कविताएँ ::
अंचित

प्रिय पाठक,

ये कुछ कविताएँ हैं जो जब लिखी गईं, इनके प्रकाशन को लेकर कोई क्षुधा मेरे दिल में नहीं थी। इन कविताओं के लिखे जाने के पीछे न किसी तरह का प्रेम था, न कोई और भावना सिवाय आसक्ति के, स्वयं के प्रति आसक्ति और कुत्सित और त्याज्य का प्रेम। इनसे किसी प्रकार का नायकत्व मेरे जीवन में आता हो, तो उसके अवसरों को मैं अपनी तरफ़ से ख़त्म करने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा हूँ। जिसको हमेशा ग़लत समझा गया और सिर्फ़ अभिधा में पढ़ा गया, वह यह छोटी इच्छा पाले है कि तुम इन कविताओं का कुछ कर सकोगे। सबसे दूर चले जाने की इच्छा का दूसरा सिरा यह भी है कि कई कवियों की देह से उतर गुजर चुका हूँ और अब उनका ख़ून-पसीना मेरी देह पर भी लग गया है जिसका ऋण उतार पाने की यह छोटी, बहुत छोटी कोशिश है।

आपका
कवि

अंचित

सोनागाछी में योगमाया
शक्ति चट्टोपाध्याय, मलय रॉय चौधुरी और एलन गिंज़्बर्ग को याद करते हुए

वह अपनी साड़ी की लंबी लाल पाढ़ पर रोज़ थोड़ा लहू पोंछती थी,
उसके गीले बाल रोज़ अलग चेहरे पखारते थे और उसके पलंग पर नक़्क़ाशियाँ बनी थीं
और उनमें कहीं-कहीं मोम फँसा हुआ। एक आईना था जिसमें पलंग दिखता था—एकटक सब।
और सब इतना घिसा-पिटा कि किसी छोटी कहानी में से निकलकर
अपने समय का ख़राब अनुवाद बनता हुआ।

मैं जान गया इतने दिन में उसकी पीठ के सब तिल
उसकी जाँघों पर सिगरेट के जले सब निशान
मैंने बार-बार बुहारा उसकी देह को, खोजता हुआ उसकी
गंध जाने कितने देश भटका, कितने दरवाज़े खोले
उसका एक दरवाज़ा खोजते हुए अपनी आत्मा के अंदर…

वह बार-बार मुझसे पूछती, तुम सोनागाछी में क्या कर रहे हो
तुम्हारे बाल घुँघराले हैं सागर में उठने वाली घिरनियों की तरह,
तुम रोज़ मुझसे प्रेम करते हो, तुम रोज़ मुझे छूते हो कई-कई बार
तुम चीख़ते हुए जो ढह जाते हो मेरे भीतर, मेरे लिए तो नहीं—
तुम किससे करते हो प्रेम जब मेरे साथ सोते हो?

छाया की तरह है प्रेम, किसी दूसरे की देह से अपनी कामना।
जो अमूर्त होना चाहिए उसका एक अभिधात्मक पराभव।

काली आँखों वाली प्रेमिका की याद में
रैम्बो के लिए

जब कई बार वह मेरे साथ सो चुकी, इतनी बार कि उसकी जाँघें मेरी जाँघों के क़दम पहचानने लगीं, इतनी बार कि उसके पेट का निचला हिस्सा लाल हो जाता तो वह मेरी छाती पर घूँसे बरसाती, इतनी बार कि मेरे चुंबन फिसलना बंद कर चुके उसके होंठों से उसकी गर्दन तक, मैंने समंदर के किनारे, उस छोटे गाँव की बाहरी दीवार के नीचे अपना हृदय दिखाया था उसको एक दिन, दिखाए थे वे सभी अंत:वस्त्र जो मुझे प्रेयसियाँ देती रहीं, उसी तरह जैसे मैं उन्हें अपना शरीर देता रहा था।

अभिसार के सबसे क्रूरतम क्षणों में भी मैं जानता था, मैं उससे कुछ भी माँग सकता हूँ; वह जानती थी, वह कुछ भी माँग सकती है—हम एक दूसरे को वह सब दे सकते थे जो हमारे बस में था भी नहीं—ऐसा क्या माँगता मैं, जो मैं सिर्फ़ उससे चाह सकता—ऐसा क्या माँगती वह मुझसे, वहाँ रेत पर अर्धनग्न, काले बादलों से भरे आसमान के नीचे, समंदर के शोर में, पत्थरों की ओट लगाए—जहाँ छिल रहा था हमारा बदन—हमें और क्या चाहिए था।

प्रेम उगता है वहाँ जहाँ कमर समाप्त होती है—कोमलता का पैरहन सबसे दीर्घ वहीं—आत्मा की चरम साधना का अंतिम भोग—मेरा चेहरा डूब जाता था, उसके केशों में—हमने घास पर प्रेम किया, हमने समंदर में प्रेम किया, एक छोटे धूसरित कमरे में हम बेधते रहे एक दूसरे को वैसे, जैसे अनंत सागर में कोई तूफ़ान पानी मथता है।

