पॉल बी प्रेसियादो के उद्धरण ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : प्रत्यूष पुष्कर

पॉल बी प्रेसियादो │ तस्वीर सौजन्य : ica.art

‘टेस्टो जंकी’—यह किताब कोई संस्मरण नहीं है। यह एक टेस्टोस्टेरोन आधारित, स्वेच्छा से स्वयं को नशे में धकेलने का एक प्रोटोकॉल है जिसका देह से संबंध है और जो बीपी (बायो पॉलिटिक्स) को प्रभावित करता है—एक देह-निबंध—वास्तव में एक परिकल्पना। जब चीज़ों को उनके चरम की ओर धकेल दिया जाता है, वैसे में एक समकालीन राजनीतिक कथा, स्वयं का एक सिद्धांत या आत्म-सिद्धांत।

मैं जेंडर की कला-प्रवीणता की माँग करती हूँ, सबके लिए अपना, और अपने-अपने डोज़, प्रत्येक संदर्भ के लिए एक सटीक आवश्यकता। यहाँ कोई मानक नहीं है, केवल व्यवहार्य दैत्यताओं की विविधताएँ हैं। मैं वैसे ही टेस्टोस्टेरोन लेती हूँ, जैसे वाल्टर बेंजामिन हशीश लेता था।

मैं ख़ुद को नहीं पहचान पाती। जब मैं टेस्टोस्टेरोन पर हूँ : तब तो नहीं ही, जब नहीं हूँ : तब भी नहीं। यह आधारभूत है कि कोई ख़ुद को न पहचान सके। अ-पहचान और अ-निर्णय की यही स्थिति राजनीति को यथार्थ को बदल देने वाले अवसर में तब्दील कर देती है।

मैं प्रतिनिधित्व के ख़िलाफ़ किसी सीधी कार्रवाई के लिए हामी नहीं भर रही, बल्कि अ-पहचान के माइक्रो-पॉलिटिक्स के बारे में कह रही हूँ, एक ऐसा अनुप्रयोग जिसके प्रतिनिधित्व में यह विश्वास न हो कि यह बाह्यता कोई सत्य या सुख लाएगी।

मुझे अब केवल आपको, आप सभी को यह समझाने की आवश्यकता है कि आप मेरे जैसे हैं, और इसके विपरीत नहीं। मैं यह दावा नहीं करने जा रही हूँ कि मैं आप जैसी हूँ, आपके बराबर हूँ, न ही आपसे यह माँग कर रही हूँ कि आप मुझे अपनी विधियों में भाग लेने की अनुमति दें, या अपनी सामाजिक नॉर्मलिटी में मुझे एडमिट करें। मेरी महत्वाकांक्षा आपको यह समझाने के लिए है कि आप मेरे जैसे हैं।

आप—आप भी—वह राक्षस हो जो टेस्टोस्टेरोन मुझमें जगा रहा है।

मेरी भावनाओं में मेरी उतनी रुचि नहीं है जितनी उनके ‘मेरे’ होने में है, विशिष्टता से उनके मुझसे संबद्ध होने में। मैं उनके वैयक्तिक पहलुओं में रुचि नहीं लेती, केवल इसमें कि कैसे वह जो मेरा नहीं है, उसके पार भी है। हमारे ग्रह के इतिहास से जो निर्गत है, जीवित प्रजातियों का क्रमागत विकास, अर्थशास्त्र का फ्लक्स, तकनीकी नवाचारों के अवशेष, युद्ध की तैयारियाँ, आर्गेनिक स्लेव्स और कमोडिटी की तस्करी, दंड और दमन के संस्थान, हायरार्की के निर्माण, संचार और सर्विलेंस के नेटवर्क, मार्किट अनुसंधान समूहों की रैंडम ओवरलैपिंग, विचारों की तकनीक और गुट, भावनाओं का जैव-रासायनिक परिवर्तन, पोर्नोग्राफी का उत्पादन और वितरण। कुछ इसे आणविक स्तर पर जेंडर (लिंग) के जैव-आतंकवाद के मैन्युअल के रूप में भी पढ़ सकेंगे…

