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मृत्युंजय

मृत्युंजय

फिर वही खोज

एक

रात यों बेतरह गाढ़ी हुई जाती
शून्य में सब खींचा जाता ज्यों
एक काली बहुत गहरी वेगवती भँवर लहराती
खींच लेती तर्क सब विश्वास कोने में दबी उम्मीद आस्था
चक्कर खा रही है सृष्टि इतनी तेज़
किसी की जगह कोई तय नहीं

नोच ले सारे मुखौटे काव्य-भाषा के
कुशल जर्राह कोई छील दे परतें
उभर आए जो सलोना मुख कँटीला
बात जिसकी बेध दे फिर टीस उट्ठे
तलातल सब उलट जाए पलट जाए
खोजता हूँ वह कि जो खो गया मुझसे
विकल्पों की बाढ़ में

कहाँ हैं दोस्त साथी कॉमरेड सब
जिनकी गोद में सिर रख बिलख लूँ
बहस कर लूँ प्यार के दो लफ़्ज़ कह सुन लूँ
किसी नादान ज़िद पर लड़ूँ दिन भर
फोड़ दूँ व्यक्तित्व की गगरी
अहं को गढ़ूँ पीटूँ रद्द कर दूँ फिर सने लोई
दहकते तंदूर में सिंक कर पके लोई

कहाँ है पाँव के छाले ज़ुबानों से कटे टुकड़े
विचारों की कहानी इश्क़ की नीली फ़िज़ाओं में
छुपा दी क्या, गँवा दी क्या
किसी के हाथ गिरवी या कि रख दी
लूटकर या ले गया कोई
और टुकड़े दे गया है कटे दृश्यों के
जिनके आइनों में सब अधूरा दीखता है

अपने पर भरोसा!
हाय! क्या सोचा अचानक
किस अतल से ख़याल जागा
याद की ख़ुशनुमा गलियों से उमड़कर कौन जागा
कौन मैं है यह जिसे पहचानना मुझ के लिए मुश्किल
कोई भूली हुई पुरखिन अनत यायावर कोई
कोई जो हवा में फ़सलें उगाता गीत गाता
इश्क़ की धुन में रमा बंशी बजाता
लड़ा करता साँस लेने-सा समूहों से समूहों में
याकि यह विभ्रम जिसे पोसा किया
कोई नॉस्टेल्जिया-सा स्वप्न सुंदर नहीं जिसका अर्थ
हक़ीक़त से छुटी बेमूल
आकाश मँडराती कथा कोई

चमचमाती लचकती आई
थाम लेने हाथ झूठी-सी कहानी यह
बुनी किसने कही किसने सुनी किसने
सभ्यता की नाव जर्जर बैठ तन्हा
सच कहूँ तो झूठ इसका जानकर भी
ग़र्क़ इसमें डूबता उतरा रहा हूँ
नशे-सी तासीर

किंवा चक्र है यह
मध्य मन ने मध्य रस्ते मध्य माया
अजब है चक्र जिसका अंत और आरंभ
कोई नहीं अनवरत घूमता है निकल पाना
कठिन बेहद हुआ जाता
बुने निज के जाल से
जंजाल से मधुकर बहुत सुन

दो

किसी आदत मुताबिक़
गुलामी की पसंदीदा पहन बेड़ी
चलता चला जाता हूँ न जाने कहाँ
स्वार्थ सुविधा शांति का बुनते हुए स्वेटर
जिसके सभी फंदे उलट कर फँस गए

और बाहर धुंध भारी धुंध
ठंडक हड्डियों में गड़ रही है
आँखें खुली पूरी दीखता फिर भी नहीं कुछ
अकेलापन बहुत गड़ता हवा के संग
कानों में अनवरत बज रहा कुछ सीटियों-सा
लौ बरफ़-सी जम गई

