सफ़र ::
मनीषा जोषी

मनीषा जोषी, वाराणसी 

वियना से वाराणसी, डेन्यूब से गंगा : दो शहर, दो नदियाँ

समाधान विरोधपूर्ण आभास से

विरोधाभास एक ऐसा विरोधमूलक अर्थालंकार है, जिसमें विरोध का वर्णन होते हुए भी विरोध का आभास हो।

विरोध का आभास—बहुत भा गई है यह विभावना मुझे। वियना और वाराणसी—दो ऐसे अंतिम हैं कि सबसे पहले विरोधाभास की परिभाषा को समझना ज़रूरी है। बस यही सुनना चाहती थी मैं कि मूलत: विरोध का अस्तित्व ही नहीं है। सृष्टि अपने आपमें संवादित है और जो अंतिम और विरोधी लगता है, वह दरअसल उसके क़रीब आने के इंतज़ार में होता है जिससे वह अलग है। जहाँ बाहर से विरोध दिखाई दे, पर वास्तव में विरोध न हो—इसी सिद्धांत पर शायद पृथ्वी का निर्माण हुआ है।

विरोधाभास कितना भी तीव्र क्यूँ न हो, अंत में यह सूर्यास्त की वह लकीर है जो शाम ढले क्षितिज में विलीन हो जाती है और सब कुछ इस तरह संवादित लगने लगता है जैसे धीरे से अलोप होता जा रहा सूर्य अपनी सारी ऊष्मा त्याग देता है। क्या सिर्फ़ एक शहर का दूसरे शहर से ज़्यादा स्वच्छ और समृद्ध होना ही विरोधाभास है? अगर ऐसा होता तो डेन्यूब और गंगा की प्रकृति भी अलग होती। लेकिन जैसे सारी नदियों की प्रकृति है—बहना, वैसे सारे शहर भी एक ही प्रकृति रखते हैं, और वह है—पनाह देना। धिक्कारने के बावजूद भी शहर बस जाता है हम में और हम शहर के चौराहों पर लगे सिनेमा के पोस्टरों और खाने-पीने के खोमचों के नज़दीक से गुज़रते वक़्त अक्सर यह भूल जाते हैं कि शहर हममें किस हद तक प्रवेश कर चुका है और दरअसल इस अजनबी शहर के सिवाय और कुछ है ही नहीं हमारे पास जिसे हम अपना कह सकें।

मैं दुनिया के जितने नए-नए शहरों में घूमती हूँ, उतना ही मुझे लगने लगा है कि अंतत: ये सारे शहर मेरे उस गाँव की तरह हैं, जिसे मैं बचपन के बाद छोड़ चुकी हूँ।

शहर आख़िर क्या है? मुझे चाहिए हर एक शहर में एक नया प्रेमी जो मुझसे कहे कि आज यहाँ, इस जगह पर आकर मिलो। किसी नए शहर को अपना मानने के लिए बस इतना ही तो चाहिए! हाँ, मुझे चाहिए बहुत सारा प्रेम, दुनिया के बहुत सारे शहरों में! बुडापेस्ट हो या बनारस, एक ही है वह जगह, नदी तट की दीवार की आड़ में, जहाँ पूरे शहर से छिपकर लिया जा सकता है अपने प्रेमी से एक चुंबन। एक अरसे बाद ख़याल आता है कि वह चुंबन दरअसल उस शहर के लिए ही था जिसके कुछ रास्ते परिचित लगने लगे थे। भाषा चाहे अलग हो, पर दीवारों पर लिखी गई ग्राफिटी एक ही होती है हर एक शहर में। लंदन की ट्यूब हो या न्यूयॉर्क की सब-वे, रोज़ काम पर आते-जाते लोग वही हैं, कॉलगर्ल्स वही हैं, बेघर भी वही हैं। शहरों की तासीर अपने आपमें बहुत सादी है… यह मैंने अक्सर देखा है—अपनी यात्राओं के दौरान।

गंगा घाट, वाराणसी

जो नहीं होता है उसकी संभावनाएँ कम नहीं होतीं

कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं जो अपना निर्माण ख़ुद ही कर लेती हैं। ‘वियना से वाराणसी, डेन्यूब से गंगा’ यह एक यात्रा भी इनमें से एक है। अमेरिका से हर साल मैं अपने परिवार से मिलने भारत आती हूँ और रास्ते में वेकेशन के तौर पर कोई और एक देश देखने की योजना रहती है। इस बार लंदन होकर कुछ दिन वियना (ऑस्ट्रिया) जाने का मन था। वियना से बुडापेस्ट (हंगरी) बहुत क़रीब है तो वहाँ जाने का भी मन हुआ और फिर भारत में दिल्ली के आस-पास की कोई जगह देखना चाहते थे तो वाराणसी जाने का सोचा। जब प्रवास की सारी बुकिंग हो रही थी, तब सहसा ख़याल आया कि यह तो पूर्व और पश्चिम का एक अनोखा आध्यात्मिक मिलन हो रहा है! पश्चिम में वियना, वैचारिक क्रांति के महत्त्व का शहर और पूर्व में वाराणसी, सबसे प्राचीन आध्यात्मिक शहर। गंगा, भारत की सबसे पवित्र नदी और डेन्यूब, यूरोप के दस देशों को जोड़े रखती सबसे एकत्व की ऐतिहासिक नदी, क्योंकि मैं ख़ुद भी पूर्व और पश्चिम के दो टुकड़ों में बँटी हुई हूँ, मुझे महसूस होने लगा जैसे वियना और वाराणसी—ये दो शहर, डेन्यूब और गंगा—इन दो नदियों से मेरा मिलना एक आत्मपरीक्षण के स्तर पर ज़रूरी है।

कई बार होना इसलिए रसप्रद हो जाता है कि जो नहीं होता है उसकी संभावनाएँ भी कम नहीं होतीं। अगर वाराणसी के बदले अमृतसर चले जाते या फिर वियना के बदले एमस्टर्डम चले जाते तो ऐसा यह पूरा संयोजन कभी नहीं बन पाता। एक जर्मन फ़िल्म है, ‘रन लोला रन’, जो ऐसी ही कुछ संभावना की बात करती है। लोला को अपने बॉयफ़्रेंड को बचाने के लिए बीस मिनट में एक लाख डच मार्क जितने पैसे जमा करने होते है, जिसके लिए वह भागती है, कुछ लोगों से मिलती है और कुछ घटनाएँ घटती हैं। इस फ़िल्म में दो बार पुनरावर्तन में, अलग घटनाएँ और दो अलग अंत हैं—एक, अगर सारी घटनाएँ इस शृंखला में होतीं तो और दूसरा अंत, अगर ऐसा नहीं होता तो। नियति में संयोग का हिस्सा कितना है, एक से दूसरा क्षण क्या ऐसे ही जुड़ जाता है कि इसके पीछे समय की कोई व्यूह-रचना रहती है… इस तरह के प्रश्न जब हम जीवन को पीछे मुड़कर देखते हैं, तब अक्सर हमारे मन में आते हैं; लेकिन इनका जवाब नहीं होता।

मुझे भी मेरी यह यात्रा कुछ इस वजह से ही विशेष लग रही है। शायद इस यात्रा से मेरे अंदर कुछ समाप्त होगा, शायद मैं किसी अंत से ज़्यादा नज़दीक पहुँच रही हूँ, शायद मुझे कुछ ऐसा मिलेगा जो मैं खोज भी नहीं रही, शायद मैं प्रेम करूँगी फिर से एक बार मेरे अंदर के यात्री को, शायद मैं समाधान करूँगी मेरे अंदर के विरोधाभास का… इन सब ख़यालों के साथ शुरू हुई थी यह यात्रा और अब यात्रा संपन्न होने के बाद यह सब लिखते वक़्त मैं याद करना चाहती हूँ एक ऐसा क्षण जो इस समग्र यात्रा की पराकाष्ठा हो।

वह क्षण है— वाराणसी की वह शाम जब गंगा के घाट पर अचानक से सुनाई दी थी ‘साउंड ऑफ़ म्यूजिक’ की धुन! दशाश्वमेघ घाट पर शाम की अग्निपूजा और गंगा आरती के बाद हम एक से दूसरे घाट पर आराम से चलते हुए घूम रहे थे और हमारे आस-पास कुछ दूसरे यूरोपियन प्रवासी भी ऐसे ही टहल रहे थे, तभी बिल्कुल अनपेक्षित यह धुन कानों में पड़ी और हम सबके चेहरे पर ख़ुशी की लहर छा गई थी। यूरोपियन प्रवासी तो जैसे झूम उठे और हम सब अपनी बाँसुरी पर ‘साउंड ऑफ़ म्यूजिक’ की धुन बजा रहे उस बूढ़े कलाकार के पास जाकर खड़े हो गए। उसने तो यह धुन किसी विदेशी से अनायास सीख ली होगी, लेकिन मेरे लिए यह एक क्षण में बहुत कुछ था—आश्चर्य, आनंद, अपनापन और सबसे ज़्यादा तो यह जैसे एक तरह की घर वापसी थी। ‘साउंड ऑफ़ म्यूजिक’ पाश्चात्य जगत में सर्वप्रिय, संगीतप्रधान फ़िल्म है, जिसका फ़िल्मांकन ऑस्ट्रिया में वियना के पास साल्झबर्ग में हुआ है। इस एक पल में वाराणसी और वियना जैसे एक हो गए थे। विरोधाभास अगर था तो यह उसके ख़त्म होने का क्षण था, और यही क्षण था—मेरे लिए समाधान का।

वियना और वाराणसी का वास्ता वैसे बहुत पुराना है। यह उस वक़्त की बात है, जब संवाद और प्रत्यायन के लिए मोबाइल फ़ोन या ई-मेल नहीं थे और हम संदेश के लिए पोस्टकार्ड भेजा करते थे। पुराने भारतीय पोस्टकार्ड का संग्रह कर रहे सान फ़्रांसिस्को स्थित इतिहासविद् ओमार ख़ान के अनुसार अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन और यूरोप से भारत आते कलाकार प्रवासी भारतीय लैंडस्केप के वाटरकलर चित्र बनाते थे, जिनमें से ज़्यादातर पोस्टकार्ड वाराणसी के चित्रकार बनाते थे और फिर वियना के प्रिंटिंग प्रेस में ये चित्र, कार्ड पर छापने के लिए भेजे जाते थे। छपकर ये कार्ड भारत आते थे और मज़े की बात ये कि फिर बाद में वाराणसी आते कई दूसरे यूरोपियन प्रवासी ये पोस्टकार्ड अपने वियना में रहते संबंधियों-प्रेमियों-शुभचिंतकों को भेजते थे! वैश्वीकरण का एक पूरा वर्तुल जैसे यहीं शुरू होकर संपूर्ण हो रहा था।

आज भी कितने सारे प्रवासी आते हैं, वियना से वाराणसी, अध्यात्म की खोज में! वाराणसी के छोटे-से एयरपोर्ट पर मैंने एक यूरोपियन परिवार को घर वापस जाते देखा। युवा पति-पत्नी और उनकी एक छोटी-सी बच्ची। इन सबके कपड़े पाश्चात्य थे पर इन तीनों के कपाल पर बिंदी लगी हुई थी। अध्यात्म का वैश्वीकरण एक बहुत बड़ा बाज़ार है, जिसमें ॐ लिखे हुए टी-शर्ट और हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले कुशन कवर से लेकर योगा-मेडिटेशन रीट्रीट तक बहुत कुछ शामिल है।

वाराणसी प्राचीन काल में भगवान बुद्ध के समय से आध्यात्मिक जागृति का केंद्र रहा है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहाँ सारनाथ में दिया था और आज भी दुनिया भर के बौद्धपंथी प्रवासियों के लिए सारनाथ की यात्रा अहमियत रखती है। धर्म, अध्यात्म, संगीत, कला, व्यापार हो या फिर मृत्यु; सबके लिए काशी जाना ही उत्तम माना जाता था। गुजराती में एक कहावत है, ‘सुरतनुं जमण ने काशीनुं मरण’ जिसका मतलब कुछ यूँ है कि खाने में सूरत का खाना श्रेष्ठ और मृत्यु के लिए काशी। मृत्यु के नाम पर पर्यटन का कारोबार कितना विशाल है, यह काशी आकर ही पता चलता है।

मेरा मोक्ष तुम्हारे मोक्ष से अलग है

मैंने चाहा कि मैं पूछूँ किसी से कि मोक्ष क्या है?

बुडापेस्ट में डेन्यूब के तट पर बीयर की बोतल लेकर बैठे हुए एक नौजवान लड़के को देखकर मैं उसके पास गई थी। पश्चिम मे जन्मे-पले एक गोरे लड़के से मैं शायद यह सुनना चाहती थी कि वह सिर्फ़ वर्तमान में जीता है, वह मोक्ष के बारे में कुछ नहीं सोचता। लेकिन उसने कहा, ‘‘वह मृत्यु के लिए तैयार है, पर उसे मोक्ष नहीं चाहिए।’’ मोक्ष की बात पर वह हँस पड़ा था, “यू मीन सॉल्वेशन? लाइक सॉल्वेशन आर्मी?” सॉल्वेशन आर्मी दान में दी जाने वाली पुरानी चीज़ें और कपड़ों की दुकान है। मृत्यु के बाद भी अपनी पुरानी चीज़ों का विक्रय होता रहे, यह भी क्या मोक्ष का ही एक प्रकार नहीं? मुझे कहना चाहिए कि मोक्ष की सबसे यथार्थ और सबसे प्रिय संभावना मुझे अब यही लग रही है।

वाराणसी में गंगा आरती के दर्शन के लिए हमने एक नाव किराए पर ली थी। दशाश्वमेध घाट पर इस भव्य आरती के दर्शन के लिए काफ़ी भीड़ जमा हुई थी। हम नाव में बैठकर यह पूरी विधि निहार रहे थे। नाव का मालिक एक युवा लड़का था जिसने अपना नाम बताया था, विनोद बोटमैन। वह बड़ा बातूनी था और बातों-बातों में उसने बताया कि नाव उसकी अपनी है, पर अभी परिवार के लिए घर ख़रीदना बाक़ी है। वैसे मेरे ख़याल से तो यह नाव ही उसका घर है और वाराणसी में नाव का होना ही सही मायने में घर का होना है। वाराणसी में नाव का होना, घर के होने से ज़्यादा सुंदर है, क्योंकि नदी को अर्थ सिर्फ़ एक नाव ही दे सकती है—घर नहीं। गंगा पर उदय होते और अस्त होते सूर्य का साक्षी वह बन रहा था हर रोज़, सिर्फ़ इस नाव की वजह से। हम बैठे थे उस वक़्त विनोद के किसी दोस्त ने मोबाइल पर फ़ोन किया तो उसके रिंगटोन पर ‘मुक़द्दर का सिकंदर’ फ़िल्म का गाना बजने लगा था :

