कविताएँ ::
राजेश कमल

राजेश कमल

काउंट मी आउट1केंड्रिक लैमर का एक मशहूर रैप/हिप-हॉप गीत।

मैं थका हुआ आदमी हूँ
अनगिनत पराजयों के मलबे पर विराजमान
असफलताओं के पदकों को
सीने पर सजाए हुए
अब मैं इतनी दूर आ गया हूँ
कि लौटने की कोई सड़क बची नहीं
यहाँ सपनों के सूखे पत्ते उड़ रहे हैं

मैं वही हूँ
जो उम्मीदों की ऊँची मीनारें बनाता था

अब आईने में जो दिखता है
वह डराता है

यहाँ सारे पासे मैंने ही फेंके
सभी जादू मैंने ही दिखाए
सभी अफ़सोस मेरी ही कमाई हैं

यहाँ सिद्ध और प्रसिद्ध
और अमूर्त प्रदेश के लोगों के लिए
लगी है आसनी

तुम मुझे गिनती से बाहर रखो
किसी गिनती से
किसी भी गिनती से

मुझे अच्छा लगता है
जब लोग मुझे नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

तरकीब

माँ बिछावन पर थी नीम-बेहोश
पिता आराम फ़रमा थे आरामकुर्सी पर
भाई चहलक़दमी कर रहा था
बच्चे ख़ामोश थे बड़ों की तरह
घर की अन्य स्त्रियाँ अग्रसर थीं
मूल की तरफ़
और मैं—किंकर्त्तव्यविमूढ़!

अच्छे को कुछ अच्छा
बुरे को थोड़ा कम बुरा करने की
तरकीब नहीं थी मेरे पास।

माँ और उम्मीद

हर दिन तुम्हारी आँखों में
एक लौ-सी जलती हुई
नज़र आती है
न जाने कब से
पर लगातार

कभी लगता है आज उठोगी
और आँगन में रखी
किसी पुरानी कुर्सी पर
बैठ जाओगी
और हम बिना कुछ कहे
तुम्हारे पीछे-पीछे
अपनी भी कुर्सी ले आएँगे

फिर बतियाएँगे
अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्ते- नाते, बाल-बच्चे,
दुनिया-जहान, राजनीति-खेल, सिनेमा-संगीत, अनाप-शनाप

भूल जाएँगे हम
कि तीन बरस हो गए
तुम बिछौने पर पड़ी हो बेसुध

तुम्हारी आँखें
हमारे दिल को बाँधकर रखती हैं
टूटने नहीं देतीं।

माँ की चप्पल

एक ज़माना था
जब हर मौसम में बदलती थीं
उसकी चप्पलें

अलमारी में रंग-बिरंगी
सपनों की तरह होती थीं
चप्पल-जोड़ियाँ

अब ख़त्म हो चुकी हैं रंगीनियाँ
दरवाज़े पर पड़ी पुरानी चप्पलें
धूप-छाँव खाते-खाते
नाम भर रह गई हैं

अब बिस्तर ही उसका आँगन है
बिस्तर ही भनसा
बिस्तर ही भगवती
बिस्तर ही दूरी

उसके पाँव भूल गए हैं चलना
जीवन ने उसके सारे रास्ते समेट लिए हैं
रजाई के नीचे सिकुड़े हुए हैं पैर
खिड़की से आती धूप ही है सफ़र उसका

सब कुछ है
फिर भी नहीं है
कुछ ऐसे बेजान पड़ी है
जैसे कोई साँस ले रहा हो
आधे मन से

तीन बरस हो गए
चप्पलों की कोई नई जोड़ी नहीं आई
न उसका ख़याल ही।

अस्पताल में मुलाक़ात

हर मुलाक़ात
आख़िरी मुलाक़ात की तरह
हर विदा
अलविदा की तरह

चेहरे पर जो हँसी है—झूठ है
आँखों में जो बातें अनकही हैं
अनकही नहीं हैं

बातें जो दे सकती हैं दिलासा
ख़ुद माँगती है हौसला

स्पर्श जो दे सकते हैं ऊष्मा
काँपते हैं छुअन से

दरवाज़े के पार
अपनी गति में है जीवन

सूरज उगा है
परिंदे उड़ रहे हैं
हवा बह रही है
सिनेमा-हॉल खुला है
कॉफ़ी हाउस, शराबघर, स्कूल, दफ़्तर,
नफ़रत की राजनीति, धर्म का बाज़ार…
सब कुछ वैसा ही है
जैसा कल था

बदलेगा इधर भी कुछ नहीं
घड़ी की टिक-टिक का शोर होगा
और सन्नाटा चारों तरफ़
कुछ शब्द रह जाएँगे कहे बिना
कुछ आँसू रह जाएँगे बहे बिना।

मैं नहीं रहा…

शरीर और आत्मा पर उसके
अनंत निशानों को लेकर घर से निकला
लौटा तो धुल चुके थे सारे
मानो सागर किनारे की रेत था
लहरों ने धो दिया सब

मैंने सीख ली चालाकियाँ
सीख लिया झूठ
आ गए सब तीन-पाँच

अब मुस्कुराता हूँ
कामयाबों की तरह
चेहरे पर टाँक ली है मैंने
स्वविश्वासाभिनय की परतें

माँ,
तुम ढूँढ़ना मुझमें वे पुराने निशान
वे अधखुले होंठ
वे निष्पाप आँखें
सब मिलेंगे
अक्षुण्ण मिलेंगे
वहीं के वहीं
वैसे के वैसे
जबकि मैं नहीं रहा…
वह!

माँ की पुरानी तस्वीर

माँ के कमरे की दीवार पर
एक तस्वीर टँगी है
रूपकला स्टूडियो की
वो जो पिता को दिखाई गई थी
ब्याह से पहले

उस तस्वीर में वह अब भी वही है
हँसी ऐसी कि क्या ही कहें
नहीं है कोई थकान
कोई चिंता
सपनों का पूरा आकाश खुला है
और पिता की दुल्हन बनने की
आहट साफ़ दिख रही है

कभी-कभी देर तक
देखता रहता हूँ तस्वीर
और सोचता रहता हूँ
कि यह वही माँ है
जिसके पैरों ने घर-आँगन के
हज़ारों चक्कर लगाए
जो हमारे सब कुछ में
सब जगह मौजूद थी

अब वह बारह-दस के कमरे में पड़ी
टुकुर-टुकुर देखती असहाय… बस!

हम बड़े हो गए माँ

हम बड़े हो गए माँ
बहुत बड़े
इतने कि हमारे अपने बच्चे
हमारी झुर्रियाँ गिनने लगे हैं

जिस स्त्री की बाँहों में
मैंने पहली बार दुनिया देखी थी
वह स्त्री
आज मेरे सफ़ेद होते बालों के बीच
फेरती है उँगलियाँ
न जाने क्या सोचती है
और बुदबुदाती है

तुम्हारी बुझ रही
आँखों की रोशनी में
हम आज भी ठीक वहीं खड़े हैं
वही चार नन्हे चेहरे
जिन्हें तुमने
संघर्ष की अनंत कथाओं से गुज़रते
अपने आँचल की ऊष्मा में
गढ़ा था माँ!

