कविता ::
बेबी शॉ

अखिलम् मधुरम्
एक
यह आकाश आज हर्षोल्लास से परिपूर्ण है। तुम पक्षी के सुर हो! तुम बारिश की बूँद! तुम आकाश हो! तुम निर्मल हवा! तुम मेरा दुःख हो! तुम मेरा आनंद! तुम मधुर हो! तुम शाश्वत! तुम मेरा हृदय हो!
चिरंतन प्रेम से भर दो मुझे! मैं मृत्यु से पहले उस पवित्र प्रेम को छू लूँ जिसके लिए आँखें भर आती हैं! मन आकुलता से भरा हुआ है! रक्त की हर बूँद आँसू बन जाती है!
हे कृष्ण, मुझे प्रेम के योग्य बनाओ!
दो
आनंद की ओर जा रहा है पथ। रास्ते में ख़ुशियाँ पैदा हो रही हैं। पथ के चारों तरह ओर छोटी-छोटी लताएँ। आदि गुल्म। लघु तृण। फूल। संसार का प्रकाशमय शरीर नवीनता से परिपूर्ण है। नवदूर्वादल। बीच-बीच में खेल रहा है सुबह का सूरज। विरह मधुर अल्पना रच रही है। धूप और छाया। प्रकाश छायादार है—गहरा—लेकिन पंख की तरह हल्का! फिर भी देखो, सारे शरीर पर खेल रही है—आँसुओं की धारा। समय और महाकाल उस धारा में बहे जा रहे हैं!
इस क्षण तुम मेरे नाविक बनो, कृष्ण!
तीन
ध्वनि जैसी बज उठी है देह। मन से आ रही है सुंदर आवाज़। शब्द-सा चमक रहा है प्रेम। कंकण और नूपुर की ये ध्वनि जन्म-जन्मांतर की मुरजमुरली से मिश्रित है। आप कृष्ण हैं। आप प्रकाश हैं। अनंत काल का प्रवाह हैं आप! मेरी देह उस धारा में विलीन हो रही है। मेरी इच्छा और अनिच्छा, मेरी चाहत और ना-चाहत सब कुछ समर्पित है। आप ही वह अखिल-धन हैं जिससे निर्मित है श्री—आँसू। रुदन-जल। उस पवित्र जल में उत्पन्न महान् कमल, उसका माधुर्य और सह-अस्तित्व आँसुओं में रच रहे हैं—माया और प्रकृति।
अशांत प्रकृति यह, मेरी देह बन जा रही है मधुरम्!
चार
सुंदर होंठ। सुंदर आँखें। सुंदरता से भरा चेहरा। मधुर चुम्बन ब्रह्मांड की अव्यवस्था को मिटा रहा है। असहायत्व प्रतिध्वनि जैसा गूँज रहा है। आकर्षक प्रतिबिंब। मैं अभिभूत हूँ। मैं चिंतित हूँ। मैं अस्थिर हूँ। मैं अशांत हूँ। मैं निरंतर रूप के आकर्षण में अनंत मार्ग पर चल रही हूँ : वैसे ही जैसे पतंगा प्रकाश की ओर दौड़ता है! मिथक और पुराण आकर्षक कहानियों की ओर दौड़ रहे हैं!
अविश्वसनीय रूप से बुद्धिमान होने के बावजूद यह जन्म उस प्यार के लिए आज्ञाकारी और असहाय है। मैं राधा हूँ। अपंग शरीर में प्यास खेलती रहती है। कंठ रुद्ध है। स्वर शांत। कितने युगों से कान मधुर ध्वनि की प्रतीक्षा में हैं।
इस बैचेन शरीर को, मन को मुक्त दिशा दो, हे चिरंतन!
पाँच
हर काम मधुर है। हर वाक्य मधुर है। आपका प्यार और सम्मान मधुर है। मुझे मिला रोने का अधिकार मधुर है। दर्द मधुर है। आपकी हरण-विधि और तृष्णा भरी चाहत मधुर है। एक शानदार लड़ाई, फिर एक मधुर विदाई। इशारा और इंतिज़ार, तुम्हारा तिरस्कार और उपेक्षा, मिलन और विरह मधुर है। सुंदर मुद्रा और आपके होंठों को काटने वाले तीव्र अर्धचंद्राकार वृत्त लयबद्ध, तरल और प्रासंगिक हैं।
हे कृष्ण, मुझे भी उपेक्षा करना सिखाओ!
छह
गुंजा-फूल गले में झूल रहा है। शरद ऋतु के आकाश में तैर रही है—बाँसुरी की आवाज़। गुनगुनाता गाना और शांत पैदल रास्ता और उसकी परछाइयाँ धीमे-धीमे सुंदर हो रही हैं। धान और स-फ़सल खेत। यह सुंदर नदी और उसके सुंदर किनारे में काश की लहर। निर्मल हरी घास के मैदान में थके हुए बालकों का एक समूह और लंबी परछाइयों के साथ चलते हुए अप्रतिम पल आपको याद कर रहे हैं। गोधूलि का धूल भरा शरीर सुंदर और कोमल है। प्रत्येक प्रतीक्षा के बाद घर लौट, प्रतीक्षाओं से बाहर निकल, आजानुलंबित बाँहें लेकर खड़ा है मेरा यह अहंकारी प्रेम—गहन और तीखा! तीव्र और शांत!
हे कृष्ण, मुझे गहरी यमुना बना दो!
सात
आकाश और शून्य की ओर देखती हुई लड़कियाँ गंभीर और सुंदर होती हैं। एकांत शून्य सब समय सुंदर हैं। आपके अंदर आने वाला प्रत्येक क्षण कारूमयता से रचा गया है। शरीर की मुद्रा और गंध, सीने की प्रत्येक धड़कन, आज़ाद पंछी के पंख ख़ूबसूरत हैं। आँखों के प्रत्येक इशारे जन्म के आह्वान हैं। पैरों के सब छंद युगों की कविता और लय हैं। यह दृश्य और दृष्टि प्रेमपूर्ण है।
और दृश्य…
और दृष्टि…
इस संसार में मुझे भी एक दृश्य बना दो, कृष्ण!
आठ
रचनाएँ सुंदर और मनमोहक हैं। चेतना और विचार सुंदर हैं। संसार का जन्म और मृत्यु दोनों ही इशारों और चेतनाओं से भरी हुई है। वैभवशाली हाथों के स्पर्श से धुन बज रही है। छोटे-छोटे इशारों से बनी कर्म से भरी सृष्टि और ज़िंदगी। यमुना और अन्य जलाशय, जीव-जंतु, पक्षी और सरीसृप उस चेतना के भार पर चलते हैं।
मुझे इनका एक अंश बना दो, कृष्ण!
बेबी शॉ बांग्ला की सुप्रसिद्ध-सम्मानित कवि-लेखक-अनुवादक हैं। वह हिंदी और अँग्रेज़ी में भी अपने लेखन के साथ सतत सक्रिय हैं। ‘सदानीरा’ पर इस प्रस्तुति से पूर्व प्रकाशित उनके काम-काज के लिए यहाँ देखिए : बेबी शॉ