कविताएँ ::
कुशाग्र अद्वैत

कुशाग्र अद्वैत

कि सारी कविताएँ

टूटती चप्पल,
खोती आवाज़,
बेसबब उदासी,
ताज़ा लगी चोट,
सीलन के लिए
ज़िम्मेदार बारिश,
चींटियों की क़तारें,
टपकती छतें
कैसे तो देखती हैं मुझे

धूप जो कि आम के लिए ज़रूरी है
मुझसे नाराज़ हो सकती है
कि सारी कविताएँ
तुम्हारे लिए लिखता हूँ

भिंडियाँ जो इधर मुलायम हैं
आलू जिन्हें समोसे के लिए
बिठाया गया है
दूध जोकि मेरी बेध्यानी से
फट चुका है

जो नए पत्ते आए हैं
वे नए फूलों से हाथ मिला
बहारों को हमारे लिए मुश्किल
बहुत मुश्किल बना सकते हैं

तीखी आँखों वाली बिल्ली—
जिस पर किसी ने कविता नहीं लिखी—
ने मुझसे बहुत आस लगा रखी है

छतरी जिसने
मुस्तक़िल साथ दिया
मेरी बेनियाज़ी से आजिज़ आ
छेद उगाने में लगी है

पुरखे कवि
अपनी अँधेरी खोह से निकल
एक ही विषय पर
अटके रह जाने के लिए
मुझे धिक्कार सकते हैं
अपने कुल से निकाल सकते हैं

आग, सिगरेट, मशालें
और तमाम चीज़ें
जो जल रही थीं
इस बुझे हुए वक़्त में

नदियाँ और झरने
जिनने प्यास बुझाई
और प्यासा रखा

कपास,
जिसने ढँकना चाहा
जब हर तरफ़ से
उधेड़ा जाता था

झींगुर,
कतराता चाँद,
बुरांश के फूल,
चीड़ के दरख़्त,
एकाकी पर्वत

क़साई की सिम्त देख
नमाज़ पढ़ते बकरे,
रिसता ख़ून

गोधूलियाँ,
आत्महत्या को उकसाती
अट्टालिकाएँ
आदि
इत्यादि
अनादि का
क्या किया जाए दोस्त
क्या किया जाए

तुम्हारे ख़याल में ख़त्म होते
सबको कैसे राज़ी रखा जाए
कि मैं इनमें से किसी को
उदास नहीं देखना चाहता
और रोज़ाना लिख सकता हूँ
तुम्हारे नाम एक कविता।

कविता-पाठ

जब कविता पढ़ना शुरू करूँ
तब न बताना पड़े
अपने गुज़रे जीवन के बारे में

कितनी ठोकरें मिलीं
कहाँ से, कैसे
निकाला गया

किसने हाथ थामा
कौन न होता
तो यहाँ न पहुँचता

उसे सुना चुकने पर
वाहवाही मिले न मिले
रूमाल क़तई न थमाई जाए

जिस रेगिस्तान से आया हूँ
उसने बाल धूसर कर दिए हों
तो और बात
मगर कुर्ता झाड़
उस बेचारी रेत की
नुमाइश न करूँ

मंच पर ही तलब मचे
तो जला लूँ बीड़ी
गंभीर दिखने के लिए
तम्बाकू के धुएँ जैसी
पवित्र चीज़ को
अश्लील न बनाऊँ

मेरे पुरखों की उपलब्धियों की
कोई गुंजाइश न हो वहाँ

क्या काम करता रहा
चोर नहीं हूँ
लंपट हूँ कि नहीं
कहाँ प्रोफ़ेसर लगा
कितनी विदेश-यात्राएँ कर चुका

वह कविता कहाँ प्रकाशित हुई
कितनी भाषाओं में हुई अनूदित
किसने उस पर क्या बोला
वग़ैरह बेमतलब के ब्यौरे दिए बग़ैर
पढ़ जाऊँ उसे
पूरा का पूरा

कि वह बिल्कुल अनाथ कविता हो
उसका कोई माई-बाप न हो
कोई आलंबन नहीं

मैं सुना रहा हूँ
महज़ इसलिए
न सुननी पड़े
उबासी लेते

कि वो कविता मुझसे बड़ी हो
अपनी रीढ़ पर खड़ी हो।

गायत्री

तुमसे कभी मिला नहीं
कभी बातचीत नहीं हुई
कहने को कह सकते हैं
तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता

ऐसा भी नहीं कि एकदम नहीं जानता
ख़बर है कि इस नगर में नई आई हो
इधर एक कामचलाऊ कमरा ढूँढ़ने में व्यस्त रही
और रोज़गार की दुश्चिंताएँ कुतरती रहीं तुमको

रात के इस पहर
तुम्हारे नाम
कविता लिखने बैठ जाऊँ
ऐसी हिमाक़त करने जितना
तो शायद नहीं जानता

मेरा एक दोस्त
तुम्हारा नाम गुनता रहता है
जैसे कोई मंत्र गुनता हो
आज हम दोनों काफ़ी देर
तुम्हारे बारे में बतियाते रहे
बेसिर-पैर के अंदाज़े लगाते रहे
मसलन इस महानगर में
परंपरा के खित्ते से बाहर
दूब बराबर जगह खोजती लड़की का
जाने किसने रखा होगा
पारंपरिक-सी शक्ल वाला यह नाम

कहाँ से
आया होगा यह नाम―
वैदिक छंद से
या उस वैदिक मंत्र से
जिसे तुतलाते हुए याद किया
और अब भी जपता हूँ कभी-कभी

क्या पता तुम्हारे पुरखों के
वेदों को छू सकने की
वंचित इच्छा से आया हो

या फिर उस रानी से
जिससे मिसेज गांधी के
अदावत के क़िस्से अख़बारों में
नमक-मिर्च के साथ शाया होते रहे

या तुम्हारे पिता की
इस ही नामराशि की
कोई प्रेयसी रही हो
और उसकी याद में…
तुम्हें नहीं पता
चलो कोई बात नहीं

संभव है
इस नामकरण के उपक्रम में
इतने विचार न शामिल रहे हों
किसी पंडित ने ‘ग’ अक्षर सुझाया हो
फिर किसी स्वजन की गोद में रखकर
कोई नाम देने को कहा हो
और जल्दबाज़ी में बतौर पुकारू नाम
यही रखाया हो
कहते हुए कि नाम का क्या है
नहीं जमा तो दाख़िले के बखत देखेंगे

कुछ भी रहा हो
बोलचाल से ग़ायब
‘त्र’ को बचाने के लिए
तो नहीं करेगा
कोई ऐसी क़वायद

तुम्हें चूमा

तुम्हें नियम से
ब्रह्ममुहूर्त में चूमा
फिर सोता रहा
कि अब जागकर
करता भी क्या

और गोधूलियों में
बक़ौल तुम्हारे―
दरिद्रता को न्योतते हुए

टिमटिमाती रातों में
आकाश देखते
तारे गिनते
और निपट अँधेरी रातों में
कमरे के सन्नाटों में

पूजित नदियों
और कुंडों के किनारे
मंदिरों और कलीसों में
बेअदबी के आरोपों के मध्य
अपराध की तरह

भीड़भाड़ वाली सड़कों पर,
मेलों में,
रिक्शों और ट्रामों पर
सिनेमाघरों के एकांत में
लाइब्रेरियों और संग्रहालयों में
एडवेंचर की तरह

कभी विकल्पहीनता में
कभी दूसरे सभी विकल्पों को
ख़ारिज करते या उनकी
सरासर अनदेखी करते

कभी रोकने के लिए
कभी जाने देने से पहले

मसान-बैराग छुटाने के लिए
किसी को जलाने
घाट ले जाने से पहले

बेध्यानी में
ग़ुस्से में
थकन में
रोग-शोक में
किसी झोंक में

पास रही तो
हाथ चूमे,
पाँव चूमे
तुम्हारी हरेक उँगली को
मेरे चुंबन याद हों
इतना इतना चूमा

