कविताएँ ::
सत्यम तिवारी

साही का ओझल घुड़सवार
एक
जहाँ तक रौशनी मालूम होती है
जानने के लिए वे बहुत नज़दीक गए
और एक दुनिया बसा दी अनजाने ही
फिर उन्होंने एक-एक और तमाम करके दुनियाएँ बसाईं
लेकिन इससे भी उन्हें दुनिया-भर भी
समझ हासिल नहीं हुई
दूभर हो सकते थे स्वप्न सुंदरता के
जगराते में फ़ौरन आ धमक सकती थी नींद
दुनिया हो सकती थी
मसीहाई की आवश्यकता के साथ-असाथ
ख़तरे की रहज़नी हो सकती थी
दुर्घटना का पूर्वाभास
जबकि महाद्वीप अलग होना चाहते थे
उन्हें अपने घर का पता महफ़ूज़ रखना था
जन्म लेते ही उनके पास अंध महासागर में
छलाँग लगाने का विकल्प बाक़ी रह गया था
और जब सभी बालू में अपने अंडे छुपाने में मशग़ूल थे
तब दिखे उन्हें घुड़सवार
क्षिति पर जल पर पावक गगन पर
ज़मीन से नहीं लग रहे थे उनके पाँव
उनके पास नहीं था
हवाओं से बात करने का वक़्त
युद्ध नहीं था यह
किसी पहल की ज़रूरत नहीं थी
वे तरफ़दारों की तरह आए
और घुड़सवारों की तरह दाख़िल हुए
उनका दावा था कि उन्होंने
घटती हुई दुनिया देखी है
और बढ़ती हुई नफ़रत
मरती हुई करुणा देखी है
और लुटती हुई इज़्ज़त
उन्होंने अपने बच्चों की क़समें खाईं
कि जिस्म का व्यापार उन्होंने कब का छोड़ दिया
वे अगर बेचना चाहते तो
बेच सकते थे पूरा का पूरा मुल्क
और अगर उन्होंने सिर्फ़ अपना ईमान बेचा
तो इसे उनकी मेहरबानी ही समझा जाए
हम अभी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते थे
कि कितना और क्या कुछ उनके बस में था!
उन्होंने हमें बंधनमुक्त किया
और कहा—
‘‘भागो’’
यह निशाने को तेज़ करने का समय था
वे तब दिखे जब मुल्क को
तरफ़दारों से निबटने के लिए
घुड़सवारों की ज़रूरत थी
घुड़सवारों की तरफ़दारी करते
कुछ इस तरह वे दाख़िल हुए
हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में
दो
किस-किस के आने का इंतज़ार
घुड़सवार आ तो रहा है
लेकिन वह है कौन?
दूत है वह कि मसीहा?
पुत्र है धरती का कि आक्रमणकारी?
संदेश लाता है वह किसका?
पताका यह किसकी लहराती है?
अगर वह मसीहा हुआ
तो उसकी मसीहाई पर मूता जाए
उसके सार्वजनिक कार्य-क्षेत्र को
सुलभ शौचालय से अधिक न समझा जाए
हमें उसका इंतिज़ार नहीं था
वे हम नहीं थे जो अविश्वास से
दोहरे हुए जाते थे
हमने पूछा घुड़सवारों से
क्या जीने तक मरने पर एतिबार
करता है परमात्मा?
घुड़सवार हमसे पूछा किए
क्या मरने तक भटकने का इंतिज़ार
करती है कहो आत्मा?