ज़िंदगी तो बेवफ़ा है, एक दिन ठुकराएगी
मौत महबूबा है, अपने साथ लेकर जाएगी…

विनोद ने फ़ोन उठाया तो गाना बंद हो गया ओर दूसरी तरफ़ गंगा आरती के अंतिम चरण में मंत्रोच्चार तेज़ हो रहे थे। भाविकों के ‘हर हर गंगे’ के नाद से पूरा घाट भक्ति के आवेश में था, लेकिन मेरे मन में अब तक विनोद के मोबाइल की रिंगटोन में सेट वह गाना चल रहा था जो अचानक बंद हो गया, जिसे मैं पूरा नहीं सुन सकी। दर्शन या अध्यात्म से ज़्यादा मुझे चाहिए था वह गाना—उस एक क्षण में। हाँ, उस एक पल में मुझे अध्यात्म से ज़्यादा बॉलीवुड की भावुकता अच्छी लग रही थी, लोकप्रियता अच्छी लग रही थी, फ़िल्म में मरते हुए अमिताभ के अंतिम दृश्य नज़र के सामने आ रहे थे।

मैंने विनोद से कहा, “मैं जब छोटी थी तब अमिताभ की बहुत बड़ी फ़ैन थी।” हालाँकि उसको अपने नाम की वजह से विनोद खन्ना ज़्यादा पसंद था, लेकिन इस एक बात से हम दोनों के बीच कोई ऐसा रिश्ता जुड़ रहा था जो हमारे बीच नहीं था, पर एक फ़िल्म और एक अभिनेता के किरदार के काल्पनिक दुख पर आधारित था। हम क्यूँ जुड़ रहे थे दुख से? मौत क्यूँ थी हमारी महबूबा?

कुछ देर बाद उसने मुझे एक दिया जलाकर कुछ फूलों के साथ गंगा के पानी में बहाने को कहा। यह मैंने किया, लेकिन काशी आने से पहले से ही मैं जानती थी कि मेरा मोक्ष यहाँ नहीं है। उसने कहा कि अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना करो, पर मैं उसे यह कैसे समझाती कि मेरा कोई पूर्वज नहीं है! अजनबी हैं मेरे पूर्वज और मैं वह जगह नहीं जानती, जहाँ मुझे मोक्ष मिलेगा। वह जगह अलास्का की खाड़ी (गल्फ़ ऑफ़ अलास्का) जैसी होगी, जहाँ कहते हैं कि दो महासागरों का पानी मिलकर भी अलग रंग में, अलग-अलग ही रहता है? वैसे अब मोक्ष और अस्थि-विसर्जन की बात भी मुझे उबाऊ और आत्मरतिप्रचुर लगने लगी है। मेरे अस्थिफूल कहीं भी उड़ा दो, क्या फ़र्क़ पड़ता है? अस्थिफूल वीर्य थोड़े ही है कि कहीं नया जीवन जन्म लेगा?

मैंने विनोद से पूछा, “तुम कबसे हो यहाँ?” उसने कहा, “जन्म से।” उसके उत्तर का मतलब था यूँ ही कुछ बीस साल, लेकिन मुझे लगा कि जैसे वह यहाँ क़रीब पाँच हज़ार सालों से है, जब दुनिया का यह प्राचीन शहर बस रहा था, जब ये घाट नए-नए बने थे और इनका नामकरण बाक़ी था।

किसी प्राचीन शहर में रहना भी कितना अजीब है। हर एक नई चीज़ यहाँ किसी अवैध रिश्ते जैसी लगती है और जो पुराना है वह इतना अतीत है कि उसे वापस लाना अपने आपमें एक तरह की ज़्यादती होगी।

मोत्ज़ार्ट हाउस, वियना

एक अंतिम दृश्य जो होता

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट एक ऐसा घाट है, जहाँ नएपन के नाम पर सिर्फ़ यहाँ आते नए-नए मुर्दे ही हैं! पूरा घाट लकड़ी के ढेर से भरा पड़ा था और पास में रखा हुआ था एक बड़ा-सा तराज़ू। कुछ चिताएँ जल रही थीं और अगर ग़ौर से देखो तो नज़र आती थी उन अजनबियों की आत्माएँ भी जो नदी के उस पार जाने के लिए नाव का इंतज़ार कर रही थीं! रात के वक़्त यह घाट अपने आपमें एक परावास्तविक अनुभव लग रहा था। मानव-देह के जलने की और दाह के लिए लाए गए घी की ख़ुशबू मिल-जुलकर एक तटस्थ इंद्रियगत एहसास करा रही थी।

मेरे पिता की अस्थियाँ मैंने गुजरात में नर्मदा नदी के नीर में बहाई थीं, लेकिन इस घाट पर आकर मुझे स्वाभाविक तौर पर उनकी याद आ गई और इसके साथ अकीरा कुरोसावा की फ़िल्म ‘ड्रीम्स’ भी। इस फ़िल्म में ‘द पीच ऑर्चर्ड’ की एक कहानी है। जापान में वसंत के वक़्त डॉल्स फ़ेस्टिवल मनाया जाता है, जिसमें ये गुड़ियाएँ, पीच ट्री ब्लॉसम यानी शफतालु के पेड़ की गुलाबी पुष्प मंजरी की प्रतीक मानी जाती हैं। इस कहानी में सात-आठ साल का एक छोटा लड़का अपने घर के बाहर गुलाबी कपड़े पहनी हुई एक छोटी लड़की को देखता है और उसका पीछा करते एक ऐसी जगह पहुँच जाता है, जहाँ कभी पीच के फलों का पूरा बाग़ान था। इस लड़के के परिवार ने अपने बाग़ीचे के सारे पीच के पेड़ काट दिए थे, इसलिए उसके अंदर एक अकथ्य दुख था।

(कुरोसावा ने इसी उम्र में अपनी बड़ी बहन की मृत्यु देखी थी, यह संदर्भ भी कुछ समीक्षक यहाँ देखते है।) लड़के को देखते ही इन सारे टूटे हुए पेड़ों की आत्माएँ उसकी बहन की गुड़ियों जैसे भेष में, ग़ुस्से में उसके सामने आ जाती हैं। लड़का पूछता है, “आप क्यूँ मुझसे नाराज़ हैं? मैं तो ख़ुद इन पेड़ों के कट जाने से दुखी हूँ।” पेड़ कहते हैं, “तुम तो सिर्फ़ इसलिए दुखी हो कि अब तुम्हें हमारे फल खाने को नहीं मिलेंगे।” तब लड़का रोते हुए कहता है, “नहीं, फल तो मैं बाज़ार से भी ख़रीद सकता हूँ, लेकिन इस बाग़ान में पीच के सारे पेड़ जब फूलों से खिल उठते थे… वह दृश्य अब मैं नहीं देख सकता।” यह बात सुनकर वृक्षों की आत्माएँ तय करती हैं कि यह एक अच्छा लड़का है और वे सिर्फ़ कुछ पल के लिए इस लड़के को फूलों से खिल उठे पीच के पेड़ों का दृश्य एक बार फिर से दिखाने का फ़ैसला करती हैं। सारी गुड़ियाएँ उसके सामने एक धीमा नृत्य करती हैं। वन लास्ट ग्लान्स ऑफ़ द पीच ब्लॉसम। लड़का इन गुड़ियों के बीच फिर से उस रहस्यमय, छोटी लड़की को देखता है और उसके पीछे भागता है, पर वह लड़की और सारे पुष्पाच्छादित पेड़ अदृश्य हो जाते हैं। अंत में वह उन कटे हुए पेड़ों के बीच एक छोटे पेड़ को फिर से खिलते हुए देख पाता है।

यह कहानी मुझे यहाँ याद आई क्योंकि मेरे पिता की मृत्यु के वक़्त मैं वहाँ मौजूद नहीं थी और इसलिए मुझे कई बार ऐसा लगता है कि क्यों मैं उनसे एक बार और फिर से नहीं मिल सकती? बस सिर्फ़ एक बार, सिर्फ़ कुछ क्षणों के लिए ही सही! लेकिन यह ‘वन लास्ट ग्लान्स’ एक ऐसी ग्लानि है जो कभी हक़ीक़त नहीं बन सकती। मणिकर्णिका घाट पर जल रही और कुछ आधी बुझी हुई चिताएँ मुझे उन कटे हुए पीच के पेड़ों जैसी दिख रही थीं। अभाव की अनुभूति जैसे मणिकर्णिका घाट की हवा में ही शामिल है। यह घाट मुझे अपने अभाव में बहुत दूर तक ले गया।

नदी तट पर रहने वाले लोग दूसरे हैं

वाराणसी में दूसरे दिन सुबह नाव में गंगा की सैर करने का मन था, लेकिन हम जल्दी उठ नहीं पाए। हमने दुपहर में अलसाई हुई गंगा की सैर की। मुझे लगता है कि नदी तट पर रहने वाले लोग अलग होते हैं—समंदर किनारे रहने वाले लोगों से। साफ़ दिखता है यह फ़र्क़—इनकी आँखों में, इनकी बातों में। समुद्र के क़रीब रहते लोग मुझे कुछ लालची लगते हैं। वे बार-बार चले जाते हैं—समंदर के किनारे, जैसे वे भर लेना चाहते हैं पूरा समंदर और सारी हवा अपनी आँखों में, अपनी साँसों में! जबकि पहाड़ों पर रहते लोग हालाँकि सुंदर होते हैं, पर कुछ शुष्क दिखते हैं। वे ठंड से बचने के लिए आग जलाए बैठे रहते हैं—अपनी भली पत्नियों के साथ। उनकी पत्नियों के माथे पर स्कार्फ़ बँधा हुआ रहता है और बच्चों के कान पर टोपी। नदी तट पर रहते लोग मुझे सबसे ज़्यादा शांत और स्थितप्रज्ञ लगते हैं। वे समंदर की तरह उन्मादी नहीं और न ही पहाड़ों की तरह उन्मुक्त। वे अपने जीवन को बस नदी के साथ-साथ बहने देते हैं। यह साक्षी भाव मुझे प्रिय है। बनारस की पुरानी-सँकरी गलियों में जीवन बह रहा था, उतनी ही सहजता से जितनी कि बुडापेस्ट में नदी के पास से गुज़र रही थी ट्राम। उस ट्राम में बैठकर अपनी रोज़ की नौकरी के लिए जाते लोग देख भी नहीं रहे थे, वहाँ की भव्य नदी डेन्यूब की ओर, लेकिन फिर भी एक नदी थी जो बह रही थी वहाँ—शहर को अपने साथ लेते हुए।

नदियों के किनारे जो निर्वाह देते हैं, वे भी कितने सुंदर हैं। मैं उन बड़े-बड़े महँगे रिवर क्रूस की बात नहीं कर रही, पर जैसे डेन्यूब के किनारे कोयले पर भुने हुए गरम-गरम चेस्टनट बेचता हुआ कोई हंगेरियन हो या फिर गंगा के घाट पर पूजा की सामग्री बेच रहा कोई बूढ़ा पंडित।

वाराणसी में यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि यहाँ बहुत बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी थे। भारत में घरेलू पर्यटन में पिछले कुछ सालों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। देश के विभिन्न राज्यों में हर साल करीब डेढ़-दो अरब जितनी यात्राएँ अब भारतीय मुसाफ़िर ही करने लगे हैं। समृद्ध होते जा रहे भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों की वजह से गोवा भी अब गोवा कम और भारत ज़्यादा लगने लगा है।

वाराणसी तो हिंदू धर्म का पवित्र तीर्थस्थल भी है, इसलिए यहाँ पर ऐसे ग़रीब और देहाती यात्री भी देखने को मिलते हैं जिन्हें हम भारत के दूसरे पर्यटन स्थलों पर शायद कभी न देख पाएँ। इनमें से कुछ महिला प्रवासी तो कदाचित धर्म के बहाने पहली ही बार अपने गाँव से बाहर निकली होंगी। यहाँ रास्ते के बाज़ार में जो चीज़ें मिल रही थीं, वे भी इन ख़रीदारों को ध्यान में रखकर ही बिक रही थीं। जगह-जगह पर चूड़ियों और सिंदूर के ढेर लगे हुए थे। मैं तो अपनी माँग में कभी सिंदूर नहीं भरती, पर लाल और केसरी रंग के सिंदूर के ढेर इतने लुभावने लग रहे थे कि मैंने दो छोटी डिब्बियाँ ख़रीद ही लीं। उस वक़्त वहाँ पास में एक मुस्लिम लड़की खड़ी थी जो मुझे सिंदूर ख़रीदते हुए बहुत प्यार से देख रही थी। मेरे दिमाग़ में एक ख़याल आकर चला गया कि क्या वह किसी हिंदू लड़के से प्रेम करती होगी? उस एक पल में वह सिंदूर का ढेर जैसे अंधश्रद्धा और नारीवादी नफ़रत का साधन न रहकर शुद्ध प्रेम का जीवंत प्रतीक बन गया था।

प्रेम में सुंदर दिखने की स्त्री की इच्छा से अधिक सुंदर क्या कुछ हो सकता है?

मोत्ज़ार्ट हाउस, वियना

प्रवास में होना चाहिए पोर्न आर्किटेक्चर

प्रवास में स्थापत्य का न होना अपने बचपन के बिना ही बड़े हो जाने जैसा है। इस यात्रा के दौरान वियना और वाराणसी का भिन्न स्थापत्य देखना अपने आपमें एक अनूठा अनुभव था। बुडापेस्ट में हर तरफ़ इतना भव्य स्थापत्य है कि यह शहर ‘पोर्न आर्किटेक्चर’ के दर्जे तक मशहूर है। पार्लियामेंट बिल्डिंग, साइंस एकेडमी, म्यूज़ियम ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स, नेशनल म्यूज़ियम, गॉथिक स्टाइल कैथेड्रल्स, रोमन एम्फी थिएटर, टर्किश बाथ वग़ैरह… कितनी सारी एक से बढ़कर एक भव्य इमारतें हैं यहाँ। हम जिस होटल में ठहरे थे, वह होटल गेलर्ट भी आर्ट नुवो स्थापत्य शैली का उदाहरण है। आर्ट नुवो शैली एक ऐसी शैली है जिसमें कई अलग-अलग स्थापत्य शैली, एप्लाइड आर्ट और फ़ैशन का संयोजन किया जाता है।