महीनों से मैं अपना समय ऐसा कुछ आयोजित करने में लगा रही हूँ, जो मुझे कोई आसन्न पैनसेक्सुअल क्रांति-सा लगता है : सेक्सुअल पहचान का बिखरकर इच्छाओं, अभ्यासों, सौंदर्यबोध का बहुलता में आगमन, नई आणविक संवेदनाओं का आविष्कार, सामुदायिक रूप से जीने के नए प्रारूप… और यह सब कुछ संभव भी लगता है, वास्तविक और अपरिहार्य भी, एक ही समय में।

तुम्हारी मृत्यु से कुछेक महीने पहले, डेल, मेरा मास्टर जेंडर हैकर मुझे पच्चास मिलीग्राम टेस्टोस्टेरोन के जेलरूपी तीस पैकेट से भरा एक बक्सा देता है। मैं उन पैकेटों को न जाने कबसे एक शीशे के बॉक्स में रखती हूँ, मानो जैसे वे विच्छेदित इजिप्शियन गुबरैले हो, किसी लाश से निकाली ज़हर लगी गोलियाँ, किसी अज्ञात प्रजाति के भ्रूण, या वैम्पायर के दाँत जो केवल आपके उन्हें देखने मात्र से उड़कर आपकी ठोंठ (टेटुआ) से चिपक जाएँ। इस बीच मैंने अपना समय अपने ‘ट्रांस’ मित्रों के संग बिताया। उनमे से कुछ हॉरमोंस ले रहे हैं—लिंग-परिवर्तन के प्रोटोकॉल को विधिवत् मानते हुए, और कुछ बेहूदगी कर रहे हैं, सेल्फ़ मेडिकेशन, बिना अपना लिंग क़ानूनी तौर-तरीक़ों से बदलने की कोशिश भी किए, बिना किसी मनोचिकित्सक को देखे। वह ख़ुद को जेंडर से खिन्न भी नहीं मानते और ख़ुद को ‘जेंडर-लूटेरे’ या ‘जेंडर हैकर’ बुलाते हैं। मैं भी इसी दूसरे ग्रुप का हिस्सा हूँ। हम वे मुफ़्तख़ोर उपभोक्ता हैं जो मानते हैं कि सेक्स-हॉर्मोन मुफ़्त होने चाहिए, इन पर सरकार का नियंत्रण या फॉर्मास्यूटिकल कंपनियों का क़ब्ज़ा नहीं होना चाहिए।

मेरा चेहरा सारहीन है, मेरे नाम का कोई महत्त्व नहीं। केवल मेरी देह और सत्व के बीच एक कठोर रिश्ता है जो एक पंथ का मज़मून है—निगरानी की कोई चीज़।

मैं किसी से संवाद नहीं करती, केवल लिखती हूँ। जैसे लिखना इस पूरी प्रक्रिया का इकलौता गवाह हो। बाक़ी सभी मुझे धोखा दे देंगे। मुझे मालूम है कि इसके लिए वे मुझे जज करेंगे। कुछ इसीलिए क्योंकि मैं मर्दों के बीच मर्द बन जाऊँगी और एक लड़की के हिसाब से मैं ठीक ही व्यापन कर रही थी, बाक़ी इसीलिए क्योंकि मैंने टेस्टोस्टेरोन मेडिकल प्रोटोकॉल से बाहर जाकर लिया, बिना मर्द बनने की चाहत लिए, क्योंकि मैंने इसे हार्ड ड्रग की तरह लिया, किसी भी हार्ड ड्रग के जैसे।

मैं एक छोटे से स्पैनिश शहर में डिक्टेटरशिप के दौरान पैदा हुई थी, जिसकी बागडोर कैथोलिक-फ्रांको समर्थकों के हाथ थी। मुझे ‘फ़ीमेल’ जेंडर असाइन किया गया, स्पैनिश को मेरी मातृभाषा बनाया गया, मुझे एक परफ़ेक्ट छोटी-सी लड़की की तरह पाला-पोसा गया, मुझे लैटिन में महँगी शिक्षा और प्राइवेट लेसन दिए गए। जूडिथ बटलर के शब्दों में, ये उन ‘आदर्शों की बलत्कृत पुनरावृत्ति हैं’ जिन्होंने मुझे आकार दिया।

