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कृष्ण कल्पित
से
अविनाश मिश्र

कृष्ण कल्पित

‘कोरोना कविता का विषय नहीं’

कोरोना पर सबसे अच्छी कविता आपको अब तक किसकी लगी?

कोरोना कविता का विषय नहीं है। मनुष्यता पर आए संकट पर कविता हो सकती है। क्योंकि यह विषय शाश्वत है। वैसे विजय कुमार की कविता प्रोजेक है, लेकिन जितनी पढ़ी उनमें वह अच्छी है, लेकिन वह भी ठीक-ठीक कोरोना पर नहीं सभ्यता संकट पर है। हाँ, डायरी या इम्प्रेशन लिखे जा सकते हैं या रिपोर्ताज़।

कोरोना साहित्य जैसी कोई चीज़ नहीं है, आप यह कह रहे हैं?

प्लेग, हैज़ा इत्यादि महामारियाँ भी घट चुकी हैं। अल्बेयर कामू का ‘प्लेग’ उपन्यास प्लेग पर नहीं मनुष्य की जिजीविषा और मृत्यु के विरुद्ध उसके सघर्ष पर है। यदि प्लेग पर होता तो वह उपन्यास अप्रासंगिक हो जाता, क्योंकि प्लेग का उन्मूलन हो गया।

‘प्लेग’ अभी भी एक उपन्यास की तरह पढ़ा जाता है, प्लेग के लिए नहीं।

कोरोना साहित्य होगा तो प्लेग साहित्य, हैज़ा साहित्य, एड्स साहित्य भी होगा।

शामें कैसे गुज़र रही हैं आपकी?

आजकल शामें यूट्यूब पर गुज़र रही हैं। तीन दिन से यूट्यूब पर उपलब्ध शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के सारे साक्षात्कार और व्याख्यान सुन गया। उन जैसा भारतीय पोएटिक्स का विद्वान-आलोचक हिंदी में एक भी नहीं है। हिंदी वाले पश्चिम के ग़ुलाम हैं, लेकिन फ़ारूक़ी पश्चिमी काव्यशास्त्र का प्रत्याख्यान रचते हैं। वह कुंतक, राजशेखर, मम्मट का नाम गर्व से लेते हैं; जबकि हमें शर्म आती है। वह संस्कृत और फ़ारसी के प्रचीन आदान-प्रदान की बात करते है। वह सचमुच एक अद्भुत, विलक्षण और विद्वान आलोचक हैं।

कल बिहार के दिवंगत शायर कलीम आजिज़ को सुन रहा था जो मीर के रंग में शाइरी करते थे जिनका यह शे’र बहुत मशहूर है

दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो

कलीम आजिज़ एक बातचीत में कहते हैं कि ग़ालिब बहुत बड़े फ़नकार है और बहुत बड़े बाज़ीगर हैं, लेकिन शाइर नहीं। शाइर तो मीर हैं। यह सुनकर मैं रोमांचित हो गया। मैंने भी कहीं लिखा है कि यदि कोई कवि-शाइर बनना चाहता है तो वह मीर को पढ़े और नक़्क़ाद-आलोचक बनना चाहता है तो ग़ालिब को।

इस बीच कुछ काम हुआ?

नहीं। सोचा था अपने अधूरे उपन्यास ‘जाली किताब’ पर इस दौरान काम करूँगा, लेकिन कुछ लिखा नहीं जा रहा। बस पढ़ रहा हूँ। ‘ऋग्वेद’ फिर से पढ़ रहा हूँ और भी प्राच्य साहित्य। आधुनिक कथा-कहानी और कविता जब तक बहुत उल्लेख न हो जाए, मेरा मन नहीं रमता। आधुनिक साहित्य का अधिकतर हिस्सा कचरा है।

हम जिस हिंदी संसार में विचरते रहते हैं, उसमें इस केंद्रीय संकटकालीन विमर्श से अलग बिल्कुल इसी समय जो विमर्श चलने लगते हैं, उनके पीछे क्या देखते हैं आप—ख़ाली दिमाग़ या शैतान का घर?

हिंदी-संसार इतना दरिद्र स्वकेंद्रित और अपढ़ इससे पूर्व शायद ही रहा हो। सबको अमर होने की पड़ी है और मरना कोई नहीं चाहता। सब अपने हिसाब-किताब कर रहे हैं, जैसे यह अंतिम घड़ी हो। मेरी राय में आज हिंदी में एक भी विश्वसनीय आवाज़ नहीं बची है।

आप इस समाज से अपनी पुरानी लड़ाइयों को लेकर इस समय क्या सोचते हैं?

