कविताएँ ::
सृष्टि वत्स

सृष्टि वत्स

आरक्षण

अभी-अभी पोंछे गए आँसू
जो बिल्कुल ताज़े हैं
उनमें बंजरपन की आशंका है
वह जो नमी तुम्हें दिखी होगी
तुम्हारी आँखों का सबसे बड़ा धोखा है
वह जो जा चुका है
उससे अत्यधिक प्रेम करना
वह कभी पलट कर
तुम्हारा प्रेम देखने नहीं आएगा
उम्मीद रखो…
दुःख और सुख से अलग
नए भाव को जन्म दो
जो तुम्हारा मौलिक हो
और जिसके तुम क़र्ज़दार न हो
तुम पाओगे कि शून्य जीवन है
और एकांत
कभी न आरक्षित किया जाने वाला
एक महत्त्वपूर्ण शब्द

मानचित्र

दो रास्तों को हमेशा एक ओर
चलते हुए पाया मैंने
क़रीब उस वक़्त जब मैं
रास्ता ख़त्म करने को हूँ
रास्ता—रास्ता ही रहा

उड़ती हुए चिड़ियाँ
दिशा नहीं बता पाएँगी
ग्लेशियर में दबे एक
हरे पत्ते का टुकड़ा मात्र था
खुदाई के दौरान अनिच्छा से
जिसकी शनाख़्त की गई थी

मौन से भविष्य के सारे युद्ध
समाप्त हो जाते हैं
वरना यह बताया जा सकता था
कि हरे पत्ते का टुकड़ा
किसी हरे फूल की
पंखुड़ी भी हो सकता है

दीवार पर जो निशान है वह मानचित्र है
मानचित्र के सहारे हर जगह नहीं पहुँचा जा सकता
वरना अब तक उस जगह का पता
लगाया जा सकता था
जहाँ अब तक पहुँच जाना चाहिए था

दया का नाटक

समय को कुछ भी ढकने के नियम नहीं आते
हमारा यूटोपिया एक बूढ़ा वैद्य है
यह कोई मानसिक दशा हो सकती है
जिसे मैं सुलझाना नहीं चाहती
भागते रहना—भागते रहने की एक अवस्था है
मैं चाहती हूँ हवा थोड़ी देर के लिए रुके
ताकि मैं सुन सकूँ न कहने लायक़ शब्द
यह कितना भयानक है कि
किसी शहर के प्रेम में
लंबे अरसे तक नहीं रहा जा सकता
इसे जितना भी फ़ैंटेसाइज़ किया जाए
एक झूठ बन कर मन के कोने में ठहाका लगाता रहेगा
हम इन सबसे बचना चाहते हैं
जैसे हम बचना चाहते हैं
गुनगुने से गर्म की ओर बढ़ने से
गुलाबी के सुर्ख़ होने से
पत्तों के सूख जाने से
फटी हथेलियों के राज़ खुलने से
लचीलेपन के बुत बन जाने से
हम सबसे ज़्यादा डरते हैं अपने आपसे
अब मेरे पास कोई प्रेरणा नहीं बची

सार्थक चीज़ों का अपना एक फ़रेब है

एक दिन यह तय था कि
यह दुनिया ईश्वर बचाता है
वह मर गया नीत्शे के हाथों
एक बेढंगे-से इल्ज़ाम में
फिर यह दुनिया माँ बचाती थी
उफ़् क्या जाहिल होने का और कोई प्रमाण नहीं
मैं इस तरह के किसी भी षड्यंत्र से
अब बचना चाहती हूँ
औरत, स्त्री, प्रेमिका…
ये दुनिया के सबसे मुर्दा शब्द हैं
जिसे एक नपुंसक और बीमार मानसिकता
अपने साथ ढोती रहती है

यह दुनिया कौन बचाएगा
कोई नहीं, बिल्कुल नहीं

हम सब एक ढलाननुमा विचार और स्थिति में जीते हैं
हमें लुढ़कते देर नहीं लगेगी
जब तक झूठ हमें बचाए हुए हैं
मेरे अंदर अब किसी भी तरह की आशा जन्म नहीं लेती
आशा एक ज़हर का काम करती है
इसे समझने के लिए मैं
अट्टालिकाओं की लाल-पीली रौशनी देख रही हूँ