सबसे शुरुआती सिडक्शन/मोह चित्त के दैहिक तल में रोपे हुए एक काँटे-सा है, जिसके आस-पास कर्त्ता किसी निष्ठुरता की तरह विकसित होता रहता है।

चीज़ें ऐसी ही प्रतीत होती हैं, और उनका सामना करना ज़रूरी है : अगर मैं ख़ुद को ट्रांस-सेक्सुअल न मानूँ या डिस्फ़ोरिक न मानूँ, फिर भी मुझे मानना होगा कि मैं टेस्टोस्टेरोन की आदी हूँ।

जैसे-जैसे यह शरीर उन प्रथाओं का त्याग करता जाता है जो समाज के द्वारा मर्दाना या स्त्रैण मानी जाती है, वह धीरे-धीरे पैथोलॉजी की तरफ घिसटता चला जाता है।

जेंडर पहचान, या आनंद संज्ञा के दायरे से बाहर हैं।

लिंग-परिवर्तन के मेडिकल और लीगल मानकों से दूर होते ही किसी का रिश्ता टेस्टोस्टेरोन के साथ बदल जाता है। मेडिकल प्रोटोकॉल में लिंग-परिवर्तन एक अद्वितीय निर्णय है, केवल एक और एक बार चुना हुआ। लेकिन चीज़ें उससे ज़्यादा जटिल हैं। मैं अपना लिंग नहीं परिवर्तित करना चाहती, और मैं ख़ुद को ‘डिस्फ़ोरिक’ भी नहीं घोषित करती, चाहे वह किसी के बारे में हो, मैं नहीं चाहती कि कोई डॉक्टर यह निर्धारित करे कि हर महीने मुझे अपनी आवाज़ बदलने और दाढ़ी उगाने के लिए कितना टेस्टोस्टेरोन चाहिए होगा : मैं नहीं चाहती कि मेरे स्तन और ओवरी का निराकरण हो—चाहे मैं प्रजनन करना चाहूँ या नहीं, मैं नहीं चाहती कि सरकार मेरे प्रजनन-जनक कोशिकाओं को हाईजैक कर ले, मेरी युटेरस किसी मेडिकल-इंडस्ट्रियल दड़बे द्वारा ज़ब्त कर ली जाए। मेरे भीतर हो रहे परिवर्तनों की कोई पूर्वनिश्चित दिशा नहीं है जो किसी टेस्टोस्टेरोन से ट्रिगर होती हो। मुझे जितना पता है, टेस्टोस्टेरोन से पहले, मेरी आवाज़ एक औरत की आवाज़ नहीं थी, मेरा चिकना चेहरा एक औरत का चेहरा नहीं था और मेरी क्लाइटोरिस, दो इंच नाप वाली, एक औरत के अंग नहीं थे।

मैं कैसे बताऊँ कि मेरे साथ क्या हो रहा है? मैं अपने ट्रांसफ़ॉर्मेशन की इच्छा के बारे में क्या दलीलें दूँ? मैं उन सभी सालों का क्या करूँ, जब मैंने ख़ुद को केवल एक फ़ेमिनिस्ट कहकर परिभाषित किया? यह आज मैं किस तरह की फ़ेमिनिस्ट हूँ : एक फ़ेमिनिस्ट जो टेस्टोस्टेरोन की आदी हैं या कोई ट्रांसजेंडर देह जो फ़ेमिनिज्म की? मेरे पास अपने क्लासिक्स के पुनर्पठन के सिवाय कोई विकल्प नहीं है, उन सभी विमर्शों पर प्रश्न खड़ा करने के जिन्होंने मुझे इस शॉक की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया, और इस प्रैक्टिस में मुझे ले आए।

यह मानना कि ये जो परिवर्तन मेरे भीतर हो रहे हैं, यह एक सदी का मेटामॉरफोसिस है।

प्रश्न : अगर आप किसी दार्शनिक पर एक डॉक्यूमेंट्री देख सकते—हाइडेगर, कांट या हेगेल पर—आप उसमें क्या देखना चाहेंगे?

