कविताएँ ::
कुशाग्र मिश्र

कुशाग्र मिश्र

भाषा का अंतिम अक्षर

मैंने देखा शब्दों का अंत होना

उस दिन
कविता की जिह्वा पर
कोई ध्वनि नहीं थी
पुस्तकें राख हो चुकी थीं
और कवि
स्मृतियों के प्रेत बन चुके थे
अर्थ सूख गए थे
जैसे नदी की देह से जल
रूप रूप न था
रंग नहीं थे रंग
थी केवल एक धूसर कँपकँपाहट
जो कभी रचना हुआ करती थी

वह दिन था
जब उपमाएँ मौन थीं
जब रूपक अपना अर्थ खो बैठे थे
जब सौंदर्य ने अपने ही प्रतिबिम्ब को
घृणा से देखा और मुरझा गया

पृथ्वी पर कोई पाठक शेष न था
शेष थे मात्र अधूरे छंद
जो हवा में झूलते थे—
जैसे जीवात्माएँ
जो कभी पृष्ठों के भीतर रची-बसी थीं

मैंने खोजा
क्या अभी भी कोई कवि शेष है?
और पाया बुझती अग्नि से धधकता हुआ
धुएँ का अम्बार

और तब मैंने देखा
भाषा का अंतिम अक्षर जो
आकाश में धीरे-धीरे जलकर बुझ गया
जैसे ईश्वर स्वयं
उस अक्षर के अंतिम रूप में मर गया हो

कविता न लिख पाने का शाप

कविता न लिख पाना
महज़ दुख न था
वह था गहन रात्रि में
गर्त की अनंत गहराई में
लुप्त होना हमेशा-हमेशा के लिए

उस रोज़
शरद की पीली संझा के प्रश्न का उत्तर
भला किस मुँह से देता
कि यह आत्महत्या नहीं
जो फिर हो सकूँ अगले जन्म में
संभावनाओं संग अनुकूल
फूट सके बीज वापस इस खंडिनी पर

यह तो इस जन्म का पाला संखार था
जिसकी भूमि ऊसर हो चली थी

न लिख पाना मृत्यु नहीं थी
शरद के वृक्ष-पत्तों के समान
इसे तो अनुर्वर होना था
स्वयं जीवन की भाँति

किसी गहरे कलुष का विलाप

हूँ सब यथार्थ में अलक्षित
तमाम चाँदनी बाट जोहता
खुजाता सिर अपना मुसलसल
कि कुछ तो बेपर्दा निकले
लज्जित ही सही

किताबों में बसे अंतहीन
सोगवार क़िस्से और रक्तरंजित काव्य
अख़बारों में लहू से पुती स्याह सुर्ख़ियाँ
चीख़ती त्रासदियाँ
मृतात्माएँ
कौओं के शोकगान
बिज्जुओं के लश्कर
नग्न पण सुंदरियों के नृत्य
जिनके नूपुरों में अजब-सी खनक
बिल्लियों-कुत्तों का मुसलसल उदास स्वर
बादलों का गिरोह जिनमें अनदेखे तारों की
औंधी शक्लें गढ़ती नक्षत्र-मंडल विचित्र
उधर उस कोने पर मरे हुए मौलसिरी के फूल
जिनमें कल रात जीवन झलकता था
उनका अनचढ़ा कफ़न वृक्षों को दीखता-सा आज
झंझा आ उन वृक्षों पर से गिरा जाती है कुछ वरक़
जो बनते हैं उन मुर्दा फूलों के कफ़न
कुछ वक़्त के लिए
और आसमान पर लटकते
मौन मुर्दा देह
जिनकी गंध चुपचाप
सकल मंज़र ताकती है

सबका अध्ययन
बारहा कर जाता हूँ
या कि कहूँ घोंट जाता हूँ
गले के भीतरी तल तक
इस समूची चाँदनी में
और पल-पल में
व्यग्र हो उठता हूँ
ख़याल कर
कि कितनी खोखली
कितनी निरर्थक है
तमाम उम्र
मुर्दों से लबलबी
निर्वस्त्र-निर्धन-निष्कंप
संतोषों में लिपी-पुती

और तभी
डूब उठता हूँ
अपने पापों में अचानक
और प्रत्येक साँस में खोजने लगता हूँ
पुण्यता अपनी
मगर साँसों की तिलिस्मी क़तार पर
प्रस्तुत स्याह दाग़ों को जब हूँ देखता
ज़ेहन मर-मर जाता
फट पड़तीं नसें चिथड़ा कर
किसी भयावह दृश्य के मानिंद

कोई मेरे अंगों के भीतर प्रवेश करता
और मुसलसल चीख़ता जाता कि
तुम्हे जीने का ज़रा भी हक़ नहीं