मैं बचना चाहती हूँ सवालों से
जो हाशिये पर एक ही स्थिति में वर्षों से खड़ा है शांतिदूत लिए
क्या तुम हमें अपनी आशाओं से इतनी बेरहम मौत दोगे
हमें मत बचाओ तुम्हारी दया हमें दर्दनाक मौत देती है
बूढ़े भिखारी की हड्डी जितनी
चमड़े के अंदर धँसी है उतनी ही बाहर

हमें दया के नाटक से बचना होगा
सबसे निर्दय हमारी दया है

कई दिन बीत गए ट्रेन आई और चली गई
लोहे के टकराने की आवाज़ लगातार आती और जाती रही
लेकिन एक दृश्य मेरे मन में फफूँद की तरह फैलता रहा

दया न होती तो निर्ममता होती
निर्ममता दुःख और आघात से बचाती है

चीज़ों के सटीक होने के नियम ने विध्वंस फैलाया है
मेरी हत्या कर दो
तब भी मेरी राय यही रहेगी कि
दया दयावान् होने से बचाती है

वर्जित

नदी के बीच में जो चट्टान है
वह किसी मोम की मानिंद
पिघल कर वहीं ढेर हो जाता है
और मालूम होता है वह जस का तस है
मुझे उसी चट्टान के ढेर पर लिए चलो
और इस तरह प्रेम करो कि
सूरज तारों की ज़द में आ जाए
कपड़े तैर कर पानी में डूबते
किसी प्रेमी तक पहुँच कर उसे सहारा देंगे
मेरी साँसों की लय के साथ
मेरे स्तनों का उभार
नदी की परछाईं बन जाएगा
अपनी छाती की चौड़ाई में
मुझे इस तरह समेट लेना कि
नदी कछुए के साथ अंतराल में चली जाए
अपनी उँगलियों से मेरे शरीर के हर हिस्से को
इस तरह छूना कि सिहरन पैदा हो
और पेड़ गिरा दे अपने सारे फूल
पराग और पंखुड़ियों के बीच
बंद है जो हया का मेहराबदार उसे खोल
कि जैसे खुलते हैं दो पुर-कशिश होंठ

शस्त्र

कितना सुख है इस बात में
कि मैं तुम्हारे बारे में सोचते हुए
तुम्हें छू सकती हूँ और कुछ लोग
छुअन की पवित्रता से बचे रह जाते हैं
तब मैं विजेता की तरह महसूस करती हूँ

कितना सुख है इस बात में
कि इस पूरे संसार में
तुमने सिर्फ़ मुझे चाहा
जबकि तुम चाह सकते थे
किसी भी रूपकन्या को
और सबसे सुंदर होने का गर्व
मेरे होंठों को सुर्ख़ बना देता है

कितना सुख है इस बात में
कि बियाबान से जंगल के टेसू का रंग
धीरे-धीरे तुम्हारे गले के
निचले हिस्से पर चढ़ता है

एक मैं हूँ
एक तुम हो
और सफ़ेद बारहमासा के फूल बरसते हैं
यही मेरे जीवन का वसंत है

यह दौर नरसंहारों का है
ख़ून जमने वाले रोगों का है
घुटते दमों के बावजूद
जीने की मजबूरियों का है
शोषितों और शोषण का है

कितना सुख है इस बात में
कि हम सबसे मजबूत शस्त्र के साथ पैदा हुए
जिससे युद्ध किया जा सकता है
इन सभी वीभत्सों से

हम प्रेम के साथ जन्मे

नई शिक्षा-पद्धति

कुछ पुरुष
केवल इसलिए माफ़ कर दिए जाते हैं
क्योंकि वे पिता या भाई या
बाप-दादाओं की ही कोई संतान हैं
और हम अपनी ही माँओं की चिता पर
रोज़ अपनी-अपनी चुप्पियों के सफ़ेद फूल चढ़ाते हैं

मेरी नानी गूँगी थी
यही गूँगापन उसने अपनी बेटी को दिया
पीढ़ियों की परंपरा की तरह माँ
मुझे दान करती अपना गूँगापन
इससे पहले ही मैंने उसे दिया बहरापन
उसने ख़ुद चुना अंधापन

जो गूँगे होते हैं
वे निश्चित ही बहरे भी होते हैं

गूँगे, बहरे और अंधेपन से दुःख कम नहीं होते
वे गहरे रोग में बदल जाते हैं
यह रोग संक्रमण का है
और अब पैंतालीस की अवस्था में
मैं तुम्हारी परवरिश करूँगी
तुम्हें मेरी उम्र में लौटना होगा
मैं तुम्हें सिखाऊँगी नसबंदी करने का हुनर
ताकि तुम काट सको पितृसत्ता की नसें
यह मेरी दया नहीं है तुम पर
मेरे ऊपर मेरा ही उपकार है

मैं तुम्हारी दोनों आँखों में
सैकड़ों सूरजमुखी के बीज बोना चाहती हूँ
ताकि एक घना जंगल उग आए
और तुम तन कर खड़ी रह सको
किसी भी तीव्र रोशनी की आँखों में देखते हुए

लाल रंग से अब तुम्हें ऊब जाना चाहिए
तुम यह जानो कि मोगरे का भी एक रंग है
तुम्हें चुनना चाहिए सफ़ेद
ताकि हर युद्ध की आशंका के पहले क्षण ही
तुम उससे लिपट कर चिरनिद्रा में सो जाओ

ऑर्गेनिक

मैंने सोचा तंग सड़कों पर
मैं तुम्हारा हाथ पकड़ूँगी
उभरी हुई रेखाओं वाली
हथेली को बढ़ाया तो तुम नहीं
सिसिफ़स का मिथक था

मेरे रास्ते वह गली पड़ती है
जहाँ से गुज़रते हुए
बनास फटने लगते हैं

ट्रेन से सफ़र करते हुए
चाँद को अपने साथ लिए चलने की
बेताब इच्छा हुई
मगर खादी-कपड़े में कोई
पुर्ज़े कस रहा था
क्या मैं ऐसा करूँ कि जो
कभी न घटने वाली घटनाएँ हैं
जो मुझे पागल सरीखा बनाती हैं
उन्हें मैं दान कर दूँ
जली हुई ज़मीन पर
बचे हुए गुलंच के फूल को अपने निमित्त से
जली हुई ज़मीन की राख
ऑर्गेनिक खाद बन जाएगी

जो कभी था ही नहीं

एक जाड़े की रात
जो कुछ भी मुझमें बचा है
वह किसी चौपाटी पर जला कर
हाथ सेंक लिया जाएगा
और उसकी राख
माँजने के काम भी नहीं आ पाएगी
आते-जाते लोग मुँह ढाँप लेंगे
वह उड़ता रहेगा जो जलता हुआ है
एक सुबह सब धुआँ हो जाएगा
कोहरे के साथ कहीं
कोहरे के बीच छुपता हुआ कहीं
काँच पर सरकता हुआ कहीं
कोई बैठेगा पहाड़ पर एक उदास शाम में
मुझे याद करता हुआ कहीं
अपनी हथेलियों से अतीत को टटोलता हुआ
एक किरण के साथ सब मिट जाएगा
चौपाटी की आग
हर स्थान का कोहरा
उदासी की जड़
और वह जो कुछ मुझमें बचा रह गया था
सबसे बड़ा सदमा
जो मुझमें व्यतीत हो चुका है
सब मिथ्या हो जाएगा
यदि तुम मुझे आलिंगन करो
जैसे लीच चिपकता है इंसानी देह से
और नमक का अस्तित्व ख़त्म कर दो
तब मैं नदी बन जाऊँगी
और रेत की तरह बजाएगा
मुझे मेरा अवसाद

अब चलना होगा

चैत्र के महीने में बादल कहाँ से उड़ते हैं
मॉड्यूलर किचन में गुप्त चुंबन के लिए रास्ता बन गया
पीले पत्तों के रास्ते मैं आज फिर गई
मेरा इक्कीसवीं सदी का प्रेम शोक में डूब गया
खेतों की वह गर्मी वाली छाया
बिना नंबर वाली काले रंग की मोटर-बाइक
सफ़ेद शर्ट वाली गुलाबी ख़ुशबू
और जंगली फूल
अब हमारे नहीं हैं
जहाँ से मेगापोलिस के नाख़ूनों के दस्तावेज़
आज बादलों के साथ उड़ गए
टूटा हुआ चेहरा, व्यर्थ ज्यामिति, मुर्दा बातें
आज रॉबर्ट के दलानों में हैं
मंदिर में लिखे अक्षर
जिसका अर्थ कोई नहीं जानता

