कविताएँ ::
अरुण आदित्य

अरुण आदित्य

अरण्य-संहिता

यह कौशल है या दंडकारण्य
अवध है या नैमिषारण्य
क्या करोगे जानकर?

इनमें से कोई नहीं है तुम्हारा शरण्य
यहाँ से वहाँ तक अरण्य ही अरण्य
नई अरण्य-संहिता, नया विधान
असहमति के लिए यहाँ नहीं कोई स्थान

जो सहमत हैं
कहें और सुख से रहें
जो सहमत नहीं हैं
ध्यान से सुन लें
अपने लिए स्वर्ग, अपवर्ग या कुछ भी चुन लें
नहीं चुनेंगे तो लोग रूई की तरह धुनेंगे

कौशल हो या दंडकारण्य
अवध हो या नैमिषारण्य
फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कहाँ रहते हैं
फ़र्क़ इस बात से पड़ता है
कि आप क्या कहते हैं।

आत्म-संशय

सच की समाधि पर लगा है मेला
समाधि पर फूलों का अंबार
इतनी प्रशस्ति
इतनी जय-जयकार
कि सच को भी हो गया है आत्म-संशय

सच से पूछता है सच
कि सच-सच बताओ
क्या है सच—
श्रद्धा का यह विराट उत्सव
या समाधि के नीचे
सेप्टिक टैंक में पड़ा हमारा शव?

द्वेष-राग

लहलहा रही है पुष्प-वाटिका
मादक गंध से उन्मत्त हैं हवाएँ
किस प्रजाति के हैं ये पुष्प
कि इनकी महक से बहक रहा देश

बहकी हुई हवा के साथ
पहले भी बहकते थे लोग
पर बहक में प्रेम-राग गुनगुनाते थे

सुनो माली!
फूल तो ये जाने-पहचाने हैं
इनकी जड़ों में डाल दिया कौन-सा जल
कि इनकी गंध से बौराए लोग
अब प्रेम-राग नहीं
द्वेष-राग गाते हैं
और गर्व से उसे देश-राग बताते हैं।

अदृष्टि-आनंद

कोहरा घना है
इतना घना
कि दृष्टि से सृष्टि तक सब ओझल

निस्सीम धुंध में विभ्रम इतना विकट
कि अपनी ही अंतरात्मा को दुश्मन समझ
अंधाधुंध गोली दाग़ रहा है मनुष्य

अंतरात्मा के शव पर
पैर रखकर फ़ोटो खिंचवाता मनुष्य
कितना प्रसन्न है
डूबा हुआ रिपु-दमन के उन्माद में

महाधुंध में डूबी हैं दसों दिशाएँ
दक्षिण, पूर्व, पश्चिम को नहीं सूझता उत्तर
अध को नहीं दिख रहा ऊर्ध्व
आग्नेय और वायव्य व्याकुल-प्रश्नाकुल
ईशान के कान में फुसफुसाता है नैऋत्य—
कब छँटेगा यह कोहरा?

कब छँटेगा यह कोहरा
और जब छँटेगा
तो क्या अपने किए पर पश्चाताप करेगा मनुष्य
या कोहरे को देगा धन्यवाद
कि कितना अद्भुत है
दृष्टिहीनता का यह उपहार

आँखों पर पर्दा हो तो
कितना सुखमय है संसार।

प्रेम न प्रश्न

यह पवित्र भूमि है
यहाँ नहीं कर सकते प्रेम

नफ़रत तो कर सकता हूँ?

प्रश्न कर सकते हो
यह तुमने सोच भी लिया कैसे
तुम्हारा नाम क्या है वैसे?


अरुण आदित्य की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : अवध में अ

1 Comments

  1. जावेद आलम ख़ान सितम्बर 10, 2025 at 2:47 पूर्वाह्न

    कविता में लगभग गुम हो चुकी गेयता और तुकांत शब्दावली इन कविताओं की खूबसूरती है।व्यंजना की धार इन्हें अलग पहचान देती है।बेहतरीन कविताएं।

    Reply

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