बेदिल की एक ग़ज़ल ::
फ़ारसी से अनुवाद और व्याख्या : 
वागीश शुक्ल

मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर `बेदिल’ (बिहार, 1644–दिल्ली, 1720) अपने अप्रतिम काव्य-कौशल और निरवधि वैचारिक साहस के नाते संपूर्ण फ़ारसी साहित्य में एक अलग ही मसनद के हक़दार हैं। उनकी एक .गज़ल नीचे दी जा रही है।

बज़्म+ए+मा-रा नेस्त ग़ैर अज़ शुहरत+ए+अन्क़ा शराब
कज़ सदा+ए+जाम न० तवाँ फ़र्क़ कर्दन ता शराब ॥1॥

[[ मेरी महफ़िल में अन्क़ा की प्रसिद्धि के अतिरिक्त कोई शराब नहीं है।
(इसे इसी से समझ लो) कि पान पात्र की ध्वनि का मदिरा से अंतर कर पाना संभव नहीं है।

(`अन्क़ा’ एक मिथकीय पक्षी है जिसका नाम तो है, किंतु रूप नहीं। यहाँ कह रहे हैं कि शराब ढालने के समय मेरे जाम से जो आवाज़ उठती है, उससे शराब के होने का अनुमान होता है, किंतु शराब को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता इसलिए उसे अन्क़ा समझो। `बेदिल’ की कविता में अन्क़ा प्रायः निर्गुण ब्रह्म के लिए आता है, और इस प्रकार यहाँ प्रत्यक्ष जगत् से अनुमेय किंतु वस्तुतः परोक्ष, निर्गुण ब्रह्म को ही शराब बताया गया है।) ]]

ज़र्फ़+ओ+मज़रूफ़+ए+तवह्हुम-गाह+ए+हस्ती हैरत स्त
कस चि० बन्दद तर्फ़+ए+मस्ती ज़ीं परी-मीना शराब ॥2॥

[[ यह `अस्तित्व’ नाम का भ्रम देश भी आश्चर्यमय है और उसमें जो वर्तमान है वह भी।
(अन्यथा यह कैसे होता कि) इस शराब से जो कि सुराही और परी का सम्मिश्रण है कोई मत्त होने का लाभ उठा सकता।

(कवि-समय है कि शीशे में परी रहती है—’बोतल-बंद जिन्न’ की प्रसिद्धि को भी इसी से समझना चाहिए। `परी’ एक अलौकिक प्राणी है अतः स्थूल जगत् से बाहर होने के नाते वह `भ्रम’ कही जा सकती है। इस प्रकार उसके निवास अर्थात् सुराही, को `भ्रम-देश’ कहा जा सकता है और फिर चूँकि यह स्थूल जागतिक अस्तित्व माया निर्मित होने के नाते मिथ्या है, इसलिए जागतिक अस्तित्व को इस `भ्रम-देश’ से समीकृत कर सकते हैं। इस प्रकार आधार अर्थात् सुराही, और आधेय अर्थात् मदिरा, दोनों ही भ्रम हैं। तथापि इस भ्रमात्मक मदिरा से मत्त-ता अर्थात् ज्ञानित्व, प्राप्त होता है, यह आश्चर्य की बात है।

अद्वैत-सिद्धांत के अनुसार जगत् मिथ्या है अर्थात् उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है, केवल व्यावहारिक सत्ता है। फिर इस नाते शब्द-व्यापार भी इसी अर्थ में मिथ्या होता है अतः शास्त्र की भी सत्ता केवल व्यावहारिक है और इस नाते उसे भी मिथ्या मानते हैं। तब भी उससे पारमार्थिक सत्ता वाले ब्रह्म का ज्ञान होता है, यही स्थापना है, भले ही यह आश्चर्यजनक हो। इस शे’र में यही कहा है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि सूफ़ी शब्दावली में शराब का अर्थ मारिफ़त, अर्थात् ज्ञान, होता है।) ]]

मक़स़द+ए+हैरत-ख़राम+ए+अश्क+ए+बे-ताब-म म-पुर्स
नश्श० बेरूँ ता ज़ि इदराक स्त+ओ+ ख़ूँ-पैमा शराब ॥3॥

[[ मेरे आश्चर्यलिप्त चाल वाले अधीर आँसू का उद्देश्य मत पूछो।
नशा बुद्धि के पार तक चला गया है और शराब पूरे ख़ून में दौड़ रही है।

(कहना यह चाहते हैं कि मेरे आँसू इस चाहत में ढले थे कि वे नशे और शराब, दोनों की पहुँच को नाप लें। किंतु ऐसा हो नहीं पा रहा है, नशा बुद्धि की सीमा के बाहर तक फैला है और शराब उतनी दूर तक हरकत में है जितनी दूर तक ख़ून हरकत में है। अतः आँसू अपनी यात्रा के अंतहीन विस्तार पर आश्चर्य में डूबा हुआ ढलता ही चला जा रहा है; मैं तुम्हें क्या बताऊँ कि इसे कहाँ जाना है।

इस शे’र में कर्म मार्ग से पारमार्थिक सत्य तक पहुँचने की आशा को निरर्थक बताया गया है : ‘आँसू’ कहने से इस प्रयास की विफलता से उपजे दुःख का भी संकेत मिल जाता है।) ]]

मा ब०-उम्मीद+ए+गुदाज़+ए+दिल ब०-ख़ुद बालीद० एम
यअनी ईं अंगूर हम ख़ाहद शुदन फ़र्दा शराब ॥4॥

[[ मैं इस आशा से कि मेरा हृदय पिघलेगा, स्वयं से ऊपर उठ गया।
क्योंकि इसका तात्पर्य यह है कि कल यह अंगूर भी शराब होना चाहता है।

(अंगूर की उपमा हृदय से दी गई है और इस तथ्य का उपयोग किया गया है कि भट्ठी में शराब उबलने के समय आयतन में बढ़ जाती है। `हृदय का पिघलना’ वस्तुतः `हृदयग्रंथि के भेदन’ की ओर संकेत है जो अद्वैती शब्दावली में ज्ञान-प्राप्ति का सूचक होता है।) ]]

दर रह+ए+मा अज़ शिकस्त+ए+शीश०-हा+ए+आबिल०
मे-फ़रोशद हम-चु जाम+ए+बाद० नक़्श+ए+पा शराब ॥5॥

[[ मेरे रास्ते में मेरे पैरों के छाले फूटे जैसे कि शराब के शीशे (=शीशे की बनी सुराहियाँ) फूटे हों
और इस प्रकार मेरे पदचिह्न शराब (=उन छालों के फूटने से बहने वाला ख़ून) बेचने वाले (=पीने वालो॑ के लिए मदिरा उपलब्ध कराने वाले) पान-पात्रों जैसे हो गए।

 

(तात्पर्य यह है कि सत्यान्वेषण-पथ में पड़ रहा मेरा हर क़दम ज्ञान की मदिरा से भरपूर रहा और इस प्रकार मैं ज्ञानार्थियों के लिए अनुकरणीय हो गया, उन्हें चाहिए कि मेरे पीछे-पीछे चले आएँ।) ]]

दर सियह-कारी सवाद+ए+गिर्य० रौशन कर्द० एम
साफ़ मे आयद बरूँ अज़ पर्द०+ए+शब-हा शराब ॥6॥

[[ अपने कलुषित कर्मों के बीच मैंने (पश्चात्ताप-जन्य) रुदन का एक क्षेत्र प्रकाशित कर दिया (और इस प्रकार) रात के परदे से स्वच्छ मदिरा बाहर निकल आई।

(शराब बनाने के क्रम में उसके भीतर का करकट छान कर स्वच्छ पेय मदिरा निकाल ली जाती है। इसे ही कलुषित कर्मों के बीच एक क्षेत्र का प्रकाशित होना कहा गया है; यह क्षेत्र आँसुओं का बना होने के नाते जलमय है और इस प्रकार मदिरा से तुलनीय है। प्रकाशित होने के नाते रात के अँधेरे से निकलते हुए चंद्रमा से भी इसकी तुलनीयता है।) ]]

पेच+ओ+ताब+ए+मौज जुल्फ़+ए+जौहर इन्शा मे कुनद
गर नुमायद चिहर० दर आईन०+ए+मीना शराब ॥7॥

[[ अगर सुराही के आइने में शराब अपना मुँह दिखाए तो आईने में उठने वाली लहरों की वक्रताएँ आइने के जौहर को उस चेहरे की जुल्फ़ों के रूप में लेखाङ्कित करेंगी।

(पहले आइने लोहे के बनते थे और उन पर ऐसी कई बातें लागू होती थीं जो तलवार पर लागू होती थीं। उदाहरण के लिए `तलवार का पानी’ की तर्ज़ पर `आईने का पानी’ भी माना जाता था जिसके नाते इस शे’र में `आइने में उठती लहरें’ बेदिल ने कल्पित की हैं। इसी प्रकार लोहे की उत्कृष्टता जताने के लिए उस पर कुछ काली धारियाँ डाली जाती थीं जिनके लिए अँग्रेज़ी में damascene शब्द आता है क्योंकि पश्चिम का परिचय दमिश्क में बनी तलवारों से था यद्यपि अरबी-फ़ारसी साहित्य में भारत में बनी तलवार का ही गुणगान है भले ही ग़ालिब जैसे आग्रही `इस्फ़हान में बनी तलवार’ ही अपनी कविता में ले आते हैं।

सुराही शीशे की बनी है तो उसे आइना कहना और फिर इस शब्द के सहारे शराब को लोहे के आइने में मुँह देखती रूपसी में रूपंकृत करते हुए उसमें उठती लहरों को आईने के पानी (=दीप्ति) में उठती लहरों में कल्पित करना, जिन्हें फिर उस आइने के जौहर को उसकी धारियों के कालेपन के नाते शराब के प्रतिबिम्ब की जुल्फ़ें बताना जो कि आइने के पानी में उठती हिलोरों के कारण लहराती हुई मानी जाएँगी—यह सब मिल कर दूरारूढ औपम्य-मूलकताओं को एक गोरखधंधे की हैसियत में उलझाते हुए जिस प्रकार आलंकारिकता के सीमांतों का अतिक्रमण करने के लिए बाध्य करते हैं, वह फ़ारसी कविता के उस सम्प्रदाय का एक अभिलक्षण है जो मुख्यतः भारत में पनपने-बढ़ने के नाते `सबक़+ए+हिन्दी’ अर्थात् `भारतीय पाठ (=शैली)’ के नाम से जाना जाता है और जिसके परमाचार्य बेदिल माने जाते हैं।) ]]

ख़ार+ओ+ख़स-रा मे-निशानद शुअल० दर ख़ाक+ए+सियाह
आक़िबत अहल+ए+हवस-रा मे-कुनद रुसवा शराब ॥8॥

[[ बुझने के बाद की काली राख में घास-फूस की पहचान को भड़कती हुई चिनगारी बता देती है।

(इसी से समझ लो कि) शराब उन लोगों की परलोक-प्रतिष्ठा को बदनाम कर देती है जो भोग-लालसा से अनुप्रेरित होते हैं।

(लकड़ी के कुंदों की आग बुझ जाने के बाद भी उसमें अगर सूखी घास के तिनके डाले जाते हैं तो उनसे चिनगारियाँ फूटती हैं; इसी का सहारा लिया गया है। फ़ारसी कविता में `हवस’ अर्थात् भोग-लालसा, निंदनीय मानी जाती है और `इश्क़’ के प्रतिपक्ष में रखी जाती है।) ]]

चूँ लब+ए+साहिल नसीब+ए+मा हमाँख़मयाज़० अस्त
गर हम० दर काम+ए+मा रेज़न्द यक दर्या शराब ॥9॥

[[ सागर-तट के ओठों की तरह मेरे भाग्य में जँभाई ही लिखी है चाहे मदिरा का पूरा समुद्र ही मेरे तालू में क्यों न उड़ेल दिया जाए।

(फ़ारसी कवि-समय में समुद्र-तट का आकृति-साम्य जँभाई से उपमित होता है; दूसरी ओर जँभाई आना शराब की तलब का भी लक्षण है।) ]]

इम्तियाजे दर-मियाँ आमद दुरंगी नक़्श बस्त
कर्द बेदिल साग़र+ए+मा-रा गुल+ए+रअना शराब ॥10॥

[[ ऐ बेदिल विवेक बीच में आ गया और दुरंगेपन ने अपना चित्रांकन कर दिया। इस प्रकार मेरी मदिरा गुल+ए+रअना नामक फूल में बदल गई।

(`गुल+ए+रअना’ का शाब्दिक अर्थ `रूप गर्वित पुष्प’ होता है यह भीतर से लाल और बाहर से पीला होता है और इसे सौंदर्य का मानक कहा जाता है। बेदिल कह रहे हैं कि सृष्टि के पूर्व कोई वैचित्र्य नहीं था केवल निर्गुण ब्रह्म था। यह अभेद की स्थिति थी। किंतु इस अभेद के बीच में भेद का आगमन हुआ और इस प्रकार अद्वैत में द्वैत ने आकार ग्रहण कर लिया। इस द्वैत का ही वैचित्र्य है जिसने ब्रह्म स्वरूपी मदिरा को सृष्टि-स्वरूपी मोहकता दी।

