नहीं देख पाते
क्या आकाश में मौजूद
अनदेखे तारों का पुंज
आकाश संग
उनके देखे जाने की प्रतीक्षा करता है?


जतिन की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह मथुरा [उत्तर प्रदेश] के रहने वाले हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक के छात्र हैं। उनसे jatinkumar00637@gmail.com पर संवाद संभव हैं।

4 Comments

  1. Pankaj Sharma नवम्बर 18, 2025 at 7:18 अपराह्न

    the poems are excellent

    Reply
    1. Jatin नवम्बर 28, 2025 at 6:25 अपराह्न

      thanks a lot 🙂

      Reply
  2. पंकजेश्वर नवम्बर 20, 2025 at 6:54 अपराह्न

    बहुत ही सुन्दर कवितायेँ है ….शुरू से आखिर तक कविता का स्वाद चखा ….जीते रहो

    Reply
    1. जतिन नवम्बर 28, 2025 at 6:26 अपराह्न

      बहुत शुक्रिया 🙂

      Reply

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