मौत कुत्ते की हो या कायर की
वह ढूँढ़ रहा है एक चमकदार वाक्य
जो उसका नहीं तो
जगमगा दे भाग सभी हरकारों का
कहाँ जाकर साँस लेगा उसका प्रलाप
पानी भरती है जिनके यहाँ जिजीविषा
संताप जिन्हें भाता नहीं
नहीं देखती राह जिनकी मुमुक्षा
अगर वह संदेश लाया
तो उसका भेस नहीं पूछा जाए
रहे सलामत
उसका सिर
उसके हाथ
उसका मंगल
उसके शुक्र
उसका घाट
उसकी टोह
उसका मोह
उसकी बाट
एक विषधर के मुँह से
उसका मुँह सटा हुआ है
और घर उसका मृतकों के
टीले से लगा हुआ है
एक पतिता सबके प्राण हर नहीं सकती
तम की तमतमाई तंद्रा
उसे नहीं कर सकती कातर
आलोक के अतिरेक से
वह सकपका गया है
और मौका देखकर ही घबरा गया है
लौटकर जब नहीं जाता संदेशवाहक
तब भी निस्संदेह जाता ही है एक संदेश
वह सीज़ सीज़ चिल्लाता सीज़र हुआ
या शोक शोक रिरियाता अशोक
ऐसी स्थितियाँ उसे बारहा मिलती रही हैं
जिनका सिर्फ़ सोग किया जा सकता था
ऐसे कृत्यों की सूची काफ़ी लंबी है
जिनके उत्तरार्ध में
ग्लानि, पीड़ा और पश्चाताप लिखा था
इसकी पूर्वसूचना थी उसे
फिर भी शोक, शोक, शोक
अशोक, शोक करने को ही जन्मा
आप सोचते होंगे कि लोगों ने
उसकी ग़लतियों से सबक़ लिया
और ऐसे पापों की पुनरावृत्ति
फिर कभी नहीं हुई
लेकिन यह इतिहास है
जो ख़ुद को दुहराता है
सबसे पहले त्रासदी
और फिर कॉमेडी की तरह
और दुहराता ही जाता है
कॉमेडी को त्रासदी
त्रासदी को कॉमेडी की तरह
तीन
रहबरी का सवाल
घुड़सवार सबसे पहले फुट सोल्जर है
और बाद में घोड़ा
पहले घोड़ा दिखाता है रास्ता सवार को
दूर दुनिया में कहीं कछुआ रेंगता है
पहले घोड़ा लाँघता है अतीत
क्षितिज पर वर्तमान की
सड़क पर आ धमकता है घुड़सवार
उनकी भी जिनका कोई भविष्य नहीं
गए देर रात गए लगता है
घुड़सवार है नरभक्षी कीट
या पीपल से लिपटी अमरबेल कोई
ढूँढ़ नहीं पाती ऐसी रातों में मृत्यु
उस पार घात लगाए बैठी है उसकी याद
इस पार तस्वीरों से निकल आता है घुड़सवार
आख़िर कौन सी दुनिया है वह
जहाँ पर लौट जाता है
वापस लौटा घुड़सवार
चाहे जैसे याद रखा जाए उसे
घुड़सवार बिना किसी चिंता के
करता है घुड़सवार का सिर क़लम
जब दासता ही लिखी है विरासत में
विरासत में जब है ही लिखी दासता
वे हम नहीं थे जो पूछा किए
तन के आतंक से पछताते हुए
कि क्या हुआ उस मसीहा का?
और लौटता था हमारा विश्वास
मात खाते हुए
जहाँ आनंद कम नहीं था
जीवन कम था
वहाँ क्या फ़र्क़ पड़ता है कि
घोड़ा हिनहिनाए हर चाबुक पर
या जनता पूछे असली सवाल
कि कहाँ गया वह घुड़सवार
जो न मसीहा था
न आक्रमणकारी
जो न किसी धरती का पुत्र था
न किसी संदेश का वाहक
कथा के किस मोड़ पर
घुड़सवार निम्नलिखित में बदल गया
यह ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है
शायद जब उसके होंठ खुले थे
वह दूत था
शायद जब गर्दन खुली थी
भविष्यवाणी
शायद जब उसने घोषणा की
अब भुगतने का समय बीत चुका है
और भुगतान का समय आ गया है
वह मसीहा हुआ
जब सभी युद्धों को
ख़त्म करने वाला युद्ध लड़ा जा रहा था
हमलावर ही बचा रहा
जब घुड़सवार मारा गया
दस बूचड़ख़ाने के बराबर थी एक तेलचक्की
एक शराबख़ाना था दस तेल मिल के बराबर
दस शराबख़ाने मिलते थे
तो बनता था एक वेश्यालय
अहो भाग! एक राजा
एक राजा में था दस वेश्यालयों का प्रताप
एक राजा के सामने कम पड़ते थे
एक लाख बूचड़ख़ाने (महाभारत)
मैंने देख लिया घुड़सवार का असली चेहरा
वे क्या मुझे इसकी सज़ा देंगे
वह घुड़सवार न था तीतर था
आगे से पीछे से अगल से बग़ल से
घुड़सवार में से घुड़सवार घटाओ
तो घुड़सवार ही बचता था
घुड़सवार में जोड़ो घुड़सवार
तो भी बनता था घुड़सवार ही
तब से या शायद तीन हज़ार वर्षों से
जियनी-मरनी या शायद उससे भी बुरी
यदा-कदा या फिर सदा-सदा से
घुड़सवार आ तो रहा है
लेकिन वह है कौन?