`इम्तियाज़’ का अर्थ `विवेक’ है जो मुख्यतः `सत्’ और `अ-सत्’ के बीच अंतर कर सकने की क्षमता को बताता है। सांसारिक व्यवहार में यह एक गुण है किंतु बेदिल ने अद्वैत के इस मूल सिद्धांत का प्रतिपादन किया है कि द्वैत माया की ही निर्मिति है और इस प्रकार `विवेक’ भी भेदाश्रित होने के नाते परमार्थतः मिथ्या ही है। `दु-रंगापन’ द्वैत को भी बताता है और इसका अर्थ `दोमुँहा-पन’,`छल’ आदि भी होता है जिसके नाते पुनः यह सिद्धांत पुष्ट होता है कि द्वैत छलावा है।) ]]

टिप्पन : अंतिम शे’र से मिलते-जुलते भाव वाला बेदिल का एक और शे’र उनकी एक दूसरी ग़ज़ल से यहाँ दिया जा रहा है :

अज़ कुजा वहम+ए+दु-रंगी ब० -क़दह रेख़त० बंग-म
हुस्न बे-रंग+ओ+मन+ए+बे-ख़बर आईन० ब०-चंग-म

[[ दु-रंगेपन के भ्रम ने कहाँ से मेरे शराब के प्याले में भाँग मिला दी कि मैं आइना पकड़े हुए (सौंदर्य का प्रतिबिम्ब देखने के प्रयास में लगा हुआ) हूँ जब कि सौंदर्य नीरूप है (और इस प्रकार उसका प्रतिबिम्ब पड़ना असंभव ही है।)

(शराब का रंग लाल और भाँग का रंग हरा है, इससे दुरंगापन बताने का आलंकारिक औचित्य भी बनता है। जैसा कि पहले बताया गया है मदिरा ज्ञान की प्रतीक है। बेदिल ने भाँग को अज्ञान का प्रतीक माना है। यह अद्वैत का सिद्धांत है कि ज्ञान और अज्ञान के मिश्रण से ही द्वैत का उदय होता है और सृष्टि होती है। बेदिल ने यही कहा है।

बेदिल ने इस शे’र में उस सूफ़ी सिद्धांत से आगे बढ़ कर बात की है जिसके अनुसार अल्लाह ने अपना प्रतिबिम्ब देखने के लिए सृष्टि की है। इस सिद्धांत का आधार एक `क़ुदसी हदीस (=अल्लाह के वचन के रूप में स्वीकृत ऐसा कथन जो क़ुर्आन में उपलब्ध नहीं है)’ है जिसका तात्पर्य है : “मैं एक छिपा हुआ ख़ज़ाना था फिर मैंने अपने को देखने के लिए यह दुनिया बनाई”। इस हदीस के आधार पर सूफ़ी अद्वैत के प्रतिबिम्बवाद का इस प्रकार प्रतिपादन करते हैं कि यह संसार `मजाज़’ अर्थात् `छाया’ है जो एक दर्पण में `हक़’ अर्थात् परम सत्य के प्रतिबिम्ब की भाँति है। इस सूफ़ी सिद्धांत का यथातथ प्रतिपादन ग़ालिब के एक प्रसिद्ध क़सीदे के इस मतले में देखा जा सकता है :

दह्र जुज़ जल्व०+ए+यकताई+ए+माशूक़ नहीं
हम कहाँ होते अगर हुस्न न० होता ख़ुद-बीं

जिसका तात्पर्य है : ‘‘यह संसार उस माशूक़ अर्थात् अल्लाह की एकता के प्रदर्शन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हम भला कहाँ होते अगर उस सौंदर्य अर्थात् अल्लाह को यह शौक़ न होता कि वह ख़ुद को निहारे”। बेदिल ने यहाँ कहा है कि उस निराकार की छवि देखने के लिए साकार जगत् के निरीक्षण का प्रयास निरर्थक है।) ]]

वागीश शुक्ल (जन्म : 1946) समादृत हिंदी साहित्यकार हैं। वह कई भाषाएँ जानते हैं और आलोचना, टीका, गल्प तथा अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ‘छंद छंद पर कुमकुम’, ‘शहंशाह के कपड़े कहाँ हैं?’ और ‘चंद्रकांता’ (संतति) का तिलिस्म’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उनकी ज्ञानराशि और अभिरुचियाँ व्यापक हैं। वह बस्ती (उत्तर प्रदेश) में रहते हैं। उनसे wagishs@yahoo.com पर बात की जा सकती है।

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