कविताएँ ::
राकेश कुमार मिश्र

राकेश कुमार मिश्र

अलविदा कहने की कोशिश में

धुंध के कारण रोशनी कल्पना के बाहर थी
घर छोड़ने से ठीक पहले कुछ कोनों से बुज़ुर्गों के रोने की आवाज़ें आईं
रास्ते में बच्चों की टूटी हुई चप्पलें मिलीं
दो छोटे-छोटे बच्चे चल रहे थे डरे क़दमों से
दुनिया के सबसे हताश आदमी के पीछे-पीछे
एक औरत जिसे आता था सिर्फ अपना नाम लिखना
वह अपने बच्चों को हवा में प्रार्थना लिखना सिखा रही थी

हमारे हाथों और जेबों में कुछ नहीं था
खाने के लिए थी कुछ पुरानी यादें
पहनने के लिए थी उदासी
और ओढ़ने के लिए था उम्मीद का आसमान

अगर कोई हमसे पूछता कि कहाँ जा रहे हो
तो जवाब देते हम वहाँ जा रहे हैं जहाँ हमें रोटी मिलेगी
उस जगह का कोई नाम नहीं है

ज़िंदगी हमारे हिस्से में आई थी किसी हादसे की तरह
पर हमारी पूरी कोशिश थी
कि हमारी मौत घिनौने मज़ाक़ में न बदल जाए

हमें थकना नहीं था
हमें चलना था अपने पूर्वजों का सम्मान करते हुए
आख़री साँस तक

मरने का डर नहीं था हमें
हमारा सबसे बड़ा डर था
हमारे भीतर का अचरज कहीं ख़त्म न हो जाए

जिस रास्ते पर हम चल रहे थे उसकी ख़ूबसूरती
इसी में थी कि वह रास्ता बहुत मुश्किल था।

कुछ नई परिभाषाएँ

बच्चे बोलते हुए फूल हैं
शाम है किसी साँवली औरत की हँसी
क़लम है शब्दों को खोजने का औज़ार
बारिश है आसमान का रोना
किताब है छपा हुआ संगीत

प्रेम प्रतीक्षा है
भाषा घर है
एकांत ऑक्सीजन है
मृत्यु विदाई है
क्रांति सपना है
रात नींद का घर है
लिखना अकेलेपन को छूना है
और कविता है अधूरेपन का उत्सव।

सारंगी सुनते हुए

मुझ पर वियोग का आसमान है
एक अनाम औरत रो रही है नींद में
उसके रोने को अब मैं सुन पा रहा हूँ
मेरे शरीर में ख़ून नहीं दौड़ रहा है विरह
ट्रेन के इंतज़ार में स्टेशन पर बैठा आख़री पैसेंज़र हूँ मैं
किसी क़ब्रिस्तान में लाश के इंतज़ार में बैठा बूढ़ा चौकीदार हूँ मैं।

अनाम गर्भवती औरत के बग़ल में बैठने का अनुभव

उस औरत का शरीर बज रहा था किसी सितार की तरह
खुले आँगन में
हर मद्धम क़दम के साथ पृथ्वी पर चलते हुए
वह औरत रच रही थी
धीमेपन का सौंदर्यशास्त्र
वह सावधानी का दूसरा नाम थी

वह औरत शरीर कम थी गंध ज़्यादा
उस औरत का नाम मैंने नहीं पूछा
बस मान लिया कि सृजन है।

जब कविता का प्रवेश हो

कुछ दिनों के लिए भूखा रहें
बाहर की दुनिया से कट जाएँ
हर भौतिक स्पर्श से दूर रहें
कम खाएँ
अधिक से अधिक एकांत में रहें

मनोरंजन के नाम पर मात्र बच्चों को खेलते हुए देखें
उनके खेल में शामिल न हों
ध्यान रहे—
आपके भीतर भी एक खेल चल रहा है

पढ़ने के नाम पर सिर्फ़ भाषा के बुनियादी ढाँचे के बारे में पढ़ें और सोचें
भाषा की सजावट के बारे में न पढ़ें
ज्ञानेंद्रियों को आज्ञा दें
वे कविता के हर बढ़ते क़दम को महसूस करें
अगर पीछे लौटने का मन हो तो
याद कर सकते हैं माँ के द्वारा सिखाया गया पहला शब्द
पहला चुम्बन, प्रेम, प्रतिष्ठा…
इनकी स्मृतियाँ कविता लिखने के लिए घातक हैं

इन सभी हिदायतों के लिए माफ़ी
बस इंतज़ार करें।

देखना

देखने के क्रम में छूट रहा है बहुत कुछ
मैं कुछ नहीं कर रहा
बस देख रहा हूँ
पर अब भी नहीं सीख पाया हूँ देखना
देखते हुए अपने देखने को देखना मैं कैसे सीखूँ?

रोने की भाषा

माँ भोजपुरी में रोती है
पापा हिंदी में रोते थे
पड़ोसी राजस्थानी में
दोस्तों के पास हैं रोने के लिए
अपनी-अपनी भाषाएँ
इन सबसे घिरा हुआ मैं
हमेशा कविता में रोता हूँ।

कवि का काम

वह इच्छाओं को देखता है हवा में तैरते हुए
बच्चों के खेल से चुराता है थोड़ा-सा बचपन
साँवली औरतों की स्मृतियों से बनाता है अपने लिए एक शाम
स्मृतियों को बचाने के लिए बनाता है
भाषा के भीतर विशाल गोदाम
गुमशुदा लोगों को लिखता है ख़त
अपनी भाषा के उस्तादों की क़ब्रों पर पढ़ता है फ़ातिहा
बेचैन लोगों की रूह के लिए माँगता है दुआएँ

किसी माहिर कातिब की तरह
समय की पीठ पर लिखता है कुछ इबारतें
जिसे लोग पढ़ते हैं चमकीली आँखों से
उसके मरने के बाद।


राकेश कुमार मिश्र क़रीब दस वर्षों से रंगमंच, साहित्य और अनुवाद की दुनिया में सक्रिय हैं। उनकी रचनाएँ कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन-स्थलों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे rakeshansh90@gmail.com पर बात की जा सकती है।

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *