लंबी कविता ::
तल्हा ख़ान

कविता पढ़ते हुए जब ज़बान अपने हिसार में क़ैद करने लगे तो कभी-कभी वो मौज़ू से आगे निकल जाती है, वह आप पर ताज़याने-सी बरसती है। ज़बान का खेल चाहे जितना भी मुलम्मा-साज़ नज़र आए, आप उस पर ‘अशराफ़िया’ होने का इल्ज़ाम लगाएँ, उसे कोसें, उसके क़ानून को मानने से इनकार कर दें; तब भी बहरहाल आपको जो कुछ कहना है, उसको सुनाने के लिए ज़रूरत उसकी ही पड़ेगी। कविता में ज़बान को वे ही लोग झिड़क सकते हैं, जो अपनी एक ख़ास ज़बान तराशने में कामयाब हो गए हैं। इस हवाले से जब तल्हा ख़ान की यहाँ दी गई लंबी कविता को पढ़ा तो मुझे इस चीज़ की एक चमक-सी दिखाई दी कि वह अपनी ज़बान तराशने की कोशिश में जुटे हैं। हालाँकि इसका सुराग़ वह देर में लगा पाएँगे। शाइर को अपनी ज़बान बनाने के लिए, अपना उस्लूब तराशने के लिए इसके सिवा चारा नहीं कि अपनी ज़िंदगी को भी वह कुछ अनोखा बनाए, कुछ ममनूआ रास्तों से गुज़रे, बे-ज़रूरत बग़ावतें भी करे और ज़्यादा सहल अंदाज़ में कहूँ तो एक ‘शरीफ़’ इंसान होने से बचे। ज़रूरी नहीं कि यह अमली तौर पर हो, ग़ालिब दिमाग़ी तौर पर इतना ग़ैर-शरीफ़ आदमी था कि उसके ‘ना-करदा गुनाहों की दाद दिए बिना बात नहीं बनती’, इसी तरह अगर ऐसी अटखेलियाँ करती हुई बाग़ी और तिलिस्मी ज़बान को गाहे-गाहे पढ़ते रहना है तो हम-असरों में सपना भट्ट की मिसाल ग़लत नहीं होगी, जिनकी ज़बान ज़्यादातर उनकी ख़याली मू-शिगाफ़ियों का करिश्मा है और वह इसी बुनियाद पर जस्ता-जस्ता बड़ी शाइरी की मिसाल बनती जा रही है। तल्हा की तवील नज़्म बहुत हद तक अपने चुने हुए विषय से इंसाफ़ करती है, मगर यह इंसाफ़ इतना है कि वह जो कहना चाह रहे हैं, समझ आ जाता है, उसकी तरसील हो जाती है। लेकिन कहने की तकनीक में कोई ऐसी अनोखी बात पैदा करने से वह क़ासिर हैं, जिसकी वजह से उन्हें पलटकर पढ़ने का जी चाहे। जब तक कविता में यह बात पैदा नहीं होगी, तब तक वह बेहतर से ग़ैर-मामूली का सफ़र तय नहीं करेगी… और यह बात सिर्फ़ तल्हा ख़ान की कविता के लिए नहीं है।

तसनीफ़ हैदर

तल्हा ख़ान

सो जाओ

तुम!
हाँ तुम,
एक बच्चे की तरह
सो जाओ

वह अतीत
जिस पर
तुम यक़ीन करते हो
अतीत में था ही नहीं

तुम्हारे ख़्वाबों के लोग?
अस्ल में होते ही नहीं
और समुंदर की लहरें?
उन्हें… तुम्हारी कोई परवाह नहीं!

आसमान
तुम्हारा पसंदीदा रंग
भूल चुका है
तुम भी

घास
तुम्हारी इजाज़त के
बिना उगती है

घाव भी
तुम्हारी इजाज़त के
बिना उगते हैं

तुम फूलों को
खिलने से नहीं रोक सकते
न मुरझाने से…

हत्यारे अहिंसा नहीं मानते

बताकर नहीं गिराए जाएँगे बम
बताकर नहीं आएगी
दरवाज़े के उस पार खड़ी उदासी

आस-पास फैली
इस उदासी को छुओ
ओस को
और घास को छुओ
पेड़ को
और फूल को छुओ
किताबों की धूल को छुओ
और कुर्सी को
किवाड़ को छुओ…
पेड़ थे ये कभी
नदी में हाथ डालो
धरा के रक्त को छुओ
खेत की मिट्टी उठाओ
धरा के गर्भ को छुओ
यहीं से आए हो तुम
यहीं पर जाओगे
मौत के अतिरिक्त
क्या ही पाओगे!

तुम्हें समझ आएगा एक दिन—
जिन पर तुम भरोसा करते हो
वे तुम्हारे राज़ नहीं रखेंगे

तुम्हारा बोझ
तुम्हें ख़ुद ही ढोना है
और तुम्हें
बिल्कुल नहीं रोना है

पत्थर काँधे पर नहीं
छाती पर है

तुम कराह भी नहीं सकते
और किसी को
बता भी नहीं सकते!

