स्टीफेन मलार्मे की कविताएँ ::
फ़्रेंच से अनुवाद : मदन पाल सिंह

स्टीफेन मलार्मे

पवित्र, शाश्वत और सुहावना आज

पवित्र, शाश्वत और सुहावना आज
क्या अपने उन्मत्त डैने से खींच लेगा
यह कटु-कठोर बिसरा दी गई त्रस्त झील तुषार के नीचे
उड़ानों की पारदर्शी हिमानी जो कभी यहाँ से ग़ायब हुई नहीं!

एक हंस को स्मृत हुआ विगत कि वह ख़ुद है शोभायमान-प्रतापी
लेकिन हताश जो गा नहीं सकता
जहाँ जीता है वहाँ जब अनुर्वर शीत
फैला देती है नीरसता, विरक्ति का मंज़र।

छुटकारा पा लेगी उसकी गर्दन इस धवल यंत्रणा से
जो उसकी इच्छा विरुद्ध लादा गया है आकाश-चक्र द्वारा
लेकिन पृथ्वी द्वारा पंख हरण की घात से उसका त्राण नहीं।

मृगमरीचिका-आभास ने बख़्शा है इसे अपनी शुभ्र कांति से
तिरस्कार के भावशून्य ठंडे स्वप्न से वह हो गया है जड़
जिसे धारण किया है हंस ने अपने वृथा निर्वासन के दौरान।

सलामती का जाम*

यह फेन—अक्षत कविता के पद!
कुछ नहीं, केवल कीर्ति-अभिधान कर रहे हैं प्याले का
और दूर मत्स्यांगनाओं का एक दल कूद गया है
पराभाव से व्याकुल होकर अतल सागर में वापिस।

मेरे मुख़्तलिफ़ दोस्तो! हम सब निकल चुके हैं सुदूर जल यात्रा पर
मैं पहले से ही पोत के दुमबाल पर खड़ा हुआ हूँ
और तुम हो उसका शानदार तीखा मस्तक जो चीरता है
वज्रपात, गरजते सागर में शीत ऋतु के तीखे तूफ़ानी जल को

एक दिव्य मादकता से हो अभिप्रेरित, वचनबद्ध
उछाह, डगमगाने से घबराए बिना, तुम्हारे लिए
मैं खड़ा होकर सलामती का जाम पेश करता हूँ

निर्जन, चट्टान-शैल-भित्ति और दिशा दिखाता तारा
जो हो जिसके योग्य ले जाए, जो चाहे यह वहाँ उसे
कहीं भी नियति बन हमारे स्वेत बादबान की।

[1893]

* इक्यावन वर्ष की आयु में मलार्मे ने साहित्यिक पत्रिका `La Plume` द्वारा आयोजित प्रीतिभोज की अध्यक्षता की थी। फिर भोजनोपरांत, विचलित कवि ने इस रचना का पाठ किया। यह पाठ इसलिए भी ख़ास था क्योंकि मलार्मे के अनुसार कविता सुनने-सुनाने के लिए नहीं अपितु धीर-गंभीर अवस्था में पढ़ने के लिए रची जाती है। यहाँ कविता में स्थान-पत्र फेन मलार्मे के शैम्पेन से भरे गिलास में बुदबुदाते-जगजमागते झाग ही हैं।

मलार्मे की यह प्रतीकवादी रचना अनेक स्तर पर व्याख्यायित की जाती रही है। इसमें कला और उसकी शून्यता, अनस्तित्व, नवोन्मेषी कविता-यात्रा और इसके लिए किए जाने वाले सतत प्रयास की आवश्यकता प्रमुख है। कविता में आए अधिकांश प्रतीकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि `विशुद्ध कला` को साधने का प्रयास सर्वोपरि है।

~•~

अपने रुग्ण पुत्र की मृत्यु से पहले और बाद में मलार्मे ने कुछ अंश लिखे थे जो पुत्र-वियोग से उपजा मर्सिया साबित हुए :

वसंत में रुग्ण-क्लांत
और पतझड़ में मृत, उसका अवसान
—यही सूर्य है
~ ~ ~
लहर
मत-विचार खाँसी

***

परम निमित्त कुछ नहीं था
सिवाय जीवन से पवित्र प्रस्थान के जो
किया तुमने पहले ही भर-भर पीड़ा पाकर
—प्यारे कोमल बच्चे और यह रहा अभियोजन तुम्हारे
अलोप जीवन के ख़िलाफ़ तथा तुम्हें गँवा इस कारण
भोगकर अपने हिस्से की पीड़ा दारुण
रिहाई पाई है

***

करबद्ध
उसकी ओर जिसे
दबाया नहीं जा सकता आकारहीन—
लेकिन जो है—
—वह है अंतराल
विभक्त—

***

पुनः जीता हुआ जीवन
—निर्मित करने
साथ उसकी (शुद्ध)
दमक—यह
कार्य—अति
विस्तीर्ण मेरे लिए

और यथा (मुझे वंचित
किया है जीवन से
निछावर, यदि हुआ…

***

कभी विगत काल निष्ठुर और
वस्तुगत-दैहिक
बाह्य—
अब
मनोबल
हमारे अभ्यंतर में

***

दृष्टांत
मिला है हमें
तुम्हारे माध्यम से कि
`हमारा उत्कृष्ट` ही हमसे
पा लेता है अक्सर
निस्तार—और होगा
हमारे अंतर में—यथा हमारे
विधान में, अब
~ ~ ~
शिशु, संतति
आदर्शरूप!

स्टीफेन मलार्मे (1842–1898) संसारप्रसिद्ध फ़्रेंच कवि हैं। मदन पाल सिंह भारत और फ़्रांस में शिक्षित हिंदी लेखक और अनुवादक हैं। फ़्रांस के प्रतीकवादी कवियों (शार्ल बॉदलेयर, स्टीफेन मलार्मे, आर्तच्युर रैम्बो, पॉल वेरलेन) पर उन्होंने पुस्तकाकार (जीवनी और अनुवाद) काम किया है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ उनकी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक `क्रूर आशा से विह्वल` (मलार्मे की जीवनी और उनकी चुनी हुई कविताएँ) से ली गई हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : रोज़मर्रा के उबाऊ सरल कामों में लगा नम्र जीवन

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