कविताएँ ::
विनय चौधरी

विनय चौधरी

गढ़ी हुई मान्यताएँ

हमने गढ़ी मान्यताएँ
गढ़ते ही चले गए।

हमने रचे ईश्वर
मनुष्यों से भी ज़्यादा
और कहा कि ईश्वर हमें रचता है।

हमने स्वर्ग-नरक
पाप-पुण्य
कर्म के सिद्धांत रचे।

हमारे प्रश्न भी हमने ही गढ़े
और उनके उत्तर भी।

हमने गढ़े नियम स्त्रियों पर
और दलितों पर भी।

हमने जितनी गढ़ी मान्यताएँ
सबको दैवीय गढ़ा
और हम आज भी गढ़ रहे हैं
गढ़ते ही चले जा रहे हैं
कई सारे ईश्वर
कई सारे नियम और
कई सारी मान्यताएँ!

तुम्हारी और मेरी भाषा

तुम्हारी भाषा के शब्द नहीं मिलते
मेरी भाषा के वाक्य-विन्यासों में
इसलिए तुम मुझे ख़ुद से अलग कहते हो

पर उस भाषा का क्या हुआ
जिससे पिघल जाया करते थे—
पाषाण-हृदय
जो बनी थी केवल
प्रेम-अभिव्यक्ति के लिए?

तुम कैसे भूल गए
करोड़ों वर्ष पुराना वह रिश्ता
जिसमें तुम मेरे सबसे प्रिय थे
बिना व्यंजनों और स्वरों के भी

तुम धरती के सबसे निचले भाग में रहते हो
फिर भी मैं तुम्हें हिमालय के शिखरों से
आवाज़ देता हूँ
क्योंकि हमारे मिलन से ही पिघलेंगे
हिमालय के हिमखंड
और सदियों से जमी मलिनता
समुद्र की ओर बह निकलेगी

हम दोनों की स्नेहपूर्ण अश्रुधाराएँ
मान्यताओं के मरुस्थलों में भी संतृप्ति भर देंगी

तुम कैसे भूल गए हड़प्पा की वह भाषा
जो अब तक अपठनीय है
क्या उन आड़ी-तिरछी लिपियों में
तुम्हें अपनत्व नहीं दिखता?

क्या पाली, प्राकृत, ब्राह्मी, खरोष्ठी…
तुम्हें लिपियाँ नहीं लगतीं
क्या भारत के सबसे आदिम इलाक़ों की बोलियाँ
तुम्हें बोलियाँ नहीं लगतीं?

तुम्हारा वाचन चाहे संस्कृतमय रहा हो
पर मेरी टूटी-फूटी भाषा को असमर्थ मत कहो

यह घर उतना ही तुम्हारा है
जितना मेरा
अब तुम्हें लौट आना चाहिए
क्योंकि पिता की उम्र कम होती जा रही है

तुम्हें भाषा की आवश्यकता समझनी चाहिए
और मौन की भी।

तुमसे मिलने की प्रबल आकांक्षा

और अधिक स्थगित नहीं कर सकता
तुमसे मिलने का बेमुरव्वत विचार।

देखो,
देखो अतिविचारशीलता से
निर्बंधित मेरा यह मस्तिष्क।

प्रतीक्षा की गोली पर अंकित है मेरी
व्याकुलता का नाम
अग्निष्टोम और राजसूय यज्ञों से भी जैसे
नहीं लौट सकता हो प्रेम का राजसिंहासन।

फिर लौट आओ… तुम्हें कहने में ये शब्द
स्मृतिहीन जान पड़ते हैं अपनी अर्थवत्ता में
हम दोनों के संवादों में नहीं
मौन में उपस्थित रहा वह
जिसे मैंने प्राप्त करना चाहा
और तुमने उसे दृष्टियों में भरकर भी
अदृश्य कहा।