देरिदा का उत्तर : उनको अपनी सेक्स लाइफ़ के बारे में संवाद करते हुए… आपको स्फूर्त जवाब चाहिए? उनकी सेक्स लाइफ़।

मैं ख़ुद को किसी मर्द में तब्दील करने के लिए टेस्टोस्टेरोन नहीं ले रही, न ट्रांस यौनिकता के किसी दैहिक कपट के मारे। मैं इसे लेती हूँ ताकि वह जो मुझे समाज बनाना चाहता था, उसे परास्त कर, लिख सकूँ…

प्रकृति में कुछ भी खोजने के लिए नहीं हैं—कोई छुपा हुआ रहस्य नहीं। हम एक तुच्छ अति-आधुनिकता में जी रहे हैं : यह अब प्रकृति में छुपे हुए सत्य की खोज के बारे में है ही नहीं; यह सांस्कृतिक, राजनैतिक और तकनीकी विधियों को निर्दिष्ट करने की आवश्यकता के बारे में है; जिसके माध्यम से देह पुरावशेष-सी प्राकृतिक हैसियत हासिल मात्र कर सके।

धूप में रखी प्लास्टिक की गुड़िया की बू आती है मुझसे, गिलास की तलहटी में छूटी हुई सेब की शराब। यह मेरी देह है जो अणुओं से प्रतिक्रिया कर रही है। टेस्टोस्टेरोन का कोई रंग या स्वाद नहीं होता… यह कोई सुराग़ नहीं छोड़ता। इसके अणु चमड़ी में ऐसे घुलते जाते हैं, मानो किसी दीवार से कोई भूत जा रहा हो। बिना चेतावनी दिए आया हुआ, बिना निशान छोड़े छेदता हुआ।

देह का कोई भी संरचनात्मक सत्य नहीं है जो सांस्कृतिक और राजनीतिक अभ्यासों की विवश पुनरावृत्ति से मुक्त हो, जो हमें पुरुष या स्त्री बनाने की ओर ले जाता है।

हेट्रोसेक्सुअलिटी या विषमलिंगी कामुकता को एक राजनीति सहाय प्रजनन तकनीक के रूप में समझना चाहिए : स्त्रीत्व—प्रकृति होने से कोसों दूर—कामोन्माद की गुणवत्ता है; जब इसे एक तिजारत में बदल दिया जाए, काम में बदल दिया जाए—आर्थिक विनिमय की वस्तु में।

अभी तक किसी को तुम्हारी मृत्यु के बारे में पता नहीं था। तुम दो दिन उसी स्थिति में सड़ते रहे जिसमें तुम गिरे थे। कोई तुम्हें तंग करने नहीं आया। उन्होंने तुम्हें तुम्हारी देह के साथ छोड़ दिया, ‘यह समय’ जो ज़रूरी होता है—उन सभी कष्टों को शालीनता से जाने देने के लिए।

एक दिन जब मैं दस की थी, किसी ने मेरे घर कॉल की और मेरी माँ से कहा, “तुम्हारी बेटी डाइक (लेस्बियन/समलैंगिक) है…” और कॉल काट दी। बस उसी समय से मेरी माँ मेरी नोटबुक पढने लगी, मेरी पॉकेट खंगालने लगी, मेरी वॉलेट का चप्पा-चप्पा छानने लगी—यह निश्चित करने के लिए कि मैं कुछ ‘विचित्र’ तो नहीं छुपा रही हूँ। वह एक प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर में तब्दील कर दी गई—एक विषमलिंगी पितृसत्तात्मक रेजीम के द्वारा नियुक्त—मेरी नौसिखिया गतिविधियों को आतंक से, सर्विलेंस से, होम इंस्पेक्शंस, इन्टेरोगेशन, अंतर्विरोध, डिटेंशन और सेंसरशिप से अपंग करने के लिए। ये वे गूढ़ तरीक़े हैं जिन्हें सिस्टम एक साधारण गृहिणी के हाथों सौंपकर मेरी लड़की देह में जो भी मस्कुलिन इच्छाएँ हों उन्हें मार देने के लिए इस्तेमाल करता आ रहा है—फ्रांको के बाद के स्पेन से लेकर अब तक।