मैं कुलबुलाते कसमसाते प्रतिप्रश्न में
डूब अपना हिय पीटता
इतनी ज़ोरों से पीटता कि
मेरे अगल-बग़ल का दृश्य
मुझे वैसा ही देखता जैसा कि मैं उसे
मरे मौन की तरह
और चीख़ता जाता शून्यता में कि
कोई आकर बचावे
मेरे पुण्यों को
किंतु वह चाँदनी इतनी स्याह
इतनी धुंधली भीतर तक पटी
कि छिपा जाती मेरे समस्त पुण्य
और डुबो देती मुझे अतल तक
जहाँ से गुज़रगाह सीधी नरक को चली जाती
और वह नरक बन जाती धरती स्वयं
जिसमे मैं अहर्निश बीतता हूँ
निरा बीतता हूँ…

मानव-वृक

मैं मानव… वृकों की नस्ल का
मानव-वृक
बिछुड़ा रहा होऊँगा सदियों पहले
अपने किसी कुटुम्ब से
जो मनुज-देह में आ जन्मा
मगर प्रवृत्ति में भेद न आ सका
अंदर से ग्रहण न कर सका
नगर के तौर-तरीक़े
व्यवस्थित ढंग से रहना-सहना

जब भी रात्रि की कौमुदी ने घेरा
तब-तब अपने कौटुम्बिक ढंग से
याद किया उसको जो नगर में बिछुड़ा
प्रेम न पाकर उनका
सारी-सारी रात चीख़ा
किंतु लोकतांत्रिक विधान में
पागल न ठहरा दिया जाऊँ इसलिए
हाथों को मुँह पर लगाए रखा
दम को घोंटे घंटों
लहू को आँखों से चूता देखा

लौटने की प्रतीक्षा

ये जो मोहलत जिसे कहे हैं उम्र
देखो तो इंतिज़ार-सा है कुछ

— मीर तक़ी मीर

जैसे लौटता रहा शिबुया स्टेशन पर
आने वाली प्रत्येक ट्रेन के पास
चूकेन हाचिको
अपने मालिक की शक्ल तलाशता
उन तमाम शक्लों में
नौ लंबे वर्षों तक

जैसे कवि करता रहा प्रतीक्षा सदियों
धार के लौट आने की
समय की मौन लंबी आह बनकर

जैसे विरह-दोच सुनाने को आतुर
गोपियाँ ताकती रहीं राह
हरि की वृंदावन में

लौटता हूँ ठीक उसी रूप में
तुम्हारे पास मैं
नित्य
छिन-छिन
हर उस जगह
जहाँ अब रिक्तता
वास करती है
तुम्हारे न होने की…

पुकारता हुआ तुम्हें
गाता हुआ गीत—

लौट आ; ओ फूल की पंखड़ी
फिर
फूल में लग जा
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय।1शमशेर बहादुर सिंह की कविता-पंक्तियाँ

इस प्रतीक्षा में
कि कदाचित् लौट आओ तुम

यह जानते हुए भलीभाँति
कि प्रतीक्षाओं का अंत
किस गति को प्राप्त होता है!

आबंधन-फल

HAMM : […] Use your head, can’t you, use your head,
you’re on earth, there’s no cure for that!

— Samuel Beckett

ऐ ऋषि,
यह नारद का वंशज-कवि
चलकर आया है
तुम्हारे द्वार

नहीं मिटा सके
राग-द्वेष-द्वंद्व
लोभ-क्रोध-मोह
व समस्त द्वैत का
प्रस्फुटन अब तो
तुम्हारे श्रेष्ठ दर्शन
भक्तिमार्गीय
ज्ञानमार्गीय
अक्षय्य श्लोक सब
मुख्योपनिषद् भी

लौटालने आया हूँ समस्त ग्रंथ

अश्रु क्या ताकते हो?
यह तुम्हारे किस काम के?

जाते-जाते बस इतना कहूँगा
छोटा हूँ छोटे बोल कहूँगा
देह के आठ विकारों से अति बृहत् है
यह अंतःकरण में समाए
आठ लाख व्यथित तरंगों वाले
समंदर में होना

ऐ ऋषि! ऐ ऋषि!! ऐ ऋषि!!!

ॐ अशांति! ॐ अशांति! ॐ अशांति!


कुशाग्र मिश्र [जन्म : 2001] की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी साहित्य में परास्नातक [द्वितीय वर्ष] के छात्र हैं। ‘कथाक्रम’ और ‘दोआबा’ सरीखी पत्रिकाओं में उनकी कहानी और उनके किए काव्यानुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ उनके उन्नत अध्यवसाय और उल्लेखनीय काव्य-विवेक का पता देती हैं। उनसे auteurkushagra@gmail.com पर संवाद संभव है।

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