उसके गाढ़े नारंगी रूखे कुछ केश मैंने रख लिए, क्षुधावश—उस गाँव के जितने स्वप्न आते, उन सभी के लिए—नवयौवना उतनी फिर उसको कभी नहीं होना था—उतना क्रूर अधीर प्रेमी फिर कभी मुझे।

जितनी बार वह चीख़ती थी—मैं थम जाता था।

अवैध संबंध
राजकमल चौधरी की याद में

मैं अक्सर सोचता हूँ आम के बाग़ों के बारे में
और उन पेड़ों के बीच एक तस्वीर

सिगरेट का धुआँ मेरी शर्मिंदगी,
मेरा दुःख, मेरी नाकामी सब छुपा लेता है।

मैं ईश्वर होता तो मैंने सृष्टि को क़ायदों से मुक्त कर दिया होता है
मैं मनुष्य होता तो मैंने प्रेम कर लिया होता।

पर आदमी की खाल में फिर रहा, मैं भूख हूँ,
निर्मित होता जितना, उस निर्माण से अपनी ही हत्या करता हुआ।

पास आते-आते सब बिंब थक जाते हैं
एक सीमा-रेखा है, जिसके एक ओर मेरे लिए विष रखा हुआ है,
दूसरी ओर अबाध अमृत, रोज़ अभिनय से जिसकी इच्छा ढाँप देता हूँ।

शरद का प्रणयी,
शुष्कता के कपड़े पहने
भटक रहा है।
भटक रहा है।

पुरानी प्रेयसियों के नाम
पाब्लो नेरूदा की याद में

बिचरता हूँ तुम्हारी याद के कमरों से,
आती है तुम्हारी याद रह-रह अँधेरे से भरे गलियारों में—
किसी और देश में नितांत अकेला—सूँघता अकेलापन हवा में
सिहरता, रोम-रोम जलता हुआ तुम्हारी याद में—नींद भी
बिरहा की तरह बजती है बहुत दूर—सिर्फ़ प्रतिध्वनि मेरे पास।

तुम्हारी कामनाएँ अकुलाती होंगी, किसी और की बाँहों में,
टूटती होगी तुम, बिखरती होगी बन-बनकर, कोई और शिल्पकार
बार-बार अपने अँगूठों से पोंछता होगा तुम्हारी नाक के पास तुम्हारा
चेहरा, कोई नाविक डूब-डूब जाता होगा तुम्हारे भीतर—
तुम हो जाती होगी किसी और की दुनिया, किसी और का आसमान
किसी और की ज़मीन—सिर्फ़ किसी और की सब कुछ।

तब तुमको मेरी गंध याद आती होगी?
जल ढुलकता होगा कोरों से जब, धूप पड़ती होगी देह पर जब
पसीना उलझता होगा कपड़ों से जब, गति तुम्हारा आस्वादन
करती होगी जब, सन्नाटा मरता होगा बार-बार समय की
प्रतीक्षा किए बिना जब, तुम्हारे मुँह पर मेरे स्वाद की स्मृति
किसी और के चुंबनों से आती होगी?

तुम्हें अब भी मेरी कोई कविता याद है?

प्रथम-प्रणय
डी. एच. लॉरेन्स को समर्पित

तुम्हारा चेहरा भूल गया,
भूल गया तुम्हारा शीतल स्पर्श,
वह कश्ती भूल गया, जो तुम्हारे
उन्नत भूरे पहाड़ों के बीच ठहरती थी
छूते ही खाती थी हिचकोले, और
गंधा जाते थे मेरे चुंबन।

शरद की पूर्णिमा थी
साल की आख़िरी रात थी
मेरी हथेलियाँ लथपथ पसीने से
तुम्हारी आवाज़ सब आदिम ध्वनियों से लैस।

हमेशा सोचता हूँ तुम्हारे बारे में देर रात।
घास जब चुभती थी तुम्हारी कमर पर,
शाम तिकोनी टिकी होती शहर के अजनबीपन पर।

तुम्हारे होंठ पतले थे, तुम्हारे चुंबन
तुम्हारी गंध से भरे हुए,

कैसे तुमको भूल-भूल जाता हूँ दो-दो साल
और फिर कैसे याद आ जाती हो अब भी तुम
कैसे अभी भी जीभ पर खारा स्वाद आ अटकता है।

एक बूढ़ा कवि सोचता है,
जो अब पहाड़ भूल चुका है,
जो इतने दिन रेगिस्तान में रहा कि
समंदर भूल गया,

तुमने तब किया मुझसे प्रेम,
जब मेरे पास देने के लिए आधी पंक्ति भी नहीं थी।

इधर मत आना
लॉर्ड बायरन और आल्बेयर कामू को समर्पित

यह वह कविता है जो तुमको उस कवि की तरफ़ वापस ले जाएगी
जो कहीं बहुत पीछे छूट गया है और
अपनी जड़ता के पेड़ के नीचे अकेला बैठा हुआ है।

वहाँ सुंदरता नहीं है, न उसका मोह,
एक गहरी साफ़ झील और उसका प्रतिबिंब झिलमिलाता उसकी पुतलियों में,
देह के उत्सव से होने की फेरबदल।