संदेश लाता है वह किसका?
पताका ये किसकी लहराती है?
क्यों नहीं बिक रहा है जेएनयू में अचार
यहाँ प्रस्तुत घटना का जीवित और मृत दोनों ही तरह के व्यक्ति, वस्तु, घटना और स्थान से भरा-पूरा संबंध है। किसी भी तरह की समानता के लिए लेखक स्वयं ज़िम्मेदार है।
हरिदास चक्रवर्ती की चाय नहीं बिक रही
सिंह चाभी वाले की चाभी
अचारवाले का नहीं बिक रहा अचार
दिन की तीन चाय पीकर सोचता है
जो वह नहीं जन्मता
सन् उन्नीस सौ सत्तासी
दिसंबर की पहली तारीख़ को
शीशे पर नाम लिखने जितनी सर्दी में
तो वर्षा नहीं होती झमाझम
बिना घुने भुनता गेहूँ
लक्ष्मण मरते हाय-हाय करते
चाय-चाय करते मरता चक्रवर्ती हरिदास
बीतते हैं इसी तरह
उस देश में
दिन-दशक
सोम रस में
अमंगल में मंगल
भाटा में बुद्ध
ज्वार में भी
गुरु मद्धिम-मद्धिम
चरैवेति-चरैवेति
चरती हैं भेड़ें
अँधिया नक्षत्र में
भेंटाता है शुक्र
शुक्र है!
अगर नहीं खाता
शनिवार की खिचड़ी शनि से बचते
याद करते खिचड़ी के चार यार
चटनी-चोखा-पापड़-अचार
तो कैसे चलता भई!
अपना नाम तो बता दे
मोहम्मद अशरफ़
हाँ, मोहम्मद अशरफ़ तेरा व्यापार
और जब रवि के कोप से बचते
जो शनि के मुक़ाबले
साढ़े सात गुना है
उसे नहीं बुलाता
पुराने आलू का तंदूरी पराठा
जहाँ अचार नहीं देते
चावल-दाल के साथ
पराठे पर कम पड़ गया तो
चटनी में ज़रूरत पड़ सकती है
आदि गंभीर विषयों के बीच
जब दुकानदार कहता है कि कमाल है
यहाँ घोड़े को जलेबी खिलाने ले जाने का
इश्तिहार चिपका है
और आपको पाद की जगह
स्वाद की पड़ी है
तो फिर नहीं गुम जाती
बीच रास्ते में उसकी चाभी
जो क़िस्मत से क़िस्मत नहीं
कमरे का ही दरवाज़ा खोलती है
लाइब्रेरी के समीप लगी
कच्चे काँसे की प्रतिमा
जिसके काँधे पर चिड़िया
जिसके हाथ में किताब
जिसके चेहरे पर विजय राज की
आवाज़ में
कउवा हगा
पार्थसारथी की चट्टानों को
जो समझता है पारसनाथ
और ख़ुद को सूली चढ़ने से पहले का
जीसस क्राइस्ट
जीसस क्राइस्ट!
