कविताएँ ::
महिमा कुशवाहा

महिमा कुशवाहा

लौटना

दुहराए जाने पर दुहराई जाएगी
कल की लालसा
जीवन को धप्प कर पकड़ लेने की चाह
दुहराई जाएगी बार-बार

जीवन से कहीं ज़्यादा
जीवन खींच लेने की चाह
खींची जाएगी देह से

बादलों से टकराती हवाएँ
लौट आएँगी पत्तियों में
खिलती कलियों से दुख फूटेगा
बचे रह जाएँगे उसके पदचिह्न

मैं वापस लौटूँगी
अपनी उदासियों में
सिसकियों में

अंतराल में जीवन लौटेगा टहनी पर
और फिर तेज़ आँधी उड़ा ले जाएगी
ज़्यादा जीवन छू लेने की चाह

आत्मदाह की इच्छा झाँकेगी कुएँ से

आँधी के बाद
बचे रह जाएँगे जीवन के चिथड़े।

हारे हुए लोग

हारे हुए लोग
बचाएँगे हारे हुए लोगों को

हताश लोग आवाज़ देंगे जीवन को
मुझे उम्मीद है

दुनिया से दुनिया बचेगी जब तक
हताश और हारे हुए लोग थामेंगे
एक दूसरे का हाथ

लगभग मरे हुए लोग जीवित होंगे

कल्पना में जीवन जीते हैं हम
यथार्थ में जीवन काटा जाता है
भीतर टटोलने पर जीवित मिलता है व्यक्ति

समय के रोग से बचे हुए लोग आवाज़ देंगे—
समय सब कुछ ठीक कर देता है

यथार्थ की हवा में साँस फूटेगी
हम अपने-अपने घरों का रास्ता टटोलेंगे
घर की बत्तियाँ जलेंगी
घर का दरवाज़ा पुकारेगा
अनंत दुहराए जाने वाले
उबाऊ और शुक्त दिनों को त्याग देंगे
घर एक अक्षुण्ण जगह होगी
जहाँ गूँजेगी दुधमुँहे बच्चों की किलकारी

आसमान रंगीन नहीं
लेकिन नीला होगा

हवा में थरथराएँगी प्रार्थनाएँ

जीवन जीने का प्रचलन होगा
मृत्यु पाने की कल्पना से दूर हो जाएँगे हम।

विरह

दिल्ली के किसी प्लेटफ़ॉर्म से
विदा की आवाज़
दूर तुम्हारे शहर तक पहुँच गई होगी
मेरे अंदर का पूरा आकाश टूट चुका है
स्मृतियों के बोझ से
मस्तिष्क स्याही भरता है
अकेले हो जाने के दुःखों में
हाथ अपनी ही उँगलियाँ थामे
पुल के उस पार ले जाते हैं मुझे

इस बार मौसम विवर्ण रहा
पलाश के गिरे हुए फूलों में कोई गंध नहीं थी
शहर की भीड़ में ख़त्म होता हुआ
मेरे अंदर का शहर
रेलवे स्टेशन की भीड़ में
तुम्हारा हाथ दूर जाता हुआ

एक चिड़िया अपने टूट गए अंडों के विरह में
बिजली के तारों पर मंद पड़ी है
गिरा हुआ फूल
अब गिरा हुआ ही रहेगा
अबकी बार नींद सिर्फ़
स्वप्न की प्रतिस्थापना होगी

अंततः किसी क्षण के रुकने पर
समय नहीं रुक जाता

गेंदे के फूल-सा गिरता हुआ
अक्टूबर का महीना
मेरे लिए प्रेम का महीना नहीं रहा।

आगमन

बहुत कम आई मृत्यु
पर आती रही
समय-बेसमय

मृत्यु आई
जीवन के साथ
लिपटी हुई थोड़ी-सी
देर रात
जब टेलीफ़ोन की आवाज़ आई
तब आई थोड़ी-सी मृत्यु

जीवन बहुत दूर रेंगता चला जाता है
जब-जब मृत्यु दस्तक देती है
हमारे कान ध्वनियों की तलाश करते हैं
आँखें आकाश के पार
दूसरा आकाश ढूँढ़ लेती हैं
हाथ दूसरे हाथ का सहारा बनते हैं

हम जीवन और मृत्यु के
इस समय-काल में जीते हैं

कई बार मरते-मरते बच जाती हैं
हमारे जीवित रहने की अपेक्षाएँ
और बहुत दूर हो जाती है
ज़िंदा रहने की ख़ुशी

शेष दिनों में मृत्यु
जीवन के रूप में आती रहती है
समय-बेसमय।

दौड़ते हुए

यह त्रासदी का समय है
आस-पास विवर्ण अंधकार है
मैंने अपने हाथों की रेखाओं से
और अपने जीवन से भागने की सोची है

दुनिया को कैसे पकड़ा जा सकता है—
भागते हुए या चलकर?