माँ की पढ़त

उसे पढ़ने की बीमारी थी
उसके शहर के पुस्तकालय में
शायद ही कोई किताब बची हो
जिससे उसकी आँखें न गुज़री हों

जब कुछ और न मिलता
तो प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें भी
उठा लेती वह—
घोर अरुचिकर विषयों को भी
अद्भुत चाव से पढ़ती

हाँ कविताओं से परहेज़ था उसे
कविता उतनी ही पढ़ी
जितनी सिलेबस में मिली

वह कभी-कभी हँसकर कहती कि
आज के कई गद्यकार
हमारे ज़माने के
पल्प से भी गए-गुज़रे हैं

अब वह अख़बार नहीं पढ़ती
न ही कोई किताब रहती है
उसके बिछौने पर
वहाँ अब बस
कुछ दवाइयों की डिब्बियाँ हैं
एक मोबाइल फ़ोन है
और टीवी का रिमोट है

हाँ—
घर का रिमोट भी
अब तक उसी के पास है।

अंत

अंतहीन कष्ट का
अंत आ गया शायद
माँ कह रही है,
उद्धार करो ठाकुर…

वह चली ही जाएगी अब
चले ही जाते हैं सब
मुझे मालूम है—
ये चित्र स्थायी रंगों से नहीं बने
लेकिन इस बात की क्षणिक कल्पना भी
रूह कँपा देती है
एक दिन सब आकृतियाँ धुंध में घुल जाएगी
एक दरार समय के काँच में उभर आएगी
और वही चित्र स्थायी रह जाएगा।

वे सुनने की संस्कृति से निर्वासित हैं

वे आत्मश्रवण में लीन लोग हैं
वे अपने शब्दों की गूँज में इतने मगन हैं
कि दुनिया की कोई भी आवाज़
उन्हें कोफ़्त से भर देती है

वे बोलते हैं
फिर बोलते हैं
फिर-फिर बोलते हैं
वे सुनने की संस्कृति से निर्वासित हैं

उन्हें सब मालूम होता है
उन्हें सब—सबसे ज़्यादा मालूम होता है

इतिहास-विज्ञान-भूगोल-साहित्य-धर्मशास्त्र-अर्थशास्त्र-कोकशास्त्र…
सब—वे सबसे ज़्यादा जानते हैं

वे दे सकते हैं
डॉक्टरों को डॉक्टरी सलाह
वकीलों को क़ानून समझा सकते हैं
इतिहासकारों की
तिथियाँ दुरुस्त कर सकते हैं
बीथोवेन की धुनों की
कमियाँ बता सकते हैं

वे अगर मिज़ाज में हों तो
मिर्ज़ा ग़ालिब का भी
तलफ़्फ़ुज़ ठीक कर दें

उनका होना बहुत जरूरी है दोस्त
वे न हों तो
इंद्रधनुष का एक रंग कम पड़ जाए।

स्केल से बना चाँद

चालाकी एक सीधी रेखा है
और कविता एक टूटा हुआ वृत्त

कवि चालाक नहीं होता
यूँ कहें कि हो नहीं सकता

अगर हुआ तो कवि नहीं
नहीं हुआ तो संभावना है

स्केल के सहारे
चाँद की तस्वीर
जो लोग बना रहे हैं
कोई समझा दे उन्हें।

कुछ

कुछ पक्ष में
कुछ प्रतिपक्ष में
कुछ दोनों नावों के सहचर
कुछ तमाशाई
कुछ परिधि के चक्करदार
कुछ धुरी के अलम-बरदार
कुछ आग लिए भीतर चलते
कुछ राख हुए चुपचाप
कुछ लिखते इतिहास लहू से
कुछ बन जाते शाप।

दिल्ली में एक ऑटो-चालक से बातचीत

उसने कहा कि हमने जिन्हें चुना
उन्होंने हमें नहीं चुना
हम चुनाव की स्याही में डूबी उँगलियाँ लेकर
उनके दरवाज़ों तक गए
पर वे नहीं खुले

उसने रामलीला मैदान की तरफ़ इशारा किया
और बड़बड़ाया,
इंसान अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता है
पर पासा किसी और के पास होता है

वह दूर संसद के नए और भव्य भवन को
देख रहा था और हँस रहा था
राजधानी में राजा बदलते हैं
महल बदलता है
दफ़्तर बदलते हैं
पर नहीं बदलता है तो हमारा समय

