रहिए अब ऐसी जगह चलकर

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व्यंग्य ::
प्रचण्ड प्रवीर

‘आशा जावार माझे’ (2014) का एक दृश्य

रहिए अब ऐसी जगह चलकर

कल की बात है। जैसे ही मैंने मेट्रो से बाहर क़दम रखा कि मेहमान का फ़ोन आ गया। पहला सवाल–“कहाँ हो?” मेट्रो में हूँ अब कहा जाए। “किस मेट्रो में हो? दरअसल, जानना यह है कि अभी दुपहर के बाद फ़ुरसत में हो या नहीं?” अब मेहमान की बात कैसे टाली जा सकती है? फ़ुरसत नहीं भी हो तो फ़ुरसत निकालनी पड़ेगी, वरना मेहमान फिर घर पर मेहमान होकर हमें हमेशा की तरह ताने देंगे कि हम यदा-कदा ही दिल्ली आते हैं, यदा-कदा ही तुम्हें अतिथि-सत्कार के पुण्य उठाने का अवसर देते हैं, लेकिन फिर भी तुम सुधरते नहीं हो। हमारी अनदेखी करते हो। यह सब उनसे कौन सुनेगा। हमने कहा कि आपकी सेवा में उपस्थित हैं।

मेहमान बोले, “हमने तय किया कि अब जब भी दिल्ली आना होगा, तुम्हारे दड़बे में नहीं रुका जाएगा। एक तो तुम चिंदीचोर हो, रहने की तमीज़ नहीं है और दूसरे कि अपना भी कुछ क्लास है। इस समस्या के हल में हम लगे हुए हैं। तुम्हारा सहयोग चाहते हैं।“

“किस तरह?” हमने बेचारगी से पूछा। “हम नोएडा में फ़्लैट देखने आ रहे हैं। तुम जहाँ हो, वहीं रुक जाओ। अपने संपादक-कवि-दोस्त आदि जिससे भी मिलना है, बाद में मिल लेना। हमारे साथ दो-तीन जगह घर देखने चलो। पसंद आ गया तो ख़रीद लिया जाएगा। और सुनो, तुम चाहो तुम भी अपना दड़बा छोड़कर हमारे नोएडा के फ़्लैट के स्टडी रूम में रह सकते हो। ये लोकेशन मेट्रो स्टेशन के पास ही बता रहा है।“

मेहमान की दरियादिली तो मशहूर है ही और हम तो अक्सर उनके मँगाए चाट-पकौड़े का ज़ायक़ा उठाते ही रहते हैं। सोचा कि अब उनके साथ घर देख आते हैं और साथ में कहीं कुछ खा-पी भी लेंगे। यही सोचकर हमने दुपहर का भोजन नहीं किया और संपादक मित्र को कह दिया कि आज किन्हीं कारणों से आपके दर्शन नहीं कर पाऊँगा, जिसका मुझे बहुत खेद है। अब अगले शनिवार का मौक़ा देखेंगे। क़रीब एक घंटे के इंतज़ार के बाद मेहमान पधारे। उन्होंने इसमें दिल्ली मेट्रो का दोष बताया कि पचास किलोमीटर की दूरी को साठ मिनट में तय करना पिछड़ापन है। शंघाई में मेट्रो पचास किलोमीटर आठ मिनट में तय कर लेती है। लेकिन मातृभूमि के प्रेम के कारण उनको यहाँ रहना पड़ रहा है और इसलिए आदतन कभी-कभी आकलन में फ़लती हो जाती है। हम सोच रहे थे कि इतनी देर में कुछ खा लेते तो ठीक रहता, लेकिन दस मिनट और कहते-कहते इतना समय लग गया। ख़ैर, मेहमान के साथ हम भी मेट्रो के नीचे खड़े थे कि उधर से प्रॉपर्टी डीलर हमें लेने आने वाला था।

लेकिन यह क्या? डीलर साहेब की गाड़ी का टायर पंक्चर हो गया। ओहो! अब दूसरी गाड़ी भेजी जा रही है। अहा! लेकिन मेट्रो से यदि बहुत नज़दीक है प्रॉपर्टी लोकेशन पर तो हम लोग ऑटो रिक्शा करके भी पहुँच सकते हैं। अरे, तुम रहोगे चिंदीचोर के चिंदीचोर! लेनी है लाखों की प्रॉपर्टी और जाओगे ऑटो में! धत्त! सही बात है, लेकिन दस मिनट हो गए! अमित बाबू, कहाँ रह गए? हलो, सिग्नल नहीं आ रहा है। अरे, आप समझिए हमारे साथ एक बड़े साहब भी हैं, हम अगर प्रॉपर्टी ले लिए तो वो समझो उससे बड़ा प्रॉपर्टी ले लेंगे। लेकिन आप इस तरह धूप में खड़ा करवाइएगा तो हम वापस चले जाएँगे। सुनिए, सुनिए आप, शंघाई में ऐसे घर नहीं दिखाया जाता है। कहाँ हैं? अरे, अरे, आप तो सड़क के उस पार खड़े गुहार लगा रहे हैं? सुनो जी, यह लोग तो बड़ा ही बदतमीज़ निकला, तुमसे भी ज़्यादा। जी मेहमान, चलिए अब गाड़ी में सड़क पार करके।

