कविताएँ ::
सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

पश्चाताप की एक [?] शाम

इस गर्म शाम
देह दही की तरह पिघल रही थी
मुझमें एक ऋतु भीग आई थी
आहिस्ता-आहिस्ता
झड़ रहा था नीम
अपनी पेशाब पर लेटा
एक कुत्ता झाड़ रहा था कान
जिसे एक चींटी घेर रही थी

उस वक़्त—
महत्त्वाकांक्षा बूढ़ी छिपकली-सी सुस्त हो चली थी
बस उम्मीद ही बहुवचन में याद आ रही थी
और अतीत का दूध दिमाग़ में जल रहा था

उम्मीद—
मुझे सबसे अधिक उम्मीद
अपने पश्चाताप से थी
उसने कभी निराश नहीं किया
सबसे सुंदर से भी पछताया हूँ मैं
पछताना पानी में पानी सरीखा था
जहाँ से लौटना भी पछताना था

बहुत दूर से—
एक नदी की याद
बहुत दूर तक आ रही थी
भिगोती पानी को मिट्टी में
बहुत दूर तक जाती थी जो
तुम्हारी याद
एक किनारे से आई थी
जहाँ का आख़िरी फूल मुरझाकर
सूखी रोटी हो आया था
जिसे कुतरते-कुतरते भाप की गिलहरी
मेरी आँख में घुस गई थी धप् से
जिसे खोजने उसके पीछे गया
और—
और मैं अब तक नहीं लौटा
मुझे खोजने के लिए
एक और गिलहरी खोज रही है रास्ता
मेरे ही भीतर
उसे भी जगह दो मेरे पश्चाताप!

प्रेरणाएँ

प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
बूढ़ी हो चुकी थीं प्रेरणाएँ…

वे बर्तन थीं जो बजने लगते थे अचानक
कुछ देर तक खनकती थी आवाज़ जिनकी
दूर तक गूँजती थी भीतर
फिर झाड़ी-झाड़ी से
झड़ने लगती थी
अमावस

प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
ढेर में आईं प्रेरणाएँ
फिर संग्रहों में
मरते हुए आदमी के आख़िरी उवाच् से आईं
पुस्तकों और प्राचार्यों से आईं
भय का विपर्यय और जीवन का समस्थानिक
विकल्प वे कभी नहीं थीं
जिए जाने की कथावस्तु तो नहीं
जिए ही जाने की कथा की वस्तुएँ अवश्य थीं

प्रेरणाएँ!
प्रेरणाएँ!
खनकती रहीं प्रेरणाएँ
बर्तन थीं
जिन्हें माँजते रहे आजीवन
जबकि एक बार भी उनने पेट नहीं भरा
उनमें अन्न तो ज़रा भी न था
जी ज़रूर मिचलाया उन्हें जूठा करते हुए

एक आदर्श सूक्ति
सड़ती रही पेट में
कच्ची मछली की तरह!

रचना

समय से आया
जो आलते की तरह गाढ़ा
एड़ियों पर नील पड़ गया
जिसका घाव सालता रहा
और गर्भ की ग्रंथियाँ गलकर
ख़ून में चुभती रहीं
हम चुप रहे
दुःखों का बड़ा बादामी बाघ
घेरता रहा नदी

अँधेरे में देह छोड़कर किधर जाते हम
सारे देशों में सिर्फ़ देश ही थे
स्वर्ग जल चुके जनपद-सा धधक रहा था
और ब्रह्मा मुँह खोलकर सोए जा रहा था गहरी नींद
उसकी नाक में मक्खियाँ घुस रही थीं बार-बार
फिर भी वह रचे ही जा रहा था
सोते हुए सृजन का सपना कैसे आ रहा था उसे
हमें खाती रही यह बात सारी रात
कि ब्रह्मा को अब तलक छींक क्यों नहीं आई
वह क्या खाकर सोया था
जिसे खाकर हम मर भी नहीं सकते

ठंडी हवा ने अपनी कोई लिपि न छोड़ी
समस्त में कैसे जिए हम
बेरात जन्म को जीवित रहते हुए
पानी में पत्थर जनते रहे
वक़्त का वायस काकता रहा मुहाने पर
सो गए अररकर सभी वृक्ष चिड़ियों पर
हममें बैठी थी जो निर्मम पीली आँख सुबककर
देखती रही अंत तक
आख़िर ढल गई धातु में
और जल-जल कर पानी का दूध हुई

[लेकिन कविता,
आँख कभी धातु नहीं होती
चिड़ियों पर कभी वृक्ष नहीं सोते
वक़्त कोई कौआ नहीं होता
हवा को लिखना नहीं आता
ब्रह्मा हमारे लिए कभी न था
और उसके घर मक्खियाँ नहीं होतीं
स्वर्ग कोई जनपद न था
देशों में सिर्फ़ देश नहीं होते
दुःख कोई बाघ नहीं होता
गर्भ में कोई ग्रंथि नहीं होती
समय कोई आलता भी नहीं होता
और घावों पर कभी नील नहीं पड़ता…]

जीने के उत्तर में

हमने जीवन से क्रिया में प्यार चाहा
हमें संज्ञा में अवकाश मिला
मृत्यु के विशेषणों में भी बिलखती रही मौत
थक-हार कर अभिधा में लौटानी चाही स्मृति
पर जो स्मृति से आया
वह जीवन को दे न सके किसी गद्य में

आख़िर स्मृति का भ्रूण खंडित करना चाहे
लेकिन जो पक चुका वह कहाँ गिराते
कान पर एक फूल लगाए हँसते-दौड़ते कितने दूर जाते
अपराध-बोधों के मुहावरों में
जीवन की निरपराध संज्ञाएँ लेकर
हृदय से दूर होकर दूर से धड़कना
जीवन का फूलना तो नहीं था!

कल

हमारी एक अपेक्षा में
पूरा स्वप्न भर आएगा
स्वप्नों से ख़ारिज होने के स्वप्न
हम जान चुके हैं

इस विषाद का पीछा करते-करते
किस आयु में हम घर पहुँचेंगे
जाते हुए आँख से फूटेगा पसीना
कहाँ दुखेगी देह
देह भी नहीं बता पाएगी

जीवन से जी भर गया
अब मृत्यु से क्या भरेगा

अब जो भी बचा है शेष [?] रचने को
रचेंगे हम
नींद को नशे की नाशपाती देंगे
सोएँगे हम
रक्त में बहुत गिरे पहाड़
अब बाँहें सब्ज़ होंगी हमारी
जिसकी हरियाली में खेल उठेंगी हथेलियाँ

हमें डराएगा नीला विशाल
जूतों की रुक जाती हुई आवाज़
हमें सहमाएगी
हम जान गए हैं
पीछे कौन है
जो हमारे चुप होते ही चल पड़ता है

मृत्यु आती है
फिