कविताएँ ::
सौरभ मिश्र

सौरभ मिश्र

दिखावे में

बहुत साल पहले ही
मैं जान गया था
वे दिखावे में हैं

उनका उठना-बैठना
खाना-पीना
बोलना-बात करना
यहाँ तक कि दान करना भी
दिखावे में है

उन पर बाज़ार
तानाशाही
जुमले
लोगों की कपटता हावी है

मैं क्या कह सकता था
जितना कह सकता था
कहता गया
और अलग होता गया

मैं फिर भी नहीं रुक पाया
ज़मीर की सुनता रहा
कहता रहा
और अब भी कहता हूँ
एक दिन
ये सब मारे जाएँगे
दिखावे में।

आओ

अब विदा नहीं लिखूँगा
और न कहूँगा

अब लिखूँगा आओ
और बेहद क़रीब जाकर
कान में कहूँगा आना

कहने से बदलता है
दूरियों का समीकरण
चहकते हुए आता है
जीवन!

सीने में जमी
बरसों की बर्फ़
पिघलने लगती है

मृत्युशय्या से लौट आता है
प्रेमी।

अपराधी मंच से

देह के पास त्याग के लिए
कोई जगह नहीं थी
प्रेम त्याग पर ही ज़िंदा था
संभोग आवश्यकता थी
आलिंगन मोह
ज़रूरत के लिए सब थे
आलिंगन एक दिवास्वप्न
दुख मना पाना
उसमें रह पाना
ताज़ा-ताज़ा अनुभव के अनुसार
प्रिविलेज हो गया है
और उसके भी दर्शक हैं
साहित्य ने इसकी घोषणा की है
मनुष्यता छुट्टी पर है
महिलाओं का यौनशोषण
इसकी गवाही दे रहा है
अपराधी मंच से हँस रहा है।

पुरखे

लेखक होना बड़ी बात है
यह मैंने देखा
जब लेखक
लोगों को पकड़-पकड़कर
अपनी किताब पर
अपने ही हस्ताक्षर देते हुए
इतरा रहे थे

किसी कोने में
मेरे पुरखे
अपनी किस्मत को कोस रहे थे।

स्व

वह उस उँगली पर
अपनी उँगली रखता है
जिसे दबाकर
वह अपना दर्द दबाती है

वह उसके होंठ के उस हिस्से पर
अपने होंठ रखता है
जिसे दबाकर
वह अपनी चीख़ रोकती है

वह अपनी आँखों के लिए
कोई उपमा नहीं खोजती
इसलिए वह बस उसके साथ
उसके आँसुओं की खोज में निकल जाता है
जो एक पत्थर प्रेमी की राह देखते-देखते सूख गए थे

नए प्रेमी को पुराने प्रेमियों के पार जाकर
अपना प्रेम साबित ही नहीं करना पड़ता
उन्हें अपनी प्रेमिकाओं का खोया हुआ
स्व भी लौटाना होता है।


सौरभ मिश्र से परिचय के लिए यहाँ देखिए : माध्यमों से होता हुआ कारण तक पहुँचा और निराश हुआ

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