कविताएँ ::
मनीषा जोषी

मनीषा जोषी

स्त्री

बस स्टेशन के सार्वजनिक शौचालय की दीवार पर
पहली बार पढ़ा था मैंने—
तेरी माँ की योनि

उस वक़्त वहाँ बस स्टैंड के एक कोने में
चाय की एक दुकान थी
और उसकी बग़ल में था
एक अख़बार विक्रेता का स्टॉल

तब से जान लिया मैंने
कितनी गहरी होती है—
स्त्री की योनि
जो समा लेती है अपने अंदर
इन सब चाय पी रहे
और अख़बार पढ़ रहे
पुरुषों को।

मातृभाषा

बहुत सुकूनदायी होता होगा
अपनी मातृभाषा में
माँ-बहन की गालियाँ देना!
ख़ास करके तब
जब पिता व्यभिचारी हो
और भाई कामचोर।

वे अनाथालय
जहाँ किया जाता है
बिन माँ की बालिकाओं पर बलात्कार
वहाँ आनंद की चरम-सीमा में
पुकार उठता होगा वह बलात्कारी
कुछ शब्द
अपनी मातृभाषा में।

मातृभाषा अब हो गई है इतनी सरल
कि लिखी जा सकें कविताएँ
मातृभाषा अब हो गई है इतनी अपनी
कि सोचे जा सकें नए-नए गुनाह।

मातृभाषा में लिखी गई कविताएँ
अब किसी अनौरस संतान-सी
देख रही हैं दूर से
मातृभाषा में सोचे जा रहे अपराधों को।

मिलावट

मैं नहीं कर पाती फ़र्क़ अब
काली मिर्च में मिले हुए
पपीते के काले बीज
और काली मिर्च के बीच।

काली मिर्च के तीखे स्वाद की स्मृति
नहीं रही अब मेरी जिह्वा पर
और पपीते के बीज भी
नहीं लगते मुझे स्वादहीन।

मैं अब नहीं पहचान पाती
दालचीनी के साथ मिले हुए
लकड़ी के छोटे टुकड़े
या हींग में मिला हुआ आटा।
नहीं बची कोई स्मृति
अब मुझमें सुगंध की।

कोई एतराज़ ही नहीं मुझे अब
घी में मिलाए गए उबले हुए आलू से
या दूध में मिलाए गए चावल के पानी से।

शकरकंद पर लगा हो चाहे गेरुआ रंग
या केसर में मिले हों लाल रंग के धागे।

दरअसल, मैं करना ही नहीं चाहती फ़र्क़ अब
एक जीवन में मिलाए गए दूसरे जीवन से।

मेरी रसोई आज प्रसन्न है—
घुल-मिल गए जीवन से।

प्रगल्भ प्रणय

अरण्य से प्रगल्भ प्रणय में लीन
हम चल रहे थे स्वप्न में
और हमारे पीछे-पीछे
कुछ वृक्ष भी
चले आ रहे थे नींद में।

वृक्ष शायद सुन रहे थे हमारी बातें
पर हम बे-ख़बर थे उनकी सरसराहट से।

स्वप्न में स्वप्न के होने से भी
सुंदर था वह
साथ हमारा होना।

अब तुम नहीं हो
कहीं नहीं हो।

मेरे एकाकी वन में
अब मैं सुन सकती हूँ
वृक्षों की बातें
और अब तो मैं देख सकती हूँ
वृक्षों की आत्माएँ भी।

मेरे घने एकांत में
अब मेरे पास आते हैं
नींद में चल रहे रानी पशु।

मैं झाँकती हूँ इनकी करुणामय आँखों में
पर वे आँखें मुझे पार करके,
देख रही होती हैं कुछ और।

मूर्च्छित ये वृक्ष और ये रानी पशु
अब ले जा रहे हैं मुझे—सम्मोहित
वन के एक सामूहिक स्वप्न के पास।

मेरी चेतना
अब नहीं है सिर्फ़ मेरी।

कविता के इर्द-गिर्द

भाषा

किसी पक्षी के पाँव में रिंग पहनाकर
उसे उड़ा देने वाले पक्षीविद् की तरह
मैं खोजती फिरती हूँ भाषाओं को।

मैं इंतज़ार करती हूँ
उस पक्षी के वापस आने का
जो ले आएगा
एक ऐसी भाषा
जो होगी सबसे क्लिष्ट।

कुछ सरल संवाद अब
मुमकिन हो पाएँगे सिर्फ़
सबसे जटिल भाषा में।

अनुवाद

मेरी भाषा में
कुछ ऐसे शब्द हैं
जो तुम्हारी भाषा में नहीं हैं।

तुम्हारी भाषा में
कुछ ऐसे कवि हैं
जो मेरी भाषा में नहीं हैं।

एक बूढ़ी औरत नहीं चाहती
अपना गाँव
अपना घर
छोड़कर कहीं जाना
पर ले जा रहे हैं उसे
उसकी खटिया समेत
एक गाँव से दूसरे गाँव तक।

सम्मेलन

कवि-सम्मेलनों में इकट्ठे हुए कवि
एक-दूसरे को सुनते कम
और देखते हैं ज़्यादा—
इतना ज़्यादा कि दूसरे की
सारी अधूरी कविताएँ भी
देख लेते हैं अपने हिसाब से।

ख़ुद की बारी आने पर
जब वे खड़े होते हैं
तब हाथ में माइक लेकर
पहले अक्सर पूछते हैं—
क्या सबको सुनाई दे रही है मेरी आवाज़?

तब साथी कवियों में से कोई नहीं
और श्रोताओं में से भी
बहुत कम ही देते हैं जवाब!
पर कवि फिर भी शुरू कर देते हैं—
अपना कविता-पाठ।

श्रोता

कविता-पाठ करते वक़्त
मेरे गले में
अचानक से प्यास उठती है।

डूब जाती है आवाज़
जैसे गिर पड़ी हो
नदी के ऊपर से उड़ रहे किसी पक्षी के
मुँह में पकड़े हुए शिकार-सी।

मैं पेश करती हूँ कुछ कविताएँ
सिवाय उसके!

मेरी वह एक प्रिय कविता
जो मर रही होती है उस नदी में।

कविता श्रवण के लिए बैठे हुए चेहरे
जब मैं देखती हूँ तो मुझे लगता है
ये वही लोग हैं
जो देख रहे हैं नदी के तट पर खड़े
मुझे डूबते हुए
और कुछ नहीं कर रहे
बचाने के लिए।

पुरस्कार

कोरे काग़ज़ नहीं बचे मेरे पास।

मैं लिखती हूँ अब कविता
अपने हाथ-पाँव पर
और फिर देखती हूँ अपने हाथ-पाँव को
कि क्या वे भी मुझे देख रहे हैं?

जब न रहा शरीर का कोई अंग ख़ाली
तब अब उल्टे हाथ से
लिखने लगी हूँ अपनी पीठ पर भी।

मेरे बाज़ार जाते वक्त
आप जो देख लेते हैं वे सब
मेरी खुली पीठ पर लिखी गई कविताएँ हैं
जिन्हें अभी-अभी पुरस्कृत किया गया है।

मैं जी रही हूँ अब
पुरस्कृत कविताओं के शरीर में।

मनीषा जोषी गुजराती कवयित्री हैं, लेकिन यहाँ प्रस्तुत कविताएँ उन्होंने सीधे हिंदी में लिखी हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : दो शहर, दो नदियाँ

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