करता है रहस्योद्घाटन
जेएनयू में तो भटकने लायक़ जंगल भी नहीं है
भटकने लायक़ आसमान ही कहाँ है हिंदुस्तान में
भूलने लायक़ बात का चेहरा
भूलने में असुविधा होती है
चाभियाँ बनाने वाला जितेंदर सिंह
यह क्यों नहीं बताता कि
दिल चकनाचूर होकर
रोशनदान नहीं हो जाता
और आयु के बहत्तरवें बरस में
वह चौबीस इंचिया साइकिल को
फेफड़े से खींचता हुआ
क्यों इकट्ठा कर रहा है
हार्ट के ऑपरेशन-वास्ते रुपैया
जिससे गाँव-देहात के बच्चे
क़ैंचियाँ चलाना सीखते हैं
क्या वह नहीं जानता कि
ऐसा करना गोइठा में घीऊ सोधाना है
जैसा उसकी बीमा-कंपनी
घर-परिवार से लेकर
शुभचिंतक सरकार तक कह रही है
दुनिया फिर भी
आश्चर्यजनक तरीक़ों से काम करती है
जिसे पास का नहीं दिखता
उसे दूर का दीख जाता है
पर इसकी शिकायत करने की बजाय
उन्हें लगभग सम्मान के साथ
पास बुलाकर स्पष्ट करता
कि सुनाई नहीं दे रही उनकी भविष्यवाणी
कि दिखाई नहीं दे रहा उनका भैंसा
अरे प्रभु! ज़रा नज़दीक आइए
वह भूल गया था यह दिल्ली है
दिल्ली कि जो निगलते न बने
और उगलना तो उसका नामुमकिन था ही
भाग निकलना न निगलने का विकल्प न था
न उगलने का उफनते जाना
यहाँ जो देश की जय करते थे
वही देशवासियों की क्षय करते थे
यह दिल्ली के लिए
दिल में जगह बनाने या
मौक़ा मर्जेंसी में काम आने से
ज़्यादा आसान काम था
एक संगठन लिखता था
शिक्षा जीवन के लिए
दूसरा बे-पूछताछ उस जीवन को
वतन के नाम कर देता था
जैसे वह जीवन न था
अतिक्रमण था
सरकारी ज़मीन पर
या थी बेनामी संपत्ति
बुलडोज़र था
वह देखता था
ऊबड़-खाबड़ रास्ते
वह पाता था जात कर रखी
अपनी ज़ुबान
धारा से ऐसे ही नहीं कटा वह
कटी नहीं जीभ उसकी ऐसे ही
महीनवारी स्टेशन जाना ही है
इन दिनों उसका मोक्ष
और प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे अजनबियों में से ही
निकलकर आएगा कोई परमहंस
और छिड़ेगा यहीं पर
यहीं रह जाने की
विवशता पर विमर्श
कि आख़िर में वह उसे
कन्विन्स करके ही मानेगा
कि घर न जाने में ही उसकी भलाई है
दिल्ली ही सबका आशियाना है
और रुसवाई कहाँ नहीं है
जैसे शांति के इस अनिकेत में
रूठी रुतों के दूतावास में
जिसे ताजमहल समझा जा रहा है
है वह भी कुतुब मीनार ही
जगह, जहाँ हर दूसरे दिन
तीसरा फ़्रंट खड़ा हो जाता है
संस्था, जहाँ शिक्षक कक्षाओं से अधिक
परिचर्चा पर मिलते हैं
जहाँ माफ़ कीजिए लेकिन कोई परिसंपत्ति नहीं लुटती
और परि से सिर्फ़ परिवार नहीं बनता एकमात्र शब्द
परिभाषित भी होती है जहाँ
कथा इस मैं की जो वह नहीं है
कथा, जिसमें छात्र प्रशासन से अधिक
छात्रों से लड़ते हैं
और पेरियार जहाँ चीख़-चीख़कर
जय श्री राम कहते हैं
कथा, जिसमें सर्द होती है
तो पूरी दिल्ली को ज़ुकाम आ जाता है
और बुद्ध जहाँ फँस जाते हैं ट्रैफ़िक जाम में
तो नक्सलबाड़ी फूलपुर अलीगढ़ से
बचकर निकलना पड़ता है
जगह, जहाँ ऐसा उदाहरण बनाया जाता है
कि वह दूसरों के लिए उदाहरण न बन पाए
और होने को अगर हो भी जाए
कोई अपराध उसके हाथ
तो दुर्घटना का कोई कारण दैवीय न रह पाए
वहाँ क्यों नहीं बिक रही है
हरिदास चक्रवर्ती की चाय
सिंह चाभी वाले की चाभी और
अचारवाले का आख़िर
क्यों नहीं बिक रहा है अचार!
सत्यम तिवारी की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। वह इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. कर रहे हैं। उनसे satyamtiwariau2020@gmail.com पर संवाद संभव है।