दूर रही तो
तुम्हारी उन्हीं तस्वीरों को
इतनी इतनी बार चूमा

चिपचिपाती गर्मियों में
और आषाढ़ की
पहली फुहारों में
भीगती हुई तुमको चूमा

भूख-ओ-प्यास में
कुछ खाने के बजाय
हाड़-तोड़ मेहनत कर लौटने पर
इनाम-इकराम की तरह

वात्स्यायन ने
जो-जो बताया
वह सब करते हुए
परंपरा से जुड़ते हुए
परंपरा से लड़ते हुए

तुम्हारे ख़िलाफ़ जाते हुए
और तुम्हारी वकालत में

कभी बस चूमने के लिए
कभी आश्वस्ति के वास्ते
कभी किसी काम से
कभी बड़ी उजलत में

कभी कवि की तरह
कभी भिक्खु की तरह

अपना होना तक
जब खटकता था
उस वक़्त भी
तुम्हें चूमने की वजहें
निकल ही आती थीं।

पोस्ट-मार्टम

हममें अब प्यार-व्यार थोड़े है
शायद उसके जैसा कुछ हो भी
या याद करने को बहुत हो
जैसा होता है
लंबा समय साथ बिताने पर

जब साथ थे तब भी
साफ़ नहीं कह पाते थे
कि बहुत प्यार है
जैसे कहते हैं सभी
और वह कुछ ग़लत नहीं करते
होता होगा प्यार
और उसके होने पर यक़ीन
पूरम-पूर
तभी कह लेते हैं
हमारे साथ के लोग
आश्वस्त थे
कि इस सबकी मियाद
बहुत लंबी नहीं होनी है

फिर भी उनके लगने को धता बता
हम बहुत दिनों तक साथ रहे
और इसे कोई हमारी
उपलब्धि नहीं कहेगा
न ही कहा जाना चाहिए

कि हम प्रेम गली अति साँकरी में
दो लोगों के लिए जगह बनाने चले थे
हम धारा के विरुद्ध बहने चले थे

हम इब्तिदा में ही जान चुके थे
हमारी कोई मंज़िल नहीं है
हमने शादी-ब्याह के
फ़िज़ूल सपने नहीं सजाए
कि वह हमें निहायत
उबाऊ चीज़ लगती थी

कि हम बहुत जल्दी
उकता जाते थे
और किसी दिन
एक दूसरे से ऊबकर
अलग हो जाना चाहते थे

बहुत बहुत डूबते गए
कि इससे कभी
एक विराट ऊब उपजेगी
और हम इस झमेले से
निजात पा जाएँगे

बहुत बार अलग हुए
यह सोचते कि
‘अब बस हो चुका।’

मुनादी करते हुए―
‘खेला खतम, तम्बू उठा!’

फिर-फिर पास आए
कि हम डूबते गए
पर ऊबे नहीं
उतना कभी

साथ रहे यह जानते
कि हम कहीं नहीं जा रहे
हमारा कुछ नहीं हो रहा

भले लिखता रहा
‘पाँच-पाँच बिल्लियाँ पालेंगे’
लेकिन यह मेरे अकेले का सपना रहा
और जब देखा गया
तो दावे से कहता हूँ
उसकी बहुत धुँधली तस्वीर भी
मेरे ज़ेहन के किसी कोने में
नहीं उभरी थी
नहीं बनी थी
बनी होती तो भी
कोई दो लोग मिलकर
पाँच बिल्लियाँ नहीं पालते
पालते हों भी तो
हम दोनों कभी न पालते

मेरी बहुत-सी आदतों से
उसको नफ़रत रही
जिनमें से एक यह थी
कि बातें अमूमन
लीक से भटक जाती हैं
दो लोग से शुरू होती हैं
पाँच बिल्लियों पर सरक जाती हैं
और मैं तो कहूँगा कि
बहुत जायज़ नफ़रत थी
वह जिसे प्यार का नाम देती थी
वह भी शायद नफ़रत थी

