कविताएँ ::
ज़ोहेब ख़ान

कर्ट कोबेन का मुरीद
मैं लाया था उसके बैंड की टी-शर्ट
छीन कर मुझसे उसे उसने जलाना चाहा
क्या यह हमारे लिए हराम नहीं है?
उसके गानों को सुन कर
लगता था ऐसे
कि दौड़ रही हो नसों में
ख़ून की जगह कोई ड्रग
आवाज़ थी उसकी
बंद मुट्ठी से फिसलती रेत
मैं पूजता था उसे
रखता था उसके जैसे लंबे बाल
पहनता था उसके जैसी फटी जींस
नशा भी कर लेता था
सोचता था ख़त्म कर लूँगा
सत्ताइस की उम्र में
अपनी ज़िंदगी
पैर के अँगूठे में रख कर
चला कर ट्रिगर
पर हुई हताशा
जब अट्ठाईस का हुआ
एहसास हुआ
कि यह ज़िंदगी है
और ज़िंदगी का होना
अपने आपमें
एक हादिसा है
और ख़ूबसूरती भी
वह टी-शर्ट अब भी है मेरे पास…
डॉलर के एक नोट को
पकड़ने की कोशिश में
तैरता एक नग्न शिशु।
च्यूइंग गम
अचानक चिपक गया
मुँह के तालू में
उँगलियाँ डाल कर
छुड़ाने लगा
एक ख़्वाब दलदल भरा
ख़ुद को दोहराता रहा
जब सात की मेरी उम्र थी
कुछ आदमियों ने मिल कर
उतारी थी मेरी पैंट
और मेरे लिंग के क़रीब
रखी थी बिजली वाली आरी
चीख़ रहा था मैं मदद के लिए
साँस फूलने लगी थी
खड़-खड़-खड़-खड़!
दानव जैसी दाँतों वाली वो आरी
घेर रखा था उन्होंने मुझे
वे मर्द भी थे और छोटे बच्चे भी
मुँह से उड़ा रहे थे बुलबुले
धस-धस-धस-धस!
ज़मीन पे पटकते थे पैर
काली तपती धूल उड़ी
मेरे चेहरे से चिपक गई थी
हा-हा-हा-हा!
मेरी बिलखती चीख़
डूब गई थी
उनकी ठिठोली के शोर में
घेरा और गहरा होता गया
जैसे चींटियाँ
गिरे हुए तिलचट्टे पर
थोड़ा-थोड़ा करके
मैं अपनी ख़ुद्दारी गँवाता रहा
खुरचने लगा
ख़ुदकुशी की दीवारों को
हर रात
अफ़सुर्दगी की चादर ओढ़े
सो जाता हूँ
अब हर चीज़ में
ख़ुद को कमज़ोर पाता हूँ
लोगों से बचता हूँ
तन्हाई अब आदत बन गई है
ख़ुद-यक़ीनी का बुलबुला
फूट कर हो गया फ़ानी
पीछे मुड़ता हूँ
तो वही चेहरे तलाशता हूँ
नफ़रत के फंदे में
उन्हें झूलते देखना चाहता हूँ
उस दिन कट सकता था मैं
अपना लिंग खो सकता था
आज तक नहीं भूला
वह खड़खड़ाती आवाज़
जो बढ़ रही थी मेरे नज़दीक
उस शोर-ओ-गुल में
मैं खींच कर निकालता हूँ च्यूइंग गम
फिर भी रह जाता है मुँह में चिपका।
बदलाव
मुझे जब तुमने मेरे नाम से पुकारा
दो प्रेमी तेज़ बारिश में
चलते रहे बिना भीगे
जब तुमने अपनी ज़ुल्फ़ लहराई
मेरी गर्दन पर
रेंगती एक इल्ली
तितली में बदल कर उड़ गई
जब तुमने अपने होंठ
मेरे होंठों से मिलाए
बिरयानी और गुलाब जामुन का स्वाद
तब पूरा हुआ
भूखा आदमी आज पेट भर सोएगा
कमल खिलने के लिए कीचड़ फैला रहा था
तुम और मैं गुलाब को बचा रहे थे काँटों से।
ज़ोहेब ख़ान की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। वह पैंतीस वर्ष के हैं और हिंदी तथा अँग्रेज़ी दोनों ही ज़ुबानों में लिखते हैं। वह बतौर अभिनेता और कास्टिंग डायरेक्टर भी सक्रिय हैं। बेंगलुरु में रहते हैं। उनसे zoheb.poetry@gmail.com पर संवाद संभव है।