जब हम दोनों डीलर साहेब के नुमायंदे की गाड़ी में बैठे तब हमने पहली चीज़ नोट यह की, ड्राइविंग सीट पर जो तीस साल का आदमी है उस पर बीस साल होने का भूत पिछले दस साल से नहीं उतरा था और इसी कारण उसने बदन से कुछ इस तरह चिपका शर्ट-पैंट पहना था कि मानो मोटे-ताज़े शरीर पर मोटे कपड़े से जो लैमिनेशन किया गया है कि वह कहीं-कहीं से उखड़ रहा है। उसने कहना शुरू किया, “मैं भी कभी दिल्ली में रहता था। पच्चीस साल मैंने गुज़ारे वहाँ पर। अब देखिए चार सालों से नोएडा आ गया हूँ। क्या नहीं है इधर, सोसाइटी में स्विमिंग पूल है, जिम है, योगा है, बार है, क्लब है। ये जो लोकेशन है न यह बहुत शानदार लोकेशन है। यहाँ से पूरब में जो पंद्रह किलोमीटर जो दूर जगह है वह बस पंद्रह किलोमीटर है। उत्तर में जो बीस किलोमीटर दूर जो जगह है, वह बीस किलोमीटर ही दूर है। लखनऊ जाना हो, या आगरा जाना हो तो एक्सप्रेस-वे यहाँ से बारह किलोमीटर ही है। हर कुछ कितना पास है। मेट्रो स्टेशन से केवल सत्रह किलोमीटर दूर ही यह प्रॉपर्टी है। मैं कहता हूँ सर कि इससे शानदार कुछ हो ही नहीं सकता।“

मेरे लिए नज़दीक का मतलब था कि जहाँ पैदल जाया जा सके। बिना गाड़ी के कौन सत्रह किलोमीटर की दूरी तय करेगा। अगर यह कह देता कि मैं गाड़ीहीन, धनहीन, साधारण मनुष्य हूँ तो मेहमान की बात झूठ हो जाती। मेरे चुप रहने के कारण जो मुझे मान-सम्मान से देख जा रहा है वह पक्का ग़ायब हो जाता। बियाबान में चौड़ी सड़क पर फ़र्राटे से दौड़ती गाड़ी से जब हम वहाँ पहुँचे तो मैंने देखा कि अठारह टावर में से केवल दो टावर ही तैयार थे। बाक़ियों में काम चल रहा था। गाड़ी के रुकते ही पाँच-दस आवारानुमा लड़के लैमिनेटेड शर्ट और जींस में बेईमानों वाली हँसी लिए बैठे थे, जिसका मतलब था कि एक और उल्लू फाँस लाया गया है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर राज चलाने के लिए वहाँ के देसी ब्रितानी छोरों को भर्ती किया था, तो निश्चय ही इस बिल्डर की तरह ही शील शून्य, नीति शून्य, गरिमा शून्य कर्मचारियों को चुनना उनकी मजबूरी होगी। तीन एजेंट एक-दूसरे को आँख मारते, बेहूदों की तरह आपस में हँसते हमसे बोले, “प्रॉपर्टी तो आप देख लेना, पहले दफ़्तर में बैठकर ‘प्रॉपर टी’ ले लीजिए।“

मैं सुन रहा था कि दो टॉवर तैयार हैं। एक में केवल नीचे का फ़्लोर मिलेगा। एक में केवल ऊपर का यानी चौबीसवीं मंज़िल का, क्योंकि बाक़ी सारे बुक हो चुके हैं। दो बेडरूम हाल और किचन वाले फ्लैट का दाम अभी तय कर लेंगे। लेकिन आपको अगर कुछ पाँचवें या छठे फ्लोर तक ही चाहिए, फिर आपको निर्माणाधीन फ़्लैट ही देखना पड़ेगा। प्रॉपर टी पीने के बाद मेहमान ने हमारी तरफ़ दिखाकर कहा, “इनको अगर कुछ पसंद आया तो बात है। यह तो सीधे तीन बेडरूम वाली पार्टी हैं।” हमने भी शान में कहा, “पहले बताइए कि आपके इस बिल्डिंग में कुछ ख़ास है भी या नहीं? अभी तो बन ही रहा है, दो साल तो बनने में ही लगेंगे। हमें कुछ ऐसा चाहिए था कि बस गृह-प्रवेश हो जाए।” तीनों एजेंट हमारी तरफ़ मुख़ातिब हुए। “सर, यह फ़रवरी तक चालू हो जाएगा।”