हम उम्मीदों की पालकी पर बैठे रहते हैं
साल-दर-साल-दर-साल
जबकि लोकतंत्र अब छुट्टे सिक्कों-सा है
जो कभी पूरा नहीं पड़ता
और इन्हीं सिक्कों से हमें
चुकाना होता है अपने सपनों का किराया।

ज़ुबैर सैफ़ी को सुनते हुए

पढ़ो
फिर पढ़ो
फिर-फिर पढ़ो

हर बार जब पढ़ो
अपनी नब्ज़ पर उँगली रखो
फिर धड़कनें पढ़ो

सोचो
कितना ख़ून जला होगा
कितनी निद्राहीन रातें होंगी
कितनी आँखों का ख़ौफ़ होगा
कितनी अबोली कहानियाँ होंगी
कितनी सुनी को अनसुनी किया होगा
कितने सीसे कानों में घोले गए होंगे
कितनी चीख़ें हलक़ में अटक गई होंगी

ये शब्द कागज़ पर नहीं उतरे हैं
मुल्क के चेहरे पर ख़ून से उकेरे गए हैं

उसकी बात
जैसे माँ के पेट से
अभी-अभी आया बच्चा—
लहूलुहान… काँपता हुआ

इन्हें थपकी नहीं मिली
इन्हें दुलार नहीं मिला
ये रो पड़े हैं
इसे शोर मत कहना
इन शब्दों ने
चलना सीखने से पहले
घाव सहना सीखा

बर-ख़ुर्दार,
तुम्हारी नज़र-ए-इनायत
अभी नहीं हुई है इधर
इसलिए पढ़ो
और जब लगे कि समझ गया
तो एक बार फिर पढ़ो

पढ़ो
फिर पढ़ो
फिर-फिर पढ़ो…


राजेश कमल [जन्म : 1975] की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह सातवाँ अवसर है। इस बीच उनकी कविताओं की एक किताब अस्वीकार से बनी काया [अंतिका प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2022] प्रकाशित हुई है। राजेश उन कवियों में से हैं जो प्रदर्शन के इस युग में प्रदर्शन से भरसक-भरपूर बचते हैं। वह अपनी कविता के साथ-साथ इस पर भी ध्यान देते हैं कि उनके आस-पास एक काव्य-परिवेश निर्मित हो सके। ‘कवियों के कवि’ की तर्ज़ पर अगर उन्हें कुछ कहना हो ‘साथियों के साथी कवि’ कह सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे नए कवियों की कविताएँ समय-समय पर सामने लाने में मदद की है। वह एक लंबे वक़्त से पटना में नए रचनाकारों के पथ-प्रदर्शक हैं, लेकिन उन्होंने कभी इसका शोर नहीं किया है। उनका संगठन तक इस बात को न जानने का वैसे ही ढोंग करता है, जैसे उनके कवि को लगभग न जानने का। यह युग लेखक-संगठनों द्वारा खड़े किए गए कवियों-लेखकों का नहीं है, लेकिन अफ़सोस फिर भी गए कुछ वर्षों में इन लेखक-संगठनों द्वारा कुछ निहायत ही फ़ालतू क़िस्म के कवि खड़े किए गए हैं—स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर। इस स्तर पर अगर राजेश कमल सरीखे कवि खरे नहीं उतरते हैं, तब दोष उनका ही है! इस स्थिति में हमारे इस आग्रह से भी क्या ही होना है कि कविता पढ़ी जाए! राजेश कमल से rajeshkamal09@gmail.com पर संवाद संभव है। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : बेहतर है कि डर को रोमांच पढ़ा जाए | मोह कमज़ोरों की भावना थी | आपदाग्रस्त | ईश्वर तुमपे भारी है हत्यारा | पसलियाँ चाक़ू से ऐसे सहमत हो सकती हैं | हम बारामासा प्रेमियों के लिए फ़रवरी प्रेम का बारहवाँ हिस्सा है

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