एक कवि की अपने आपसे जुगुप्सा, से जोड़ना
ख़ुद को, अपने आपको कम करना है।

मुक्त करो ख़ुद को उन असंगतियों से
जो कविता जीवन में लेकर आती हैं।

मुखौटों से भरी दुनिया में रह कर तुमको क्या मिलेगा तुम जानती हो
घर की इच्छा और निष्ठा का दान इधर खोजना बेकार है
जैसे पतियों से कवियों को बदलने की कोशिश।

पतियों के प्रेम की चाह हो तो इधर मत आना
इधर मत आना अगर जीवित होने का दुःख तुमको नहीं सताता
तुम उस रास्ते जाओ जिधर नदी है
तुम उसकी ओर देखो जो तुम्हें,
सिर्फ़ तुम्हें देखता है।

अच्छी कविताओं में लिखे जाने की चाह हो तो पुरस्कृत कवियों के पास चली जाओ।
सुख की इच्छा हो तो व्यापारियों से प्रेम करो।

यहाँ तुमको अपमान मिलेगा प्रेम के बदले
विष के प्याले मिलेंगे और सबूतों की माँग
एक अनंत चक्र जो सिर्फ़ तुम्हारा मांस खाएगा।

जो वर्जित है वही धरा है यहाँ—मत आना,
सब भूल जाना।


अंचित (जन्म : 1990) के रचना-कर्म से ‘सदानीरा’ का सुंदर और सुदीर्घ संबंध रहा है। यों भी कह सकते हैं कि एक पत्रिका के रूप में हमने उन्हें उभरते-उलझते-सुलझते और फिर बहुत नई चमक के साथ उभरते देखा है। यह वह समय है, जब अंचित अपने सबसे बेहतरीन फ़ॉर्म में नज़र आ रहे हैं। उन्होंने गए वसंत में ‘सदानीरा’ के 28वें अंक का संपादन किया है। ‘वेस्टलैंड’ शीर्षक से प्रकाशित इस अंक में उन्होंने टी.एस. एलियट की प्रसिद्ध और दुर्निवार कविता ‘द वेस्टलैंड’ का अभूतपूर्व हिंदी अनुवाद भी मुमकिन किया है। इसके अतिरिक्त नई पीढ़ी के कवि-लेखक आमिर हमज़ा द्वारा संयोजित पुस्तक ‘क्या फ़र्ज़ है कि सबको मिले एक सा जवाब’ में उन्होंने उनके हिस्से आए एकशाब्दिक प्रश्नों के बहाने कुछ इस प्रकार का गद्य संभव किया है, जिसकी ऊँचाई ज़िंदगी की मार्मिक सचाइयों को स्पर्श करती हुई कवि-धर्म के मर्म तक जा पहुँची है। गए सप्ताह पाब्लो नेरूदा की कविताओं के उनके अनुवाद भी ‘समालोचन’ पर प्रकाशित-प्रशंसित हुए हैं। …और अब इस क्रम में ही यहाँ प्रस्तुत कविताएँ अंचित के बेहतरीन फ़ॉर्म की एक और पारी हैं। उनसे और परिचय तथा इस प्रस्तुति से पूर्व ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित उनके रचना-कर्म के लिए यहाँ देखें : अंचित

3 Comments

  1. नताशा जुलाई 5, 2023 at 10:35 पूर्वाह्न

    कितना कुछ कह रही ये कविताएँ! अंचित अपनी लिखाई से सदैव हतप्रभ करते हैं । खूब सुभाशीष !

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  2. प्रशांत विप्लवी जुलाई 6, 2023 at 3:34 पूर्वाह्न

    अंचित की ये कविताएं एक नये फ़लक पर लिखी गई कविताएं हैं। यह उसकी गंभीर पाठकीयता और अपने अगुओं के प्रति उसकी बेहद निजी दृष्टि से उपजी कविताएं हैं। पुराने दरख्तों के शाखाओं की अपनी एक अलग सघन हरियाली होती है लेकिन उसकी प्रकृति अपने पुरखों से भिन्न नहीं होती है जबकि यह उन पुराने दरख्तों के परिवेश में एक स्वतंत्र अभिव्यक्ति की हरियाली है। इन कविताओं के एवज में अंचित पाठकों से एक सुदीर्घ पाठकीयता की मांग भी करता है। अंचित और सदानीरा को शुभकामनाएं

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  3. आनंद सितम्बर 5, 2024 at 3:54 अपराह्न

    जीवन के जटिल यथार्थ और अभिव्यक्ति के लिये कविता से बेहतर औजार भला क्या हो सकता है। अभिव्यक्ति के लिये उठाया गया औजार ही रचना की शक्ति और सीमा को तय करता है।देखा जाए तो साहित्य की सभी विधाएं कविता का ही विस्तार हैं। हिन्दी में कवियों की कमी नहीं। अच्छे और सच्चे कवि फिर भी कम ही देखने में आते हैं, और अंचित उनमें से एक है |

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