बुडापेस्ट शहर बुडा और पेस्ट ऐसे दो हिस्सों में बँटा हुआ है। एक छोटी मोनो रेल में बुडा कासल पर पहुँचना मज़ेदार रहा। वहाँ की ऊँचाई से बुडापेस्ट शहर और भी सुंदर लग रहा था और इसका महत्तम श्रेय डेन्यूब को जाता है। किसी शहर के लिए भव्य स्थापत्य के साथ-साथ एक भव्य नदी का होना भी कितना ज़रूरी है।

वियना और बुडापेस्ट का स्थापत्य बरोक शैली का है। 1600-1700 का समय यूरोपियन इतिहास का एक ऐसा समय था जब स्थापत्य में भव्य शृंगार का चलन था। वियना के कैथेड्रल, महल, ओपेरा हाउस से लेकर आधुनिक वियना की कुछ इमारतें भी इस समय की याद दिलाती हैं। मानसशास्त्री सिगमंड फ्रायड वियना में रहे थे और उनका निवास-स्थान अब उनका स्मृति-स्थान बना दिया गया है। उनके अपार्टमेंट की सीढ़ियों की रचना इतनी सुंदर है कि देखकर लगा कि जैसे फ्रायड इन सीढ़ियों पर चढ़कर ही मानव-मन के तल तक पहुँचे होंगे। वियना में मोत्ज़ार्ट और बीथोवन जैसे विश्व के कुछ उत्तम संगीतकार भी रह चुके हैं। बीथोवन के घर तक की सीढ़ियों पर चढ़ते वक़्त लगा जैसे किसी दरिया किनारे लाइटहाउस की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे। बीथोवन के घर के बाहर जर्मन कवि होल्डरलिन का सुंदर शिल्प है। वियना में मोत्ज़ार्ट के घर की रचना सबसे ज़्यादा रसप्रद लगी, क्योंकि छहमंजिला इस इमारत में अंदर चारों ओर जालीदार बालकनी और बीच में आँगन की वजह से ऊपर से देखने पर गहरे कुएँ जैसा भास हो रहा था। एक उमराव परिवार का घर होने से यहाँ नौकरों के कमरे अलग, खेल के कमरे अलग, संगीत का कमरा अलग और हर एक कमरे की रचना भी अलग थी।

इन शहरों से भिन्न हैं वाराणसी के घाट। वाराणसी में अस्सी से अधिक घाट हैं और इनमें से ज़्यादातर घाटों के महल-क़िले सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के मराठा राज में बने हुए हैं। इससे पहले सोलहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट अकबर ने भी यहाँ शिव और विष्णु के मंदिर बनवाए थे। वाराणसी के स्थापत्य में मुग़ल, हिंदू और ब्रिटिश राज की वजह से इन सारी परंपराओं का विशिष्ट संयोजन है। रेतीले पत्थरों का बाँधकाम, बड़े और खुले हुए आँगन, जालीदार छज्जे, आकर्षक सीढ़ियों वाले महल, मंदिर और हवेलियों की वजह से ये घाट अप्रतिम लगते हैं।

यहाँ हर एक घाट के साथ एक अलग दंतकथा जुड़ी हुई है और हर एक घाट एक अलग मंदिर, महल या आश्रम के नाम से प्रचलित है। गंगा के किनारे पर ये घाट जैसे किसी लंबी, एकतरफ़ा गली की तरह हैं और चलते-चलते कब एक से दूसरे घाट में प्रवेश हो जाता है, ख़बर तक नहीं लगती। अब वैसे इन घाटों पर महल, मंदिर और आश्रम के साथ साथ नागरिक आवास की इमारतें और प्रवासियों के लिए बनाए जा रहे नए-नए होटलों की वजह से कुछ ऐसी भरमार हो गई है कि एक साथ कई सारे समयों का सहअस्तित्व यहाँ देखने को मिलता है। मंदिर की आरती और मस्जिद की अज़ान यहाँ एक दूसरे से अजनबी नहीं लगती।

गंगा घाट, वाराणसी

अस्सी घाट और एक घाट लस्सी का

स्थापत्य कितना भी सुंदर हो, इसे जीवंत बनाते है यहाँ रहते लोग। वाराणसी में मुझे सबसे ज़्यादा जीवंत लगी इन घाटों की लाल ईंटों से बनी लंबी, बड़ी दीवारें जिन पर तरह-तरह के विज्ञापन पढ़ने को मिले—गुप्ता कोचिंग क्लास से लेकर माधुरी सिलाई सर्विस तक।

घाटों की सीढ़ियों पर क्रिकेट खेल रहे बच्चे, अनजान लोगों के अनजान पूर्वजों के उद्धार की फिरकी में घूमते पंडे, दिन भर विदेशी प्रवासियों को गेंदे के फूल की मालाएँ बेचती एक अनाथ लड़की, घाट पर शास्त्रीय रागों का रियाज़ कर रहे कुछ गायक, दूसरी तरफ़ उसी घाट पर अपने कपड़े धो रहे कुछ लोग और इनसे थोड़े ही दूर गंगा के पवित्र पानी में माथा डुबो कर स्नान कर रही एक महिला जो इस पावन जल को अपनी हथेली में भरकर अंजलि देते हुए पी भी रही थी।
घाट पर पड़ी हुई नावों को देखकर श्रीकांत वर्मा की ‘बुखार में कविता’ की कुछ पंक्तियाँ याद आ गई :

नावें कई यात्रियों को
उतारकर
वेश्याओं की तरह
थकी पड़ी हैं घाट में।

मणिकर्णिका घाट पर थोड़े ऊपर एक विद्युत श्मशानगृह भी देखा, जहाँ ग़रीब या बिनवारिस लाशों को सस्ते में जलाया जा सकता है। कहते हैं कि काशी में मरने वालों को भगवान शिव ख़ुद उनके कानों में शिवतारक मंत्र सुनाते हैं। उम्मीद है कि भगवान शंकर, अग्नि के बजाय बिजली से सस्ते में जलाए जाने वालों के कान में भी वैसे ही मंत्र सुनाते होंगे।

गंगा के घाट से पुराने शहर को जोड़ती सँकरी सीढ़ियाँ जैसे जीवन और मृत्यु के बीच की भू-गर्भ सुरंग जैसी लग रही थीं। एक बार पुरानी गलियों में आ जाने पर जैसे कोई नई दुनिया शुरू हो जाती है। मशहूर बनारसी खान-पान की दुनिया जो मृत्यु की उदासीनता को क्षण में शिथिल कर देती है।

अपने घर के बाहर आलू के पापड़ सूखा रही गृहिणियों की रोज़मर्रा की बातें, साइकिल पर पान की टोकरियाँ ले जा रहा पानवाला, नुक्कड़ पर तली जा रहीं गरम कचौड़ियाँ, सिगड़ी पर भुना जा रहा बाटी-चोखा, किसी की रसोई में कलौंजी-सब्ज़ी का स्वाद, बड़ी-बड़ी कढ़ाई में उबाले जा रहे मीठे दूध की ख़ुशबू… बनारस स्वाद के सुख का शहर है। पालक चाट, टमाटर चाट, चूरा मटर, लईया-चना वग़ैरह यहाँ के मशहूर चाट और दूध की मिठाइयाँ रबड़ी, ठंडाई और लस्सी का तो क्या कहना! नब्बे सालों से अधिक पुरानी ब्लू लस्सी शॉप में सौ तरह की लस्सी मिलती है। अनार की लस्सी सचमुच मज़ेदार थी। यहाँ मक्खन मलाई भी काफ़ी लोकप्रिय है। पुरानी दिल्ली में सर्दियों में बनाई जाती दौलत की चाट की तरह दूध और केसर, इलायची से बनी यह मिठाई भी मिट्टी के कुल्हड़ में खाने का एक अलग ही मज़ा है। मंदिर में चढ़ाने के लिए दर्शनार्थी गुलाब की पंखुड़ी से सजाए हुए दूध के छोटे गिलास ख़रीद रहे थे और कई जगह मंदिरों में से बहते दूध की धार नज़र आ रही थी।

बनारस में सिर्फ़ गंगा ही नहीं, पुरानी गलियों में एक दूध की नदी भी बहती है!

