कविताएँ और तस्वीरें ::
रुस्तम

hindi poet rustam
रुस्तम

कभी यहाँ एक घर था

कभी यहाँ एक घर था।
एक बिल्ली अब भी यहाँ पर आती है :
छत से छज्जे पर कूदती है।
कव्वा हँसता है लगभग अंतहीन हँसी।
दरवाज़े खुलते हैं, चर्राते हैं।
पत्ते उड़ते हैं।
हवा
घूमती है
उस घर में
जो कभी यहाँ था।

कहने को कुछ नहीं

कहने को कुछ नहीं,
पर फिर भी कुछ तो कहूँगा।
जैसे :
अब यहाँ मन नहीं लगता
तुम्हारे साथ भी।
या कि :
हम रहें
या न रहें,
कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।
ज़िंदा रह कर भी
कुछ लोग
इस दुनिया से
परे चले जाते हैं।
सहने को कुछ नहीं,
पर फिर भी कुछ तो सहूँगा।

ढहे घर से

ढहे घर से किसी के खाँसने की आवाज़ आती है।
एक बिल्ली उसके आँगन में गोल-गोल, गोल-गोल चक्कर काटती है।
टूटी खाट पर एक प्राचीन औरत बैठी है—
मैले कपड़े, बिखरे बाल, आँखें किसी के आने के इंतज़ार में।
कौन चला गया था? किसे आना है या कभी नहीं आना है?

सिर्फ़ इतना कह सकना

सिर्फ़ इतना कह सकना कि तुम सुंदर हो,
तुम्हें देख सकना,
तुम्हें छू सकना,
तुम्हें सूँघ सकना।
क्या पता यह सब
कब
वर्जित हो जाए।

यदि हम दूर नीचे उतर जाएँ
अरुण देव के लिए

यदि हम दूर नीचे उतर जाएँ, बहुत दूर नीचे,
यदि हम रस्ते में जो झाड़ी है, जिस पर एक फूल है, वहाँ नहीं रुकें,
यदि हम उस तरफ़ नीली जो पहाड़ी है उसे नहीं देखें,
बस दूर नीचे उतर जाएँ जहाँ नदी है, जो लगभग ख़ाली है, जिसमें बहुत कम पानी है,
यदि वहाँ हम बैठ जाएँ और वहीं पर बैठे रहें,
कुछ बोलें नहीं,
वहाँ दूर नीचे, नदी के किनारे, वहाँ जो भी आवाज़ें हैं, बस उन्हें सुनें।

कितनी दूर चले आए थे

कितनी दूर चले आए थे
हम कितनी दूर,
एक अजनबी प्रदेश में।
वहाँ कौन हमें पहचानता था?
उस भीड़ में भी हम अकेले थे—
जैसे मरु में अकेला था वह पेड़
जिसे हम लाँघ आए थे,
जिस पर बोल रहा था
बूढ़ा एक कव्वा—
और हर क्षण ख़तरे में था
हमारा जीवन।
तुम्हें याद है
हम क्यों चले आए थे
घर-बाहर छोड़कर?
क्योंकि सूख रही थीं नदियाँ
और बढ़ रहा था बंजर;
एक-एक कर मर रहे थे पशु-जानवर,
और जो मित्र थे उनकी भी आँखें बदलने लगी थीं।
और हमने पहली बार
ईश्वरों को हँसते हुए देखा—
शायद वे ख़ुश थे
कि उजड़ रहा था मेला,
कि अब वे मुक्त हो जाएँगे।

सब कुछ बदल गया है

सब कुछ बदल गया है।
मैं भूल गया हूँ हम कब यहाँ आए थे,
कब यहाँ से गुज़रे थे।
पर सब कुछ बदल गया है।
सब कुछ भिन्न है
और मृत है
और सुंदर है।

पहाड़ियाँ अब भी यहाँ हैं
पर अब वे ख़ाली हैं।
सिर्फ़ पत्थर और चट्टानें उन पर खड़े हैं।
सूर्य अब भी निकलता है।
एक गड्ढा लावा उगल रहा है।
एक कंकड़ कहीं चमक रहा है।
तीन पेड़
जो पहले यहाँ थे
अब नहीं हैं।
एक घोड़ा
जो पिछली बार
लपक कर चला गया था,
उसकी बस कल्पना है।
कल्पना सुंदर है।