मैं तो शुरू से ही हिंदी-भवन से बाहर हूँ। निराला के शब्दों में : बाहर मैं कर दिया गया हूँ। लेकिन निराश नहीं हूँ और यही एक दिलासा है। मैं हिंदी का ऐसा पैदल सैनिक हूँ जिसे लश्कर ने अकेला छोड़ दिया है।

आपकी नवीनतम कृति ‘हिन्दनामा’ हिन्द में और हिन्द से बाहर कहाँ-कहाँ पहुँच गई है, आप इसका प्रचार करते रहे हैं। इससे आपकी कविता की पहुँच का भी पता चलता रहा, लेकिन इन दिनों यह बाधित है, इसका कितना अफ़सोस है?

यह सूत्रों से ही पता चल रहा कि बाहर के देशों में भी ‘हिन्दनामा’ की माँग बढ़ी है। अमेज़न और सिर्फ़ विदेशों में भारतीय किताबें भेजने वाली एजेंसियाँ ‘हिन्दनामा’ का प्रचार कर रही हैं। मुझे कुछ ई-मेल भी आए हैं बाहर से। इससे कुछ विवाद भी पैदा हो सकता है। जैनों, आजीवकों और महावीर पर मेरी टिप्पणियों से कुछ लोग आहत हैं। लेकिन ‘हिन्दनामा’ दूर-दूर तक पढ़ा जा रहा है और यह मेरे लिए, मेरी कला के लिए ख़ुशी की बात है। इन दिनों तो किताबों का प्रसार क्या सब कुछ ही बाधित है।

आप मौजूदा संकट से जुड़े तथ्यों और आँकड़ों को जानने के लिए समाचारों को रोज़ कितना वक़्त दे रहे हैं?

अख़बार बंद कर दिए हैं। रोज़ सुबह ऑनलाइन ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ पढ़ता हूँ जिसमें संसार भर में कोरोनाग्रस्त लोगों के आँकड़े और मरने वालों की संख्या पढ़ लेता हूँ। फिर अपने काम में या बेकाम में लग जाता हूँ।

बाक़ी ख़बरें भी मिल ही जाती हैं। सूचना-युग है। ख़बरें आपका रास्ता रोक लेती हैं—आते जाते।

ख़बरें पाकर मैं फिर किसी किताब में डूब जाता हूँ, जैसे आज सुबह से जोश मलीहाबादी की आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में डूबा हुआ हूँ।

क्या किताबें डर से मुक्त करती हैं? कर रही हैं?

बिल्कुल। वे आपको अपने समय से काटकर अपने समय में ले जाती हैं। यह जादू सिर्फ़ किताब कर सकती है।

किताब अब तक की दुनिया का सर्वश्रेष्ठ आविष्कार है। सिनेमा देखते हुए भी एक तकनीक आपको बाधा पहुँचाती रहती है। सिनेमा आपकी कल्पना को बाधित करता है, जबकि किताब आपकी कल्पना को उन्मुक्त करती है। किताब के आगे कोई सिन्फ़ नहीं ठहरती।

संगीत?

नहीं। नहीं।

दुनिया का क्या होगा?

दुनिया की समीक्षा हो रही है। इसकी निर्मम आलोचना हो रही है। इसके बाद बची रहने वाली दुनिया बचेगी ही। यह कहना तो सही नहीं है कि दुनिया अधिक मानवीय होगी। हो तो सुंदर है। यह श्मशान-वैराग्य की स्थिति है। श्मशान से बाहर आते ही सब उन्हीं धंधों में लिप्त हो जाते हैं।

फिर भी लगता है कि दुनिया अपने धतकर्मों से सबक़ लेगी। लेना चाहिए।

और कुछ कहना चाहेंगे इस घड़ी में?

क्या कहें? कहने लायक़ बने रहें और इस दुनिया में कहना-सुनना बना रहे… यही प्रार्थना है। कहना और सुनना इससे बड़ी नियामत दुनिया में कुछ नहीं।

गुफ़्तगू एक चली आती है
कोई कहता है कोई सुनता है!

कृष्ण कल्पित हिंदी के प्रसिद्ध कवि-लेखक हैं। इन दिनों वह अपनी रचना ‘हिन्दनामा’ को लेकर चर्चा और विमर्श के केंद्र में हैं। उनसे यह बातचीत फ़ेसबुक मैसेंजर के माध्यम से गए दो दिनों के दरमियान संभव हुई है। कृष्ण कल्पित से और परिचय के लिए यहाँ देखें : जाने क्या बात थी नीरज के गुनगुनाने में…

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