दुनिया को नहीं पकड़ा जा सकता

भाग रहे जीवन को
नींद के पार एक ठौर दिया जाएगा

हम अपने स्वप्न से पकड़ेंगे दुनिया को
नींद में पुकारेंगे उसे
जहाँ आवाज़ नहीं होगी वहाँ
सिर्फ़ आँखों का सहारा लिए
बुनेगें रंगों को

हाथ से जैसे मिटती रहती हैं रेखाएँ
वैसे ही फिसल आते हैं स्वप्न
गिर आते हैं हमारे मन के भाव
हम टूट जाते हैं

मेट्रो लाइन की लंबी क़तार में
सूटकेस उठाए
हम घर की ओर लौटेते हैं
ढो लाते हैं थकान

हमारी सुरक्षा के लिए कोई नहीं होता
हम अपने हथियार रख देते हैं
जिजीविषा की व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है
कि नींद की गोली और अवसादरोधी दवाएँ
बचा लेती हैं साँसों को

फिसलती हुई दुनिया
हस्त-रेखाओं की तरह है
ग़ायब होने पर पता नहीं लगता
कि रेखाएँ छूट चुकी हैं

पके बाल और उम्र की मार से
कोई नहीं बच सकता
हम सब किसी यात्रा में हैं
भूले-भटके याद करते रहते हैं
अपने प्रेमियों को
जिन्हें हम छोड़ आए हैं

जहाँ नम आँखें
एक क्षण के लिए
त्याग देती हैं उम्मीद
पर बचे रहते हैं रंग

आँखें दुबारा खुलती हैं
हम दुबारा दौड़ते हैं
अपनी जिजीविषाओं को
अपने हाथों की रेखाओं को ढूँढ़ते
और दुबारा खो बैठते हैं रेखाएँ
फिसल जाती है दुनिया

अव्यक्त

मेरे दुःख में विभाजन नहीं है
बस अपार अपंगता और दोष है
मैं अतिशय भयभीत हूँ

हमारे अपने-अपने डर हैं
असल में हम अपनी-अपनी
आशंकाओं से गर्भस्थ होते हैं
हमारे डर हमारे अंदर पलते हैं
जैसे पलता है शिशु

हमें सबसे अधिक प्रेम
अपने डर से होता है

हम डर को
जितना छिपाने की
कोशिश करते हैं
डर उतना ही बड़ा
और विशाल हो जाता है
और फिर फूटकर बाहर आ जाता है

अंत में हम ढो लेते हैं दोष
और जीवन भर मरते हैं
बहुत कम जीते हैं।

ओत-प्रोत

आने वाले समय में
होने वाले हादसे हो चुके हैं
एक अंतराल
और यथार्थ में जीवन जीने के बोझ के साथ
आने वाला समय आ चुका है।

टिमटिमाते फूलों
और तितलियों का रंग विलक्षण है
बचपन नहीं लौटेगा
या लौट सकता है
हमारी स्मृतियों में

लौट चुके लोग
कभी वापस नहीं आते
हाथ में कभी कोई हाथ था
वह हाथ रेंगता चला गया
अपने पॉलिश जूतों
और रास्तों के साथ
वापस अपने रास्तों में
हाथ चले गए

यथार्थ में प्रार्थना बची है
दिन के किसी शून्य में
हमारी आँखों की पुतलियाँ तलाशती हैं
अज्ञात होते तारों को
ईश्वर एक अनंत विश्वास है
आख़िरी विश्वास तक सीमित

कुछ बन जाने की परंपरा
वापस लौटने या चले जाने का खेल
इन सबसे दूर
एक और शून्य में

मैंने बार-बार आवाज़ दी
अपनी हर आत्महत्या में जीवन को

अपने हर विलाप में मैंने कहा—प्यार
अपनी हर प्रार्थना में मैंने माँगी—आज़ादी
और हर दुहराए जाने वाले आलाप में
मैंने माँगी जीवन से अपनी याचिका
अपने जिए हुए पर
ध्वनि की आहुति
जीवन और आकाश और दूर हवा की गंध
लौट आओ…
मेरे होने पर
मेरे चेहरे के ढाँचे में।

माँ से सवाल

माँ नदी के पास इतने रास्ते क्यों हैं?
माँ समुद्र इतना बड़ा क्यों है?
माँ जब पृथ्वी गोल घूमती है
तो मैं गोल क्यों नहीं घूमती?
माँ तू मुझे देखती है तो क्या सोचती है?
जब पापा को देखती है तो क्या सोचती है?
माँ तू जब मेरी उम्र की थी तो
तेरे बाल कितने बड़े थे?
तू स्वप्न देखती थी
या स्वप्न आते थे?
मैंने तुझे कभी स्वप्न देखते हुए नहीं देखा
तुझे जब स्वप्न आते हैं
तो कैसे आते है
तू कभी डॉक्टर बनना नहीं चाही?
तू नहीं चाही कि तू स्कूल की टीचर बने?
माँ मैं तुझसे कितने सवाल करती हूँ
और तू सिर्फ़
खाना बनाकर सो जाती है
भला सो जाना
या आँखें मूँद लेना जवाब है?


महिमा कुशवाहा (जन्म : 2003) की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। इस समयावधि में उनकी कविताएँ कहना न होगा और सशक्त हुई हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : धीरे-धीरे क़ैद हो जाएगा पूरा संसार एक चुप्पी में

1 Comment

  1. सत्यव्रत रजक मई 14, 2024 at 8:04 पूर्वाह्न

    कविताएँ, मानवीय निजी आग्रहों की स्फुरित मन से दरख़्वास्त देती हैं।

    Reply

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