वज़्न ज़्यादा है…
तुम ये सारी यादें
फेंक दो नदी में
खूँटी पर टाँग दो
घमंड और बंदूक़
अब उनकी ज़रूरत नहीं है

प्रेम से हरा सकते हो
किसी को भी
या फिर हार सकते हो
तुम मारना नहीं किसी को
जबकि मार सकते हो

तुम थके हुए हो
बहुत दूर निकल आए हो
तुम अपनी कमर
नहीं देख पाओगे
ख़ुद की खुदी
क़ब्र नहीं
देख पाओगे
तुम बहुत कुछ छोड़ आए हो
यह रास्ता आगे को जाता है,
पीछे कुछ नहीं है
कुछ नहीं के सिवा
या फिर एक गाँव
जहाँ समूची सभ्यता
लौट सकती है आराम करने

सब तुमसे पूछते हैं—
कैसे हो?
कोई जानना नहीं चाहता
जो जानता है
मानना नहीं चाहता

एक उम्र कम है
इतने ज़्यादा दुख के लिए
तो बस
एक बच्चे की तरह
सो जाओ

सोते वक़्त मर्द मत बनो
मर्द—
बोझ से भरे होते हैं
बेकार की हज़ार चीज़ें
ढोते फिरते हैं
उम्र की रपटती ढलानों पर
चढ़ते-गिरते हैं
उनके गिरने की
आवाज़ तक नहीं होती
लेकिन
पहाड़ चढ़ते खच्चरों की घंटी
टन-टन कर बजती है
जिसमें ग़ुलामी के
सातों राग हैं
हमारा नरक यहीं है
हमारे पेट में आग है!

हम सभी संभावित
हत्यारे या दुष्कर्मी हो सकते हैं!

आरोप और सच के बीच
एक महीन-सी रेखा है!

मैंने पितृसत्ता के विरोध में
बूढ़े कुपोषित कंकालों की पीठ पर
लिखा देखा है—
आम मर्द पूँजीवाद की
निष्कासित औरतें हैं!

सच अब सच नहीं
उसकी बहुत-सी परतें हैं

आप भाषा में
कितना कह सकते हो
उसकी भी शर्तें हैं

नाले से झाँकते लोग
मुझे चुप रहने का
इशारा करते हैं

तुम जीत नहीं सकते
यह जंग नहीं है

दमन तय है
चुभन तय है
हार तय है
अंधकार तय है

तुम अकेले हो
थके हुए हो
बेल्ट तुम्हें भी पड़ी है!
या यूँ कहो
शासन की छड़ी है
या कोड़ों की झड़ी है
लेकिन तुम्हारी मर्दानगी
तुम्हारी कमज़ोरी बन
सामने खड़ी है
ख़ैर किसको पड़ी है?

तुम्हारे बारे में
कोई लिखता कहाँ है?
कोई पढ़ता कहाँ है?
वो बिकता कहाँ है?
तुम बिकोगे भी तो
दिखोगे नहीं!

तुम्हारे काँपते हाथ
बहता नमक गालों पर
तुम्हारी काली आँखें
काले कुदालों पर
कोयले की खान में तुम थे
गटर की शान में तुम थे
जूते चमकाते
कबाड़ में तुम थे
कूड़े के पहाड़ में तुम थे
खिलौने-ग़ुब्बारे-कुल्फ़ी बेचते
गली के छोर पर तुम थे
पेट के लिए क्या कुछ नहीं
हर दफ़ा ‘चोर’ पर तुम थे!

फ़ीस थी बच्चों की
दवाई माँ की
बीवी की फटी साड़ी थी
तुमने फटे पेट के लिए
पहाड़ की कोख तक फाड़ी थी
तुम सशक्त मर्द थे
फिर किस ध्यान में गुम थे?
तुम्हारा वजूद
एक मज़ाक़ था
मगर सम्मान में गुम थे!

कौन यक़ीन करेगा
तुम्हारी कमज़ोरी पर?
सबसे पीड़ादायक पल में
तुम मुस्कुरा देते हो
सब ठीक हो जाएगा
बता देते हो
सब ठीक कहाँ होता है
सब ख़त्म हो जाता है
लेकिन तुम हो अभी
महसूस करो
तुम थके हुए हो
तुम बच्चे थे कभी
तुम बच्चे हो अभी
तुम थोड़े-बहुत
बचे हो अभी!

बचा रहना ज़रूरी है
विद्रोह के लिए…

मैं चाहता हूँ
कविता में बचा रहे
आम आदमी
और आम आदमी में कविता!

आदमी को बचाओ
आदमी से बड़ा नहीं
हो सकता पूँजीवाद!

इसलिए सो जाओ
एक बच्चे की तरह
और कुछ न रखना याद

वही होगी तुम्हारी
सबसे प्यारी नींद
मौत से पहले
या उसके बाद


तल्हा ख़ान की कविताओं के प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। यह सुखद है या कहें लगभग परिघटना सदृश है कि इस अवसर से पूर्व ही वह प्रशंसित, चर्चित और सम्मानित हैं। उनसे khantalhaofficial@gmail.com पर संवाद संभव है।

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