वाराणसी बहुत व्यस्त शहर है। यहाँ अनेक तरह के गृह-उद्योग देखने को मिलते हैं। कच्छ छोड़ने के कितने सालों के बाद पहली बार मैंने यहाँ आटा पीसने की चक्की देखी! गेहूँ की गर्म सुगंध किसी भी महँगे से महँगे इत्र को मात दे सके वैसी थी और कितनी पोषक भी। यहाँ का और एक यादगार अनुभव था बनारसी साड़ी तैयार होते हुए देखना। हमारे होटल के बिल्कुल सामने ही दो पावरलूम थीं। इनके मुस्लिम मालिकों ने बहुत स्वागत से हमको अपना सब काम दिखाया। बनारसी साड़ियों के व्यवसाय में ज़्यादातर पावरलूम और हैंडलूम मुसलमान व्यापारी चलाते हैं। क़रीब पाँच लाख जितने मुसलमान बनारसी साड़ी या सिल्क बुनने, रँगने और बेचने के काम से आमदनी अर्जित करते हैं।

रंग-बिरंगे धागों के ढेर, मशीन की खटखट आवाज़ और तेज़ी से उभरती जा रही साड़ियों की डिज़ाइन देखना बहुत ही सम्मोहित करने वाला दृश्य था। काशी का संबंध मृत्यु, मोक्ष, वैराग्य जैसी बातों से है, लेकिन मुझे तो यह शहर अपने मोह-मोह के धागों से मोहपाश में ले रहा था। बहुत जीवंत है यह शहर और यहाँ की हर एक छोटी से छोटी प्रवृत्ति अपने आप में परिपूर्ण होती दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था कि बस जीवन ही निर्वाण है, यहाँ से आगे सब मिथ्या है।

दूध में केसर घोलकर मिलाना, पान पर कत्था रगड़ना, गंगा के पानी को छोटी-छोटी काँच की शीशी में भरकर बेचना… यह निर्वाह अगर निर्वाण नहीं तो और क्या है?

कहाँ जाते हैं सोने के लिए वियना के अश्व?

वियना के रास्तों पर चलते वक़्त प्राचीन इमारतों के बीच बग्गियों के घोड़ों की तबड़क-तबड़क चलने की आवाज़ बहुत कर्णप्रिय लग रही थी। शहर में कई जगह घास चरते घोड़े दिखे और शहर के बीच में ही एक बहुत बड़ा घुड़साल भी देखने को मिला। यहाँ के घोड़े काफ़ी स्वस्थ थे और बग्गियों की मालकिनें भी ख़ुश नज़र आ रही थीं। कई सारे काले, सफ़ेद और लाल घोड़े बहुत शांति से यहाँ जी रहे थे और इनके बीच एक सुंदर घोड़ी को देखकर मुझे जॉर्ज ऑरवेल की किताब ‘एनीमल फ़ार्म’ की मोली नाम की घोड़ी की याद आ गई जिसे चीनी बहुत पसंद थी और शक्कर के एक टुकड़े के लिए वह अपने साथी प्राणियों को भी धोखा दे सकती थी!

वियना के बाज़ार में सिगार, वूलन हैट, लेदर बैग जैसी कुछ क्लासिक चीज़ें बहुत अच्छी मिल रही थीं, लेकिन महँगी भी थीं। वियना केक-पेस्ट्री के लिए काफ़ी मशहूर है। वियना में हम ‘द ओरीजिनल साकरटोर्टे’ कैफ़े में गए। लाल रंग की सुंदर सजावट और ख़ास तो यहाँ की विश्वविख्यात केक की वजह से यह कैफ़े प्रवासियों में सर्वाधिक लोकप्रिय है।

साल 1832 में ऑस्ट्रियन फ़्रांज साकर ने प्रिंस वेन्ज़ेल वोन मेटरनीक के लिए साकरटोर्टे नाम से एक तरह की चॉकलेट केक यहाँ पहली बार बनाई थी। वियना में कैफ़े सेंट्रल भी विख्यात जगह है जो फ्रायड से लेकर स्टालिन, हिटलर वग़ैरह अनेक हस्तियों के लिए मिलन स्थान था।

यूरोप में और ख़ास करके पूर्व यूरोप में ठंड की वजह से कैफ़े कल्चर ज़्यादा प्रचलित है। बुडापेस्ट में हम ‘द न्यूयॉर्क कैफ़े’ गए और प्रवेश करते ही दंग रह गए कि यह कैफ़े है या कोई महल? अंदर की सजावट किसी यूरोपियन महल से कम नहीं थी—ऊँची छत पर बड़े शेंडेलियर और पूरी दीवारें विशाल चित्र और अन्य कलाकृतियों से सजी हुई थी। यह कैफ़े हंगेरियन इतिहास की भव्यता का प्रतीक है।

लंदन में इतिहास की जीवंत गवाही यहाँ के कुछ पुराने पब से मिलती है। ठंड से बचने लोग पब में शरण लेते हैं, इसलिए लंदन में पब कल्चर लोकप्रिय है। सर्दियों में यहाँ गरम मल्ड वाइन भी पसंद की जाती है। स्ट्रीट मार्केट में रास्ते पर खड़े होकर गरम मसालेवाली वाइन पीने का एक अलग ही मज़ा है और बड़े-बड़े पतीलों में दालचीनी, लौंग, दगद फूल और संतरे के टुकड़ों के साथ उबलती हुई वाइन की ख़ुशबू भी कितनी प्यारी होती है।

चार्ल्स डिकेन्स के डाइनिंग रूम में मनीषा जोषी

यात्राओं में छूटी हुई चीज़ें

लंदन में हम विक्टोरियन युग के विख्यात लेखक चार्ल्स डिकेन्स के हाउस म्यूज़ियम में गए। पाँच मंज़िले में फैला हुआ उनका घर अब मुलाक़ातियों के लिए खुला है। डिकेन्स खाने-खिलाने के बहुत शौक़ीन थे, इसलिए यहाँ कमरों की दीवारों पर उनके साहित्य के अलावा उनके भोजन-प्रेम के बारे में भी काफ़ी कुछ लिखा हुआ था। यहाँ नीचे एक कैफ़े भी है जहाँ ‘डिनर विथ डिकेन्स’ का आयोजन भी होता है, जिसमें डिकेन्स की प्रिय केक वग़ैरह खाना परोसा जाता है। चार्ल्स डिकेन्स को फ़ैशन और कपड़ों का भी काफ़ी शौक़ था। वह अपने ज़माने के फ़ैशनेबल विक्टोरियन डेंडीमैन माने जाते थे। इस घर में डिकेन्स के ड्रेसिंग रूम के पास वाले बाथरूम में जब मैं गई तब बाल ठीक करते वक़्त जल्दी में मैं अपनी कंघी वहीं भूल आई। बाद में जब ख़याल आया तब डेबोनियर डिकेन्स के बाथरूम में अपनी कंघी भूल आना मुझे काफ़ी रोमांटिक-सा लगा!