केवल तुम ही हो जो इस किताब को पढ़ सकते हो। इस कैमरे के सामने, “पहली बार मैं तुम्हारा कोई सेल्फ़-पोट्रेट बनाना चाहती हूँ।’’ अपनी एक ऐसी आकृति बनाना चाहती हूँ जिसमें मैं तुम होऊँ। तुमसे ड्रैग में सहवास का। क्रॉस-ड्रेस कर तुममें उतर जाने का। तुम्हें इसी दृश्य के साथ जीवन में वापस लाने का।

मेरे केश लंबे हैं। मैंने अपने माथे का ज़्यादातर हिस्सा एक काली विंटर हैट से छिपा रखा है—मानो अपने विचारों को बिखरने से—किसी बाहरी द्वारा जानने से बचा लेने के लिए। मैं बेतरतीब हूँ, लेकिन मर्दानी हूँ। यह मुझे साहस देता है।

मैं बारी-बारी से ख़ुद को एक शिश्न के साथ और बिना इमेजिन करती हूँ, और ये दोनों कल्पनाएँ एक दूसरे के साथ सी-सॉ का खेल खेलती हैं। लेकिन मुझे पता है कि जब मैं नग्न होऊँगी तो उसे केवल एक ही शरीर दिखेगा। एक निश्चित छवि की अधीनता मुझे डरा देती है।

हमने कैसे शासन का भरोसा कर लिया जब इच्छाओं, सेक्सुअल फंतासियों और मूर्तन के दैहिक बोध की बात आई तो?! क्या मैं एक देह मात्र हूँ? या कोई ऐसा कहे कि मैं तंत्र में एक देह मात्र हूँ? अगर मैं टेस्टोस्टेरोन की ख़ुराक को सेल्फ़-एडमिनिस्टर करूँ और अपने चेहरे पर रोएँ उगने का रिस्क उठाऊँ, अपनी क्लाइटोरिस का आकार बढ़ने का, अपनी आवाज़ भारी हो जाने का, बिना ख़ुद को राजनीतिक और सामाजिक रूप से एक मर्द चिह्नित करते हुए तो मैं निश्चित रूप से पागल क़रार दी जाती हूँ।

सभी मोर्चों पर, सभी अंतरालों में—मेरी देह : अनेकता की देह है।

हेट्रोसेक्सुअलिटी के बारे में मुझे हमेशा महसूस हुआ कि जैसे मैं किसी वाचाल सांकेतिक ढोंगी की उपस्थिति में हूँ, जैव-राजनैतिक पैतृक अवशेष जिसकी उपस्थिति वह स्थान ढाँकती है जहाँ वस्तुत: कामनाओं का आविर्भाव है।

प्रेम में होना : देरिदा कहते हैं कि एक विशेष स्थलाकृति में होने जैसा है—अनासक्ति से, अवसाद से उठकर अस्तित्व, देह, शहर, ग्रह, एवोल्युशन और प्रजाति की एक विशेष सतह पर आ जाने जैसा।

समस्या यह है कि वासना, आनंद, सेक्स और जेंडर को अब तक अहस्तांतरणीय सारांश या निजी संपत्ति माना जाता रहा है। सबसे पहले प्रकृति में उपस्थित एक हठी सत्व-सा, फिर ईश्वर की संपत्ति-सा, तंत्र की संपत्ति-सा, फिर निजी संपत्ति-सा, फिर अंतत: आज फार्मा और पोर्नोग्राफिक मल्टी-नेशनल्स की संपत्ति जैसा।

मेरी चमड़ी के नीचे स्त्रीत्व का सांस्कृतिक कार्यक्रम जग रहा है : मेरी देह प्रशिक्षित है—एक औरत के प्रभावों को व्युत्पन्न करने के लिए, एक औरत की तरह पीड़ा से गुज़रने के लिए, एक औरत की तरह प्रेम करने के लिए। टेस्टोस्टेरोन इस संवेदी निस्पंदन को नहीं बदल सकता।

