कविता ::
देवी प्रसाद मिश्र

देवी प्रसाद मिश्र | तस्वीर सौजन्य : रेख़्ता/हिन्दवी

फ़रवरी

युवा होने के ख़तरों से मैं दूर आ गया हूँ
नसों में लेकिन कितनी ही फ़रवरियों का ख़ून बह रहा है

फ़रवरी से बेहतर महीना ढूँढ़ने का
यह वक़्त नहीं है

मनुष्यों से अधिक पेड़
एक नई दुनिया बनाने के संकल्प से भरे हैं
लेकिन नए पत्ते नए अर्थ का प्रतीक बनने से गुरेज़ कर रहे हैं

मैंने परदे बदल दिए हैं कि तुम आओगी
नई माचिस ले आया हूँ कि रगड़ते ही जल उठें तीलियाँ

मैं चाय बनाता रहूँ और
तुम मुझे देखती रहो
एक मनमाने स्वतंत्रचेता पशु की लाल आँखों से

मैंने चादर बदल दी है
अधिक फूलों वाली चादर की जगह
ज़मीन के रंग वाली चादर बिछा दी है

कमरों को साफ़ करने में इतनी धूल उड़ी कि एक पड़ोसी गोली मारने आ गया जिससे मैंने कहा कि प्रेम करने के बाद मैं मरने के लिए उसके घर आ जाऊँगा ज़्यादा नाराज़ होकर वह लौट गया यह कहते हुए कि उसकी हिंदू चाय को लेकर मेरी अन्यमनस्कता मुझे महँगी पड़ेगी

मुझसे बेहतर कवि होने के लिए
मुझसे अधिक दुख उठाने होंगे
और मुझसे ख़राब कविता लिखने के लिए
करने होंगे वैचारिक अपराध

भागती रेलगाड़ी की खिड़की के पास बैठा अच्छी कविता लिखने का फ़ॉर्मूला बाहर फेंकता ब्लू-ब्लैक स्याही की दवात-सा मैं प्रगाढ़तर होता उजास हूँ अगर हवास हूँ

मेरे गाँव का नाम हरखपुर है—यहाँ के नारीवाद पर मैं किताब ढूँढ रहा हूँ कवितावली वाली अवधी में राउटलेज और सेज की किताबें मध्यवर्गीय धर्मग्रंथ हैं

नहाने की जगह मैंने रगड़कर साफ़ की
तेज़ाब से मेरी जल गईं उँगलियाँ
दुनिया के दाग़दार फ़र्श को
इतनी ही शिद्दत से साफ़ करूँगा यह तय किया है

बाथरूम के शीशे में मेरा चेहरा उस आदमी के चेहरे-सा था जिसके राज्यसत्ता के साथ बहुत बुरे संबंध रहे—वह स्याह पूरे घर में फैल गया है

भारतीय वसंत और पतझड़ के बीच फैले इस अपारदर्शी में
अब और भी ज़रूरत है मुझे तुम्हारी
प्यार और अपरायजिंग में होती पराजयों ने
मुझे रोते हुए हँसने का नमूना बना रखा है

मेरे पास आना
एक ज़ख्मी आदमी की कराह सुनने के
धीरज के साथ आना है

मेरे और निराला के तख़्त के बीच बमुश्किल तीन मील का फ़ासला होगा—
मैं इलाहाबाद की आँख और घाव से टपका ख़ून का आख़िरी कतरा तो नहीं ही हूँ

मैंने घर को तुम्हारे आने के लिए तैयार कर रखा है
जबकि तुमने कह दिया है कि तुम नहीं आओगी फ़रवरी में—
कारण न मैं जानता हूँ न तुम

प्रेम एक टेढ़ी नदी है जो पहाड़ों की घाटियों से शिखरों की तरफ बहती है उल्टी

उल्टियाँ करने का मेरा मन होता रहा है
सिर कितना घूमताssरहा है गेंदबाज़ चंद्रशेखर की ऑफ़ स्पिन-सा
तुम्हें याद करना एक बोझ उठाना है
और न याद करना निरुद्देश्य पर्वतारोही हो जाना है

शोकसभा के बाद बिछी रह गई दरी-सी है

फ़रवरी

अट्ठाइस दिनों की फ़रवरी में अगर तुम नहीं आ रही हो
तो इसे मैं तीस और इकतीस दिनों का कर दूँगा

इससे ज़्यादा क्या चाहती हो क्या कर दूँ
पूरा कैलेंडर बदल दूँ?


देवी प्रसाद मिश्र समादृत कवि-लेखक-कलाकार हैं। उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं—’प्रार्थना के शिल्प में नहीं’ (1989), ‘जिधर कुछ नहीं’ (2022), ‘मनुष्य होने के संस्मरण’ (2023)। उनसे और परिचय तथा ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित उनकी रचनाओं के लिए यहाँ देखिए : लॉकडाउन सभ्यता की साँस का │  बहुत धुएँ में │ अगर हमने तय किया होता कि हम नहीं जाएँगे  

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