“मुझे तो यक़ीन नहीं आता।” मेरे ऐसा कहने पर वे तीनों जोश में आ गए। कहने लगे, “आप चलिए और देख लीजिए।” मेहमान और हम निर्माणाधीन इमारत की ओर बढ़े। एक ने कहा, “बाहर से रँगाई-पुताई का काम ही बाक़ी है। बाक़ी सब हो गया है।” दूसरे ने कहा, “सर, सोसाइटी में रहने का फ़ायदा है कि यहाँ कंपनियों के चेयरमैन रहते हैं। आपके बच्चे बड़े लोग के बच्चों के साथ बड़े होंगे। ग़रीबी की मनहूसियत का साया नहीं होगा।” तीसरे ने कहा, “सर, नज़ारा देखिए। कितना हरा-हरा है। सामने जो ज़मीन है, वह कृषि के लिए है, इसलिए कभी वहाँ कुछ नहीं बनेगा। दिल्ली में हर जगह आदमी ही आदमी। यहाँ दूर-दूर तक खुला-खुला है।” फ़्लैट बड़ा सुंदर ढंग से डिज़ाइन किया हुआ था। महँगे फ़र्नीचर, सोफ़े, वॉन गॉग की बनाई पेंटिंग की प्रतियाँ दीवाल पर टँगी थीं। “इन दीवालों पर ड्रिल नहीं हो सकता। काँटियाँ नहीं ठुक सकतीं।” मैं सुन रहा था। “देखिए सर, हर रूम के साथ वाश-रूम मिला हुआ है और बैठक और स्टडी-रूम के साथ भी। आप देखिए न, हर वाश-रूम में दो दरवाज़े हैं। यह हमारी डिज़ाइन की मौलिकता है। किसी को जल्दी में जाना हो तो स्टडी रूम से भी जा सकता है, या बेडरूम से भी।”

“लेकिन कोई अंदर हो तो उसे बाहर दो तरफ़ से तंग किया सकता है।” मैंने पूछा। “सर, क्या बात कर रहे हैं। जो अंदर रहेगा, वह दोनों दरवाज़े बंद करके बैठेगा।” उनमें से जो सबसे क़ाबिल एजेंट था, उसने कहा, “अव्वल बात यह है कि यहाँ रहने वाले अधिकतर अकेले-दुकेले ही रहते हैं। सारा समय तो दफ़्तर में रहते हैं, घर तो बस सोने के लिए हैं।” यह कहकर वह हँसने लगा। मेहमान ने कहा, “आप दाम बहुत ज़्यादा बता रहे हैं। इस दाम में ग़ाज़ियाबाद में बंगला मिल जाएगा।” यह सुनते ही वह उखड़ गया। “मैंने आपको दो हफ़्ते से यह प्रपोजल दे रखा है। आप कुछ तय करके ही तो आए होंगे?”

“सब्ज़ी नहीं ख़रीद रहे हैं।” मैंने तल्ख़ होकर कहा, तो एजेंट की पारखी आँखों ने पहचान लिया कि हम फटे जूते पहनने वालों में से एक हैं। उसने कड़क होकर कहा, “यह दाम भी बस दशहरा के लिए ही है। दशहरा के बाद यह रेट नहीं मिलने वाला।” मेहमान उसकी बात सुनकर कुछ नाराज़ से हुए पर नाराज़गी तो शंघाई में भी झलकने नहीं देते। उन्होंने कहा, “एक और जगह प्रॉपर्टी देखने जाना है, अभी वहाँ देखकर तय करूँगा।” होशियार एजेंट ने कहा, “सर, आप मुझे बता देना कि आप कहाँ से ले रहे हैं। मैं आपकी मदद कर दूँगा। अगर प्रॉपर्टी बहुत अच्छी रही तो बोलूँगा कि सर आप बस ले लीजिए। लेकिन अगर प्रॉपर्टी में लकड़ी हुई, लोचा हुआ तो आपको आगाह कर दूँगा। बस इतना ही मेरा रोज़ का काम है।

उन लोग से विदा लेने के बाद टैक्सी में बैठकर मेहमान बोले, “इतनी दूर कौन आकर रहेगा। यहाँ आस-पास कुछ खाने-पीने की दुकान भी नहीं है। बस ठेले पर छोले-कुलचे मिल रहे हैं। ऐसी जगह रहने से तो अच्छा मैं संन्यासी बन जाऊँ।” मैंने कहा, “सर, अगली विजयादशमी तक बंगला देखते हैं।“

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सोने का बंगला, चंदन का जंगला, सोने का बंगला, चंदन का जंगला

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प्रचण्ड प्रवीर हिंदी कथाकार और अनुवादक हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : प्रगतिशीलता के प्रकार

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