पिछले कुछ सालों में ‘क्वियर’ को प्रचलित विमर्शों के द्वारा री-कोड किया गया है। आज हम इस रिस्क में हैं कि यह शब्द एक नव-उदारवादी, मुक्त-बाज़ारू पहचान न बन जाए जो नित नए अपवादों का सृजन करे और ट्रांस-सेक्सुअल, ट्रांस-जेंडर, अपंग या नस्लीकृत देहों की प्रताड़नाओं को छिपा ले।

न्यूरोबायोलॉजी के अनुसार, चेतना के चार चरण है : लुसिडिटी, ऑबन्युबिलेशन, सोमनोलेंस और कोमा। लुसिड स्टेट में सब्जेक्ट/कर्त्ता स्वयं और अपने वातावरण के साथ पूर्णत: उपस्थित होता है। अबन्यूमिलेशन में सब्जेक्ट की आँखें खुली होती हैं, लेकिन वह स्वयं और वातावरण के प्रति उदासीन होता है—स्थान और समय को लेकर भ्रांति में। सोम्नोलेंट सब्जेक्ट की आँखें बंद होती हैं, लेकिन सीधे स्पर्श या उकसाव की प्रतिक्रिया देते हैं। कोमा में सब्जेक्ट न ही स्पष्ट या अस्पष्ट स्पर्श की प्रतिक्रिया देता है, लेकिन संभव है कि वह स्वयं में उपस्थित हो।

आज एक प्रजाति के तौर पर हमारे लिए हमारी उपस्थिति ‘प्रोस्थेटिको-कोमाटोज़’ तौर पर बताई जा सकती है। हमनें अपनी आँखें बंद कर ली हैं और टेक्नोलॉजिकल तथा राजनैतिक प्रत्यारोपण के माध्यम—जिन्हें हम जीवन, संस्कृति, सभ्यता पुकारते हैं—से देखते हैं। हालाँकि इन्हीं जैव-तकनीकी उपकरणों के सामरिक पुनर्विनियोजन से प्रतिरोध की उत्पत्ति और क्रांति का रिस्क संभव है।

एक पुरुष की तरह कपड़े पहनना ज़रूरी नहीं है। कोई भी अपने निजी जगहों पर ऐसा कर सकता/सकती है, लेकिन जेंडर के सभी आयामों की एकपक्षता और कृत्रिमता के एक सामूहिक अनुभव की ज़रूरत है।

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पॉल बी प्रेसियादो (जन्म : 1970, बर्गोस, स्पेन) एक लेखक, दार्शनिक, क्यूरेटर और जेंडर तथा सेक्सुअल पॉलिटिक्स के सबसे अग्रणीय चिंतकों में से एक हैं। न्यूयॉर्क के न्यू स्कूल फ़ॉर सोशल रिसर्च में परास्नातक के दौरान ही पॉल को ज़ाक देरिदा और एग्नेस हेलर से पढ़ने का मौक़ा मिला और जल्द ही उनसे प्रभावित होकर 1999 में देरिदा ने उन्हें पेरिस में एक सेमिनार में अध्यापन के लिए बुलाया, जहाँ उनसे क्षमा और लिंग-परिवर्तन के इस उपहार के बारे में बात करने को कहा जिनके माध्यम से उनका जीवन परिवर्तित होता रहा। ‘टेस्टो जंकी’ नाम की इस किताब जिसके अंश यहाँ उद्धृत हैं, के प्रथम फ़्रेंच संस्करण के आस-पास पॉल स्वयं को हिज़ और हर दोनों सर्वनामों से संबोधित मानते थे और अपने पहले नाम बिएट्रिज़ से जाने जाते थे। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के क्वियर अंक में पूर्व-प्रकाशित। प्रत्यूष पुष्कर से परिचय के लिए यहाँ देखें : क्या सघनता सच में एक समस्या है

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