चीज़ें खोने का यह सिलसिला यहाँ पर ख़त्म नहीं हुआ। वियना में पता नहीं कहाँ, मेरी ऊन की टोपी खो गई और वहाँ ठंड इतनी ज़्यादा थी कि तुरंत ही रास्ते की एक दुकान से नई टोपी ख़रीदनी पड़ी। यात्रा में ऐसे ख़रीदी हुई नई चीज़ों के साथ उन पुरानी खोई हुई चीज़ों की यादें अपने आप जुड़ी रह जाती हैं। क्या इसे ही कहते हैं दो अलग जगहों का अनुसंधान?

अब मुझे लगता है कि अच्छा होता अगर वाराणसी में भी कोई चीज़ खो जाती! मगर वाराणसी में मैं कुछ नहीं भूली। कहा जाता है कि ताजमहल की तरह वाराणसी भी जो एक बार देखता है, उसका फिर से वहाँ जाने का होता है, क्या इसीलिए वाराणसी में पीछे कुछ नहीं छूटा? कितनी ऐसी जगहें हैं जो आपको फिर से बुलाना चाहती हैं?

डेन्यूब के तट पर जूतों की शृंखला

डेन्यूब के तल में है उदासी

‘डेन्यूब’ नाम से प्रकाशित क्लाडियो माग्रीस का यात्रा-वृत्तांत इतना सुंदर है कि इस नदी की भव्यता महसूस करने के लिए मैं लगभग बेताब-सी थी। वियना में डेन्यूब की उपस्थिति एक छोटी कनाल के रूप में ही है, इसलिए डेन्यूब को अपने संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखना तो सिर्फ़ बुडापेस्ट में ही शक्य है।

वियना से बुडापेस्ट की ट्रेन-यात्रा सिर्फ़ चार घंटे की थी, लेकिन काफ़ी यादगार रही। ट्रेन से बाहर जहाँ तक नज़र पहुँचे सिर्फ़ बर्फ़ ही बर्फ़ नज़र आ रही थी और बोरीस पास्तरनाक के उपन्यास ‘डॉक्टर ज़िवागो’ पर इसी नाम से बनी फ़िल्म में दिखाए गए रशिया की हिमाच्छादित ट्रेन-यात्रा के दृश्य मेरे मन में चल रहे थे।

हम बुडापेस्ट पहुँचे तब शाम ढल चुकी थी। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी कि डेन्यूब मेरे सामने धीरे-धीरे खुली। हमारा होटल डेन्यूब के किनारे पर ही था, लेकिन अँधेरे की वजह से नदी दिख नहीं रही थी, सिर्फ़ नदी का होना महसूस हो रहा था। होटल में सामान रखकर हम बाहर डिनर के लिए निकले तब ब्रीज पार करके सामने की तरफ़ जाना था। शहर की रोशनी में नदी का अँधेरा और रहस्यमय लग रहा था। दूसरे दिन सुबह जब डेन्यूब के तट पर पहुँचे, तब मन अकारण किसी प्रसन्नता से भर गया था। कितनी शांत और संतुलित लग रही थी डेन्यूब! हालाँकि कितना कुछ देखा है इस नदी ने!

डेन्यूब के तट पर जूतों की शृंखला इस बात की गवाही देने वाला स्मृति-शिल्प है। दूसरे विश्वयुद्ध के वक़्त ‘एरो क्रॉस टेरर’ के सैनिकों ने बड़ा क़त्लेआम किया था जिसमें पैंतीस सौ लोग मारे गए थे और इनमें से आठ सौ जितने यहूदी थे। इन यहूदियों को अपने जूते उतारकर डेन्यूब के तट पर इस तरह खड़े रहने को बोला गया था कि गोली लगने पर इनके शरीर सीधे नदी में ही गिरें। अब इस जगह पर जो शिल्प-स्मारक बनाया गया है उसमें साठ जोड़ी जूतों की प्रतिकृतियाँ रखी गई हैं जिनमें कुछ पुरुषों के, कुछ महिलाओं के और कुछ जूते बहुत छोटे बच्चों के भी हैं। कुछ जूतों में मुलाक़ातियों के रखे हुए फूल भी नज़र आ रहे थे। जूतों के आस-पास कोई सुरक्षा नहीं, इन जूतों को न छूने की सूचना भी लिखी हुई नहीं थी, लेकिन सब प्रवासी एक शिष्ट अंतर रखकर अपना आदर जता रहे थे। कुछ व्यवसायी तस्वीरकार ज़मीन पर लेटकर, बहुत क़रीब से जूतों का क्लोज़अप लेने की कोशिश कर रहे थे। ये जूते जिनके थे, वे अब कहाँ होंगे?

डेन्यूब के तल में कितना कुछ छिपा हुआ है, यह सोचकर मुझे कुछ घबराहट-सी होने लगी थी। यह तो सिर्फ़ एक कहानी है, यूरोप के इतिहास में घटी कई महत्त्व की यादें डेन्यूब से संलग्न हैं। डेन्यूब के किनारे बसे शहर बुडापेस्ट के बुडा कासल की ऊँचाई से शहर और नदी को देखते वक़्त यह एहसास होता है कि नदियाँ समय के समांतर नहीं पर समय से परे बहती हैं।

गुलाश सिर्फ़ एक स्ट्यू नहीं है

पेपरीका, पालीन्का और पोर्न आर्किटेक्चर का शहर बुडापेस्ट मुझे याद रहेगा यहाँ के बिस्त्रो में हंगेरियन क्राफ़्ट बीयर के साथ खाए बेहतरीन गुलाश के लिए भी। गुलाश सिर्फ़ एक गोश्त का सूप नहीं है, यह एक ऐसा ऐतिहासिक व्यंजन है जो यूरोप के इतिहास में, ख़ास तौर पर पूर्व यूरोप में, मनुष्य जीवन के अस्तित्व से संबंधित है। नौवीं सदी में हंगेरियन मालधारी अपने साथ सूखे गोश्त के टुकड़े रखकर चल निकलते थे और रास्ते में इसे पानी के साथ उबालकर खा लेते थे। हंगेरियन भाषा में गुल्या का मतलब है पशुओं का झुंड और गुल्यास मतलब पशुपालन करता चरवाहा या काऊबॉय।

शीतयुद्ध के समय में हंगरी का साम्यवाद भी ‘गुलाश कम्युनिज्म’ के नाम से पहचाना जाता था। जैसे गुलाश काफ़ी अलग-अलग गोश्त और सब्जियों के साथ बनाया जा सकता है, वैसे ही हंगरी का समाजवाद भी सम्मिश्रित विचारधाराओं से बना था। मार्क्स और लेनिन की विचारधारा का चुस्त पालन करने के बजाय हंगरी ने देश के नागरिकों की उन्नति के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता के साथ अपनी अलग आर्थिक सुधार नीति अपनाई थी। हंगेरियन समाज में गुलाश को ग़रीब हों या अमीर, सब पसंद करते हैं और ख़ुशी की दावत में भी गुलाश का स्थान अहम रहता है। अब तो दुनिया भर में गुलाश बनाने के कई नए तरीक़े हैं, लेकिन बुडापेस्ट में काफ़ी ऑथेंटिक गुलाश खाने को मिलता है।