ध्वंस घर खड़ा है

ध्वंस घर खड़ा है।
सूर्य इस पर पड़ रहा है।
आह्ह्हह्ह किसका था यह घर?
कौन इसमें रहता था?
कौन चला गया था इसे छोड़कर?
अब वह कहाँ होगा?
कितनी दूर?
क्या वहाँ पर भी उसका कोई घर होगा?
या कि सड़क के किनारे कहीं वह पड़ा होगा?
ठंड से अकड़ा होगा?
भयभीत, डरा होगा?
झुक गया होगा, या अड़ा होगा?
जीवित, या कि मरा होगा?
ध्वंस घर खड़ा है।
सूर्य इस पर पड़ रहा है।

बर्फ़ में दूर तक

बर्फ़ में दूर तक
कटे हुए पेड़ों के ठूँठ खड़े थे।
लेकिन मुझे लग रहा था
कि वे पेड़ ही थे और अभी हरे थे।
सफ़ेद काग़ज़ पर
जब मैंने
उन्हें बनाने की कोशिश की
तो वे मात्र ठूँठ ही बने
और वह भी काले रंग के।
इस तरह
बर्फ़ में दूर तक
काले रंग के ठूँठ खड़े थे
हालाँकि मुझे लग रहा था
कि वे पेड़ ही थे और अभी हरे थे।

दूर-दूर तक बड़ खड़े हैं

दूर-दूर तक बड़ खड़े हैं,
मोटे तनों वाले।

ऊबड़-खाबड़ टहनियाँ चहुँ ओर फैली हैं, इक-दूजे को छू रही हैं, कुछ सीधी हैं, कुछ मुड़ी हुई हैं, कुछ नीचे की ओर झुकी हुई हैं, कुछ ज़मीन में गड़ गई हैं, जड़ें बन गई हैं—वहाँ से नए बड़ उगेंगे।

दूर-दूर तक और कुछ नहीं, सिर्फ़ बड़ हैं।
मैं उनके नीचे, उनसे घिरा हुआ खड़ा हूँ,
उन्हें देख रहा हूँ, उन्हें सूँघ रहा हूँ।

यह उस तरह नहीं है जैसे मनुष्यों से घिरा हुआ एक बड़ हो, जिसके नीचे रंग-बिरंगा कोई पत्थर हो, जिसके सामने पथ्य कुछ पड़ा हो, अगरबत्ती जल रही हो और उसका धुआँ बड़ के नथुनों में चढ़ रहा हो।

बिल्कुल नहीं।

दूर-दूर तक और कुछ नहीं, सिर्फ़ बड़ हैं।
मैं उनके नीचे, उनसे घिरा हुआ खड़ा हूँ।

न जल जल था

न जल जल था, न हवा हवा थी, न नदियाँ नदियाँ थीं, न झीलें झीलें थीं, न समुद्र समुद्र था, न बादल बादल थे, न बारिश बारिश थी, न अन्न अन्न था, न फल फल थे, न प्रेम प्रेम था, न मनुष्य मनुष्य था, न मंदिर मंदिर थे, न ईश्वर ईश्वर था।

वहाँ कुछ भी विशुद्ध नहीं था।

ऐसी दुनिया में मैं पैदा हुआ, रहा और फिर चला गया।

कुछ अजब दृश्य इधर मैंने देखे हैं

कुछ अजब दृश्य इधर मैंने देखे हैं।
एक दर्पण उड़ रहा था तूफ़ान में।
एक द्वार बह रहा था बाढ़ में।
एक पेड़ घरघराकर गिर पड़ा।
एक पक्षी उड़ नहीं पा रहा था।

मैं जहाँ भी गया वहाँ घायल कोई जानवर कराह रहा था—भरे नहीं जा सकते थे उसके ज़ख़्म, वह इतना आहत था।

मैं रब हूँ, मैं रब हूँ, विक्षिप्त एक व्यक्ति चिल्ला रहा था, मैंने ही बनाया था यह नर्क।

पूरी पृथ्वी पर कहीं लाल, कहीं हरा ख़ून बिखरा पड़ा था।

***

रुस्तम (जन्म : 30 अक्टूबर 1955) कवि, दार्शनिक और अनुवादक हैं। अब तक उनके पाँच कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें एक संग्रह किशोरों के लिए कविताओं का है। अँग्रेज़ी में भी उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं। वह भोपाल में रहते हैं। उनसे rustamsingh1@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति से पूर्व ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित और ख़ासी चर्चित उनकी डायरी यहाँ पढ़ें :

संस्कृति के संकट

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