कि हमने एक दूसरे को
बहुत दुख दिया,
बहुत रुलाया,
लंबे अबोले चले
जब बहुत क़रीब होना था
तब बहुत दूर पाया

उसके क़िस्से
मुझे हँसा नहीं पाते थे
कि मुझे हँसाने ख़ातिर
चुटकुलों या बातों को
बहुत अश्लील होना पड़ता
और वह बेबात हँसती थी
जिसकी याद इतनी ताज़ा है कि
यह पंक्ति लिखते मेरे कानों में
उसकी हँसी नाच रही है

वह नाचती कितना सुंदर थी
उसको नाचते देखना एक सुख था

एक सुख था—उसके साथ होना
और वह मुझसे बेतरह थक चुकी थी
और यह थकन एकतरफ़ा बिल्कुल नहीं थी
यह थकन निर्मूल बिल्कुल नहीं थी

वह मेरी बेमज़ा
आत्महंता फ़ंतासियों से थक चुकी थी
वह ‘टेस्ट ऑफ़ चेरी’ के
बारहा ज़िक्र से पक चुकी थी

चेरी से याद आया
सब कुछ बुरा ही बुरा
उदास ही उदास रहा हो
वैसा नहीं था
वैसे दिन भी आए
जब मैंने नेरूदा की
वसंत और चेरी के दरख़्तों वाली
पंक्तियाँ चेंपीं

हम दोनों ने नहीं देखा था
कि वसंत चेरी के दरख़्तों के साथ
क्या कुछ करता है और किस तरह

हमको चेरी के दरख़्त देखने
नसीब ही कहाँ हुए थे
हम सिर्फ़ अंदाज़े लगाते थे
और मुस्कुराते थे

वैसे दिन भी आए
जब हमारे समूचे आस-पास को
हमसे जलन हुई
और उनको जलता देख
हम ख़ूब डूबे उतराए

वैसे दिन भी रहे
जब उसके लिए गुलाब ले गया
और वह कुछ नहीं ला पाई
कि हमारे शहर में उन दिनों
सूरजमुखी कोई नहीं रखता था

गुलाब से मेरा कोई
दुराव नहीं था
अच्छी बनती थी
जब भी उसके लिए लेने जाता
वे ललाए मिलते

बस सूरजमुखी हैं
बहुत अज़ीज़
वह यह जानती थी
और जब बात देने की आती
तब बीच का रास्ता लेने की क़ायल
वह कभी नहीं रही

हमारे ज़ेहन देखी हुई फ़िल्मों और
पढ़ी हुई किताबों के
संदर्भों से भरे हुए थे

बहुत मौलिक होने
या दिखने के चक्कर में
हमसे नहीं पड़ा गया

कि चंदेक सीन
बहुत सुंदर बन पड़े थे
और उसमें चार चाँद
हमारी कल्पनाओं ने लगा दिया था

हम उन्हें एकबारगी
साथ-साथ
निभा लेना चाहते थे

उन संदर्भों को ढोते रहे
उनके निभने की राह जोहते रहे
और अगर वह प्यार था
तो हम प्यार में बिल्कुल
ख़च्चर हो चुके थे

ख़च्चर के जितने अर्थ संभव हैं
यहाँ वे तमाम अर्थ लगाए जाने चाहिए

कि हमने बेवजह
संदर्भों को ही नहीं ढोया
संदर्भों को ही नहीं खींचा
साथ होने को भी खींचते रहे
यह जानते हुए
यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है।


कुशाग्र अद्वैत की कविताओं के प्रकाशन का ‘सदानीरा’ पर यह चौथा अवसर है। उनकी कविताओं, उन पर टिप्पणी, उनके कविता-पाठ और उनसे परिचय के लिए यहाँ देखें : हम हारे हुए लोग हैंइस भाषा के घर मेंफ़ंतासी, देरी, भूलो, चुम्बन काम न आएगा, करीमा बलोच

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