योग्यता

मैं भी बचाना चाहती हूँ—
पहाड़
नदी
जंगल
ज़मीन
हक़
कोयले की खदान से रँगे हुए शहर
टूटते हुए पुल
धँसी हुई संवेदनाएँ
चीख़ते हुए सन्नाटे
बिसरे हुए गीत
मुलायम हाथ
बढ़ती हुई आत्महत्याएँ
किसी का खोया हुआ प्रेम
किसी की खोई हुई पसंद
फूलों के बग़ीचे
ख़त्म होती नस्लें
जाति का बोझ
बिगड़ी हुई याददाश्त
अपभ्रंश भाषा
सड़ी हुई राजनीति
लुटी हुई इज़्ज़त
किया हुआ वादा
मगर मैं एक दोयम दर्जे की
कविता भर लिख सकती हूँ
और इतने भर से नहीं बचाई जा सकती हैं चीज़ें

तत्काल स्थगित

कुछ जगहों पर जाना वर्जित कर दिया जाना चाहिए
जैसे कल्पनाओं और अतीत में
कल्पनाएँ झूठा सुख देती हैं
और अतीत स्थायी दुःख
मैं अभी अतीत और कल्पनाओं के बीच की अवस्था में हूँ
मेरे पास महज़ बोरियों में भरी किताबें हैं

पहली पंक्ति पढ़ते ही बेचैनी होती है
दूसरी पंक्ति से सब्र का जन्म होता है
जीने के लिए यही सब्र काम आएगा
सब्र दुःख का शाब्दिक अर्थ है
मैं रोज़ देखती हूँ गिलहरियों का दुःख
जो कमरे में झाँकती हैं
उसकी कोमल देह को कोई स्पर्श नहीं करता
उसके शरीर की धारियाँ
इस बात का पुख़्ता सबूत है
कि भावनाओं के भी निशान होते हैं
वह भी कभी नहीं मिटने वाले
हल्के-हल्के निशान
मेरे कमरे की दीवार पर छोड़ जाती है
कितनी ही ज़िंदा चीज़ें हैं मेरे पास
और यही मेरा स्थगन है

शनाख़्त

जैसे धार्मिक स्थल पर
किसी ईश्वर के पैरों के निशान की शनाख़्त होती है
जो सच और झूठ के बीच का मसला है
ठीक मेरे शरीर पर भी
स्पर्श के गहरे निशान हैं
शनाख़्त में तुम्हारा नाम है
गहरे काले रंग में
स्पर्श भी यदि गहरे काले रंग का होता
तो मेरे शरीर पर उभर कर दिखता

उस इत्र की ख़ुशबू झूठ नहीं है
जब तुम्हें अकारण ही
मुझसे विदा लेनी पड़ी थी
उस इत्र की ख़ुशबू अब भी इकट्ठा है
मेरे बाएँ कंधे की हड्डियों की खाँप में
उड़ने के पहले की ख़ुशबू
शनाख़्त के पहले का प्रकरण
और ठीक तुम्हारे जाने के पहले कि ‘मैं’
जस का तस धरा हुआ है जैसे
किसी की हत्या के बाद
घटना-स्थल पर लगी
पीली पट्टी के अंदर की जगह


सृष्टि वत्स की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह आमड़ापाड़ा, झारखंड से हैं और उनकी उच्च स्तरीय पढ़ाई महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय [वर्धा] से हुई है। वह शांतिनिकेतन में हुए हिन्दवी कैंपस कविता के विजेताओं में रही हैं। यह ‘सदानीरा’ का सौभाग्य है कि उनकी कविताएँ ‘सदानीरा’ को प्राप्त हुई हैं। उनसे sylvia.srishti@gmail.com पर संवाद संभव है।

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *