कविताएँ ::
स्मृति झा

इस वसंत…
वसंत मुबारक हो तुम्हें!
तुमने कितने वसंत बिताए
एक मुबारक वसंत के इंतिज़ार में
वसंत के जाते-जाते
और पलाश के खिलने से पहले
कितने फूलों को मुरझाते हुए
मैंने देखा है—
कितनी रातों में तुम्हारी आँखों को
पलाश हो जाते हुए
पलाश,
वसंत की क़ब्र पर खिले तुम वो फूल हो
जो पतझड़ के मारे पत्तों पर गिरकर
उन्हें गुलाल कर देगा
जाने कितनी रातों को फ़िरदौस
फूलों के ग़म में आँसू बहाएगी
और उन आँखों के रस को सुग्गे चूस ले जाएँगे
पलाश के रस कितने मीठे होते हैं न फ़िरदौस?
पलाश का रंग—
बिल्कुल तुम्हारी रस भरी आँखों जैसा
तुम्हारी आँखों में क्या-क्या है फ़िरदौस?
एक मुबारक वसंत की आस
या पत्तों के साथ गिरते उम्मीदों की राख?
वसंत एक भ्रम है मेरी फ़िरदौस
एक मृगतृष्णा है
जिसे एक बार देखकर
उसके पीछे भटकते
तुम्हारी आत्मा में महीनों कंकड़ चुभेंगे
तुम भूल गईं फ़िरदौस
उस रोज़ बाँधनी ओढ़े
एक नदी ने तुम्हें शाप दिया था
तुम्हारी लाल चुनर पर वह शाप
सफ़ेद बूटों की तरह छपता चला गया
वह भी तो वसंत ही था न
तुम शापित नदी-सी भटकती
नदी का ही शाप लिए
सूरज का पीछा कर रही थीं
मैंने देखा था तुम्हारे चेहरे पर
सफ़ेद बूटें उग आई हैं
और तुम्हारा प्रेम उस बाँधनी में लिपटा
क्षितिज की ओर बहता जा रहा है
क्षितिज तो एक रेखा की तरह ही है न फ़िरदौस
जो धरती और आसमान की दूरी को
कभी माप नहीं पाता
और वसंत बिल्कुल उस क्षितिज की तरह
जहाँ तुम उस धरती पर प्रेम के फूल उगाती हो
और आसमान तुम पर साये की तरह
तब तक मँडराता रहता है
जब तक वे फूल प्यास और ताप से तड़पते
तुम्हारे होंठों की तरह सुर्ख़ न हो जाएँ
उसे तुम्हारे होंठ सुंदर लगते हैं फ़िरदौस
लेकिन वह रंग चुराने आया है
चीज़ों का सुंदर लगना एक वहम है
सुंदरता एक त्रासदी है
हर क्षितिज एक छलावा
और हर फ़िरदौस
वसंत के मुबारक होने के इंतिज़ार में बैठी
एक मूर्ख लड़की
तुम देखना किसी रोज़ क्षितिज पर
पलाश के फूल खिलेंगे
एक सीधी रेखा में
उसके रस की सफ़ेदी
तुम्हारी आँखों में भर आएगी
तुम्हारे होंठों पर गिरता रस
तुम्हारे जीवन में मिठास भर देगा
और तुम्हारे होंठ पलाश हो जाएँगे
उस रोज़ आसमान अपने चुराए रंगों की गठरी लिए
तुम्हें देखता और ख़ुद को कोसता रहेगा
अपनी आँखों से कहो न थोड़ा कम बहें
पलाश का रंग तुम्हारे होंठों पर ही शोभता है
पलाश के रस कितने मीठे होते हैं न फ़िरदौस?
क्या तुम मीठी नहीं होना चाहतीं?
वसंत—
वसंत को भूल जाओ फ़िरदौस
ये सब फ़ालतू बातें हैं
रेत के शहर में कहाँ कोई फूल खिलता है
रेत से याद आया
तुम्हारा सबसे पसंदीदा पौधा तो कैक्टस था न?