शवों पर होती निरर्थक धन और पुष्पवर्षा नहीं हूँ मैं।

मैं तुम्हें तुम्हारे कर्णपत्र-छेदन की प्रथम रक्तनिर्मित भयावह स्मृति से भी उभार लूँगा।

देखो,
देखो तुम्हारे अभाव में उद्विग्नता
मुझे आवासहीन कर चुकी है

देखो,
देखो मेरे धैर्य की
सूली चढ़ी अकुलाहट

देखो,
देखो मैं वही हूँ जो नहीं दुहराता
स्वघोषित महात्माओं की सूक्तियाँ

देखो,
देखो मेरी प्रेरणाओं की
अप्राप्य तृष्णा

देखो,
देखो मेरे अश्रुब्ध गालों का खारापन
प्रतिक्षण प्रभावित मेरे धँसे नेत्र तो देखो

देखो,
देखो जैसे शहरों में स्थापित यायावर मुड़कर देखते हैं
अपने गाँवों को

देखो,
देखो जैसे माँ अपने शिशु को
देखती है

देखो,
देखो तुम्हारे देखने से उग सकते हैं
मुझ ठूँठ में गुलमोहर
उपज सकती है
मुझ निर्वासित कृषक की लहलहाती फ़स्ल।

देखो,
देखो तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा
शहर की वीरान पड़ी गलियों में
पर्वतों के शिखरों पर
तुम्हारे शहर की तीव्रतम बसों में।

मुझे तुम्हारा प्रथम स्पर्श याद आ रहा है…

अनुपस्थिति की उपस्थिति

कुछ गहरे गुलाबी धब्बे
छोड़ चुके हैं मेरे कपड़े
अब उन पर आँसुओं के दाग़ हैं
और कहीं-कहीं रक्त के भी।

अब उँगलियाँ रख देने से भी
जीवंत होकर नहीं मचलते
किताबों के शब्द।

अब जल के अभाव में
मैं एक मछली-सा तड़पता हूँ।

अब मैं पानी में
चित्रकारी कर
मिटा देता हूँ
और आसमान में
घर निर्माण कर
ढहा देता हूँ
अब कोई तितली
नहीं उड़ती
मेरे आस-पास
पुष्पों को निचोड़कर देखता हूँ
पर सुगंध नहीं आती
जैसे मिट्टी खुरचने के बाद
नाख़ूनों में
रह जाती है मैल
जैसे घाव भरने पर भी
नहीं जाता दाग़
वैसे ही
एक अनुपस्थिति
उपस्थित है
मुझमें…

अनुनयशील

सर्जनात्मकता के प्रखर बिंदु पर
तुम प्रारंभ की अस्पष्टता देखना
कविता में शब्द-पाक की जब स्थिति हो
देखना प्रस्फुटित प्रथम शब्द को

देखना अनुभव के चरमोत्कर्ष पर
अपरिपक्व और लालसाग्रस्त आश्चर्यों को
तुम अगली मंज़िल देखने से पूर्व
मुड़कर देखना पार कर चुकी सीढ़ियाँ

तुम मुझे देखना
परिचय की पीठ पर कोड़े बरसा
ऐसे जैसे प्रथमदृष्टया देखा हो

ऐसे कि मैं घोड़े की नाल की ताल पर
टप-टप थिरक सकूँ

ऐसे कि झूला झुलाने से पूर्व ही
अनायास हवा से भर जाए मेरा पेट

ऐसे कि देह की अंतिम कोशिका में भी सिहरन उठे
और उपन्यास की अंतिम पंक्ति भी अर्थ दे

तुम इतनी देर न करना आने में
कि मुझे कहना पड़े—
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ…1अहमद फ़राज़ की पंक्ति

तुम मुझे ढूँढ़ लेना
रखकर भुला दी हुई वस्तु की तरह

वैसे भी मैं कर ही क्या सकता हूँ
प्रार्थना के सिवा

स्त्रियोन्मुखी

परिस्थितियाँ बदल गईं
पर अवधारणाएँ नहीं

पुरुषों को स्त्री का सौंदर्य ही
आकर्षित करता है

आज भी भोजन बना लेने की योग्यता ही
निर्धारित कर देती है उनका चरित्र
किंतु यह कोई आदर्श वाक्य नहीं

हाँ, मैंने बार-बार चाहा
कि मेरे पुरुषार्थ को किनारे कर
मुझे शिशु की भाँति चूमा जाए
ताकि मेरे व्यक्तित्व में
दिख जाए एक शिशु का व्यक्तित्व

मेरे पास सांत्वनाएँ नहीं
पर तुम्हें सुनने का समय है

तुम बता सकती हो
शोषण का प्राचीनतम दुष्चक्र
ऐतिहासिकता का वह प्रत्येक क्षण
जो तुम्हारे विरोध में था
अपनी असमर्थता जानते हुए भी
मैं उससे घृणा करता हूँ

हम प्रतिरोध करेंगे
पर बरसाती कीड़ों-सा नहीं

हम समझदारी दिखाएँगे
मगर इतनी नहीं
कि गूँगे हो जाएँ

वे परिवर्तन को देखते हुए भी
पितृसत्ता नहीं छोड़ेंगे
अपवादों को दरकिनार करते हुए
हमें होना ही होगा—
स्त्रियोन्मुखी!

मैंने स्वप्न में किया है प्रेम

हृदय में उग रहे पुष्पों की क्या अभिलाषाएँ हैं
क्या हैं मृत्यु से उपसर्गार्थ उपस्थित आकांक्षाएँ?

गांडीव की टंकार-ध्वनि से
प्रश्न चीत्कारते हैं कान
और सीने को चीरता निकल जाता है
उपेक्षा का प्रत्येक वाक्य

क्या सच में मुझे
संवेदनशीलता की बाढ़ ने डुबो दिया?
तुम्हारे स्पर्श को लालायित देह देखता हूँ
फिर देखता हूँ स्वयं से शर्मिंदा होते स्वयं को

मैंने बचा रखा है तुम्हारे लिए
ज्वालामुखी से प्रस्फुटित लावा
झूले की अद्वितीय गति
पहाड़ों पर गर्म झीलें
ईश्वर से आश्चर्यवान् विषय
अपनी देह के घावों से रिसता रक्त
जिसमें तुम मिट्टी भी भर सकती हो

मेरे पास गंध को सुगंधित करती
तुम्हारी दी हुई देह-गंध है

मैं क्रौंच के लहू से करुण हुआ
और रेत से बनाया है घर

मैंने स्वप्न में किया है प्रेम
बादलों से बनाई है प्रेमिका

जबकि मुझे तुम्हें बनाना चाहिए था
धरती पर पड़ी
एक पसीने की
दो आँसुओं की
और तीन रक्त की बूँदों से।

किसी के न होने में अपना न होना देखता हूँ

बैठे-बैठे समीप के ख़ाली स्थान को
ऐसे देखता हूँ
जैसे स्वयं को देखता हूँ—
अदृश्य!

किसी के न होने में
अपना न होना देखता हूँ
जैसे वृक्षों को देखता हूँ
बिना घोंसलों के।

बिना आवाज़ की कोयलों को सुनता हूँ
बिना अर्थ की कविताएँ पढ़ता हूँ
बिना स्वाद का भोजन करता हूँ
जैसे बिना नींद के सोता हूँ
और बिना मक़सद के जागता हूँ।

मैं अब बालों में हाथ नहीं चलाता
कपड़ों पर गंध नहीं छिड़कता
रोता हूँ तो आँसू नहीं निकलते
और…


विनय चौधरी [जन्म : 2006] की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह बुरहानपुर [मध्य प्रदेश] से हैं और फ़िलहाल श्री अटल बिहारी वाजपेयी कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर में बी.ए. द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। उनसे vinaychoudhary934000@gmail.com पर संवाद संभव है।

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