घूमते हैं आत्मा के चोर डाका डालते हैं
बहुत ही क़ाबिल नई दुनिया सजाते
चमचमाते देवता
अनवरत रास रस की धार बतकुच्चन
गति ही गति, अनवरत उपभोग
अनगिन राह अनगिन चाह अनगिन लोभ
अनगिन लाभ में दुबका पड़ा, ठिठका
कँपकँपाता चाह के जबड़े फँसा मन
सोचता है कुछ नहीं बस देखता है

सभी संवेदनों को कुंद करता
घना कुहरा किंतु पाँवों ने अभी मानी नहीं है हार
घिसटते से चले ही जा रहे हैं कहाँ जाने
रास्ता है या कि पगडंडी
या कि खाई है कँटीले झाड़ हैं
या कहीं जलते अलावों की
धधकती आँच की संभावना भी है

तीन

खटकती हैं कुंडियाँ
पर सुनूँ कैसे
बज रही साँकल मगर जाने कहाँ
आभास होता आ रही है भीतरी आवाज़
मद्धिम-सी कहीं
पर सुनूँ कैसे कान ग़ायब
रास्ते की गंध शायद-सी चिलकती है
उस पर चलूँ कैसे पाँव ग़ायब
दृश्य इतने हैं कि परतों पर परत पर परत
बहुत सी फ़्रीक्वेंसियाँ हैं
कौन जाने कहाँ से किस स्वर कहेगा क्या

कहा लेकिन जा रहा है बहुत कुछ
सुना लेकिन जा रहा है बहुत कुछ
बहुत कुछ से बहुत कुछ हैं दृश्य
स्वाद उतने हैं यहाँ पर दृश्य जितने
इतनी परत इतनी सतह इतनी लहर इतनी धार
इतनी मृत्यु इतनी घृणा इतनी ललक इतना प्यार

इसी से खोजता हूँ दोस्त साथी कॉमरेड
छान कर कुछ देख सुन चख लूँ समझ लूँ
सोच लूँ फिर बोल पाऊँ जुड़ सकूँ उस एक सच से
रास्ता जिसका कथाओं की
लचीली लंतरानी से गुज़रता है


मृत्युंजय (जन्म : 1981) सुपरिचित कवि-आलोचक और अनुवादक हैं। उनकी कविताओं की किताब ‘स्याह हाशिए’ शीर्षक से और आलोचना की एक किताब ‘हिंदी आलोचना में कैनन-निर्माण की प्रक्रिया’ शीर्षक से प्रकाशित है। उन्होंने ‘संदेश रासक’ पर नए सिरे से काम किया है और कर रहे हैं। उनसे mrityubodh@gmail.com पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. प्रतीक ओझा मई 4, 2024 at 6:12 पूर्वाह्न

    इस कविता में बेचैनियत की लय है। दृश्यों, घटनाओं में एक बेतरतीब कथात्मकता का आभास है। ये कभी कभी मोक्तिबोधिय लयात्मकता सी बेचैनी और छटपटाहट देती हैं पर उनमें कवि के अनुभव जगत का हिस्सा अपना अलग ही अहसास लेकर आता है।
    अपनी संस्तरीयता में इतनी स्पष्ट की बार बार पढ़ा जाए।
    मृत्युंजय जी की कविताओं का मेरा यह पहला पाठ है जो बेचैनियत की अनुभूति जो उन खटकती कुंडियों की तरह है जिसे सुना जाना बाकी है, जिसे बार बार सुनना है क्योंकि बहुत कुछ कहा जा रहा, बहुत से दृश्य आदि से भरा है। इसलिए उन पर कुछ तो कहना बनता ही था। सदानीरा का शुक्रिया इतनी खूबसूरत कविता को सामने लाने के लिए🌻

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  2. महेश वर्मा मई 4, 2024 at 3:30 अपराह्न

    बहुत अच्छी कविता है। काश मृत्युंजय से इसका पाठ सामने सुना जाता। आंतरिक छंद को साधकर इतना लयपूर्ण लिखना मृत्युंजय के लिए ही सम्भव है।इन भीतरी बेचैनियों को लम्बी कविता में ढालना आसान नहीं था। बहुत बधाई और शुक्रिया।

    Reply

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