क्या तुम्हारी स्मृति में काँटें उग आए हैं?
तुम्हें कुछ भी याद नहीं रहता इन दिनों
क्या तुम कैक्टस के काँटों पर
फूल उगाने के सपने देख रही हो?
फूल-वूल भूल जाओ फ़िरदौस…
देखो न चाँद कितना सुंदर है इन दिनों
अच्छा तुम्हें चाँद में क्या दिखता है?
क्या कोई आकृति समझ आती है…
बताओ ना…
तुमने वह मांडू वाली पुस्तक पढ़ी है?
पढ़ना…
औरत एक जादू होती है
चाँद को किसी औरत ने ही तो बनाया था
तुम देखना चाँद में
हाँ ग़ौर से देखना चाँद में
उस औरत की आत्मा में पड़ी खरोंचें दिखाई देंगी
कहते हैं वसंत ने उसे वह ज़ख़्म दिया था
जब वह किसी पर जादू कर रही थी…
लेकिन चाँद कितना फ़रेबी है न फ़िरदौस
हर दिन अपना रूप बदल लेता है
अच्छा तुम्हें फ़रेब समझ आता है?
एक दिन तुम समझोगी
चाँद के उस पार चाँद की आड़ में
फ़रेब ने एक दुनिया बना रखी है
उस दुनिया के लोग
फूलों के नाम पर
फ़रेब का सिक्का उछालते हैं
जो जाकर चाँद में चिपक जाता है
वे उसे अपना वसंत कहते हैं
अब तुम्हें चाँद में क्या दिखता है फ़िरदौस?
चाँद को एक औरत ने
अपने जादू से बनाया था
और औरत…
औरत एक जादू होती है।
कविता
कविता मेरी,
लोग जब-जब तुम्हें पढ़ेंगे
कोई विचार तलाशेंगे
वे कहेंगे वक़्त की यही ज़रूरत है
तुम अपनी मासूमियत बरक़रार रखना
मैं पूरी कोशिश करूँगी तुम्हें न छोड़ूँ
तुम्हें न छेड़ूँ
न ही बदलूँ तुम्हारे प्रवाह को
तुम बिखर जाना पृथ्वी के प्रत्येक कोने में
सहलाना उसके घाव
लेकिन ध्यान देना
कहीं कोई प्यास न मर जाए
अपना उद्गम और अंत
तुम ख़ुद निर्धारित करना
लेकिन कभी किसी समंदर से जाकर मत मिलना
वे कहेंगे तुम प्रेम हो
लेकिन तुम याद रखना
तुम प्रेम नहीं आग हो
जिसके सिरहाने बैठकर
व्यक्ति के सीने का पत्थर पिघलता जाता है
उसका प्रेम उसकी रगों में उतरता है
एक नई रचना बनकर
तुम मत बनना कभी किसी की प्रेयसी
वे तुम्हारे सबसे कोमल अंगों को निहारेंगे
एक-एक शब्द खोलकर करेंगे तुम्हें निर्वस्त्र
तुम्हारे गठन को जाचेंगे
याद रहे!
उन्होंने विमर्शों को पढ़ रखा है
उन्हें पता है दबाने से तुम सतर्क हो जाओगी
इसलिए तुम्हें सहलाकर मरोड़ देंगे
और अगर वे सफल न हो पाए
तो कह देंगे तुम मुकम्मल नहीं हो!
चाँद
मैं कोई दावा नहीं कर रही
लेकिन देखना एक रोज़
उस व्यक्ति की गोद में उगेंगे कुछ शब्द
कविता बनकर
जिसके भीतर का कवि
निरंतर मरता जा रहा है
देखना बरसेंगी फुहारें उस स्त्री पर
जिसकी कोख छन्नी हो चुकी है
झूठे वादों की गोलियाँ खाकर
देखना हर उस बच्चे की
जेब में मिलेंगे कुछ बेर
जो देखता है फुटपाथ से
एकटक तुम्हारी ओर
तुम देखना चाँदनी ख़ुद आकर
बुझाएगी तुम्हारी प्यास
जब तुम आओगे हकासे-पियासे
दफ़्तर से एक रोज़
देखना तुम्हारे आँगन में खिलेंगे
रातरानी के फूल
और उसकी सुगंध थिरकेगी
तुम्हारे बदन पर मह-मह करके
यह वादा तो नहीं
लेकिन देखना हर मन होगा शांत
हर कलेजे को मिलेगी ठंडक
और दिल को यक़ीन
आओ देखो,
मैंने चाँद बोया है।
फिर चाँद
बच्चे झूमते हुए गा रहे थे
चाँद और चाँदनी के गाने
लेकिन उस रात चाँदनी नहीं थी
कहीं नहीं थी
चाँद उस रोज़ अपनी चाँदनी के साथ
महुए की गंध में नहाए
सखुआ की टहनी पर
लुका-छिपी खेल रहा था
एकाएक सारे पेड़ कटकर गिरने लगे
चाँद को गहरी चोट आई
चाँदनी इलाज के चंद रुपये जुटाते-जुटाते
अचानक कहीं ग़ायब हो गई
पता नहीं कहाँ?
किस देश?
किस शहर?
चाँद को जब होश आया
उसने सब द्वार खटखटाए
पुलिस… अदालत… मीडिया…
तलाश जारी रही…
उसे समझ आया
यहाँ सबके अलग-अलग चेहरे हैं
तब से चाँद अपनी चाँदनी को ढूँढ़ता
हर रोज़ पृथ्वी के चक्कर काट रहा है।
डरो
पुराने पुल के समानांतर
सदा एक नया पुल
खड़ा करने से पहले डरो
बग़ल में खड़ा पेड़
तुम्हारे फ़रेब का गवाह है
पत्तियों से लटकता समय
तुम्हें देख रहा है
एक दिन उसी पुल के नीचे
तुम दफ़्न हो जाओगे
यही पत्तियाँ झरेंगी
तुम्हारी क़ब्र पर
और समय तुम्हारे कान में
धीरे से जो कहेगा
उसे तुम कभी सुन नहीं पाओगे।
नदी
नदी एक फूल है
प्रवाह उसकी चेतना
मन उसका पानी-सा
पानी उसकी वेदना
नदी का एक गतिरोध है
गतिरोध है वह बाँध
जो ठीक तभी रोकेगा उसके प्रवाह को
जब सबसे तीव्र होगी उसकी चेतना
और प्रबल उसकी वेदना
नदी सहनशील है
वह धीमे से झुक कर
निकल जाना चाहती है
लेकिन उसकी छाती पर
गतिरोध का तीव्र भार
उसे पीस देता है
वह चीत्कार उठती है
वह पिसकर भी नया करेगी
बढ़ती रहेगी
आग बनेगी
नदी की आँखें लाल हैं
लाल ही से जीवन है
आग ही से सृजन है
आग से रक्त में उबाल है
रक्त पानी-सा बह रहा है
पानी जो आग का स्रोत है
स्रोत जो हर क्रिया का आधार है
इन सबके बीच फँसी
धागे-सी मेरी आत्मा
टूटती-जुड़ती
पानी और आग के बीच
नदी-सी गुज़रती
झरनों-सी गिरती
बिखर-बिखर सिमटती
इन इंद्रधनुषी रंगों में भी
देखो नदी कितनी अनुकूल है
नदी एक फूल है।
स्मृति झा की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में हिंदी विभाग की शोधार्थी हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताओं की प्रवाहशीलता और पीड़ा याद रह जाने योग्य है। इनमें उपस्थित एंथ्रोपोसीन-आयाम एक सरल-सी नज़र आती काव्य-भाषा में व्यक्तिगत को औचक प्रकृतिगत में और प्रकृतिगत को औचक व्यक्तिगत में बदलते हैं। इन कविताओं की कवि से smritijha1608@gmail.com पर संवाद संभव है।