मुझे किसी भी शहर की फूड मार्केट से मुलाक़ात कर लेना अच्छा लगता है। कुछ साल पहले मैंने बार्सिलोना की ‘मर्काडो ला बुकेरिया’ मार्केट से मुलाक़ात की थी। वह एक यादगार अनुभव था। ला बुकेरिया दुनिया की श्रेष्ठ तीन मार्केट में से एक है। फूड मार्केट मुझे जीवंत संग्रहालय सरीखी लगती हैं। बुडापेस्ट के ‘ग्रेट मार्केट हॉल’ बाज़ार में कई तरह की मिर्च और पेपरीका का संग्रह देखकर मैं ख़ुश हो उठी। हंगेरियन लोग मुझे अचानक से ज़्यादा प्यारे लगने लगे, क्योंकि मुझे तीखा खाना बहुत पसंद है। यहाँ के फूड हॉल में गुलाश, लौगाश, स्टफ्ड केबेज वग़ैरह कई तरह के हंगेरियन व्यंजन थे और रसोई की किताबें भी बिक रही थीं। भेंट देने के लिए पोस्टर, मैग्नेट, हंगेरियन गुड़िया, साबुन, कप, पेपरीका, सलामी, परंपरागत हंगेरियन कपड़े वग़ैरह कई सारी सुंदर चीज़ें यहाँ से ख़रीदी जा सकती हैं।

जैसे वियना में कई जगह पर शनाप्स के किओस्क हैं और लोग ठंड से बचने के लिए शनाप्स के छोटे शॉट पीते हुए नज़र आते हैं, वैसे बुडापेस्ट में पालीन्का प्रिय है। पालीन्का फलों से बनाई जाने वाली फ्रूट ब्रान्डी है और इसमें चेरी, एप्रीकोट आदि फ़्लेवर मिलते हैं; लेकिन यह पीने में बहुत सख़्त है। इसमें अल्कोहल की मात्रा चालीस प्रतिशत से भी ज़्यादा है, इसलिए ठंड तो पालीन्का को दूर से देखने से ही उड़ जाती है।

है ही नहीं, ‘द ग्रांड बुडापेस्ट होटल’

बुडापेस्ट एक ऐसा शहर है जो एक जीता-जागता शहर होने के बावजूद ‘द ग्रांड बुडापेस्ट होटल’ फ़िल्म की तरह ही सब कुछ काल्पनिक होने का एहसास करा सके। सबसे अजीब तो यह है कि बुडापेस्ट के नाम से मशहूर हुई वेस एंडरसन की इस फ़िल्म का फ़िल्मांकन बुडापेस्ट में नहीं जर्मनी के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में हुआ है। इस फ़िल्म में जो ‘द ग्रांड बुडापेस्ट होटल’ है, वह होटल काल्पनिक है, फ़िल्म में ‘बॉय विथ एपल’ नाम से जो पेंटिंग है वह भी काल्पनिक है, अख़बार काल्पनिक हैं और जो सुंदर ट्रिपल लेवल केक है वह भी काल्पनिक है।

हमने फ़ैसला किया कि ‘द ग्रांड बुडापेस्ट होटल’ फ़िल्म की कल्पना जिन तीन होटलों पर आधारित है, हम उनमें से एक बुडापेस्ट की ‘ग्रांड होटल गेलर्ट’ में ठहरेंगे। डेन्यूब के किनारे इस भव्य होटल गेलर्ट को देखते ही ऐसा लगा कि यह पूरी दुनिया ही काल्पनिक है!

गेलर्ट होटल अब अंदर से थोड़ा पुराना हो रहा है, लेकिन बाहर से अभी तक यह इतना भव्य लगता है कि अंदाज़ लगाया जा सकता है कि जब यह बना होगा उस वक़्त इसका क्या रुतबा रहा होगा! थर्मल बाथ और स्पा के लिए भी यह होटल गेलर्ट काफ़ी मशहूर है। इस होटल में प्रवेश करते ही कोने में एक छोटा बार है, जहाँ बुडापेस्ट के कुछ बहुत ही सुंदर पोस्टर लगे हुए हैं। इस छोटे बार में एक हंगेरियन आदमी से बातें करते हुए हम रात में काफ़ी देर बैठे रहे। वह बार-बार कहता रहा कि वह बुडापेस्ट छोड़कर कहीं नहीं जाएगा, क्योंकि यह बहुत सुंदर और बहुत सस्ता शहर है।

अगले दिन सुबह जब हम होटल ख़ाली करके जा रहे थे, तब लगा कि अंत में यह पूरी यात्रा ही एक आभास बनकर रह जाएगी—‘द ग्रांड बुडापेस्ट होटल’ की तरह ही।

कभी जब मेरी स्मृति न रहेगी तब क्या मैं रहूँगी डेन्यूब की स्मृति में? क्या स्मृति भी सिर्फ़ आभास नहीं है?

अनैतिक होती हैं यात्राएँ

Travel is immoral, since it is supposed to be the annulment of space within space.

— Otto Weininger

क्लाडियो माग्रीस ने अपने महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत ‘डेन्यूब’ में ऑस्ट्रियन दार्शनिक वीनर के ऊपर प्रस्तुत उद्धरण का ज़िक्र किया है। ‘यात्राएँ अनैतिक होती हैं’, इस विधान से मैं तुरंत सहमत हो गई, पर इसके तर्क पर जितना सोचती हूँ, बात उतनी ही जटिल लगती है। यात्राएँ अनैतिक हैं, क्योंकि इसमें एक स्थान में से दूसरे स्थान का निषेध है। हम एक समयांतर को हमारे अंदर लिए हुए एक दूसरे समयांतर में प्रवेश करते हैं, क्या यही है अनैतिकता?

वीनर कहते हैं :

Time is yet superior to space.

समय अगर अंतरिक्ष से सर्वोपरि है तो एक समय की स्मृति का दूसरे स्थान से जुड़ना अनैतिकता है?

The river has no Allness. वीनर का यह विधान भी रसप्रद है। नदी को अगर समग्रता में नहीं देख सकते तो नदी की सुंदरता भी अनंतता में ही देखनी होगी?

जर्मन कवि-दार्शनिक फ़्रेडेरिक होल्डरलिन डेन्यूब नदी पर लिखी अपनी कविता ‘द इस्टर’ में कहते हैं :

This river is called the Ister. It lives in beauty.

क्या सुंदरता में रहना, समय के एक खंड में रहने से मुक्ति है? सुंदरता क्या समय से भी शाश्वत है? जो निरंतर है वह नदी है, तो क्या यह सुंदरता ही है जो अविनाशी है?

इन सब सवालों की तह तक पहुँचना शायद अभी मेरे लिए बाक़ी है… फ़िलहाल तो मैं सिर्फ़ एक अनैतिक प्रवासी हूँ।

मनीषा जोषी गुजराती कवयित्री हैं। ‘सदानीरा’ के 20वें अंक में एकाग्र स्तंभ के अंतर्गत उनसे एक बातचीत, उनकी कविताएँ और एक यात्रा-आलेख प्रकाशित हो चुका है। वह यात्रा-आलेख मनीषा ने ‘सदानीरा’ के आग्रह पर हिंदी में लिखा था और वह हिंदी में लिखने की उनकी पहली कोशिश थी। यहाँ प्रस्तुत यात्रा-आलेख इस सिलसिले में उनकी दूसरी कोशिश है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 23वें अंक में पूर्व-प्रकाशित है। मनीषा कैलिफोर्निया में रहती हैं। उनसे manisha71@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति में प्रयुक्त तस्वीरें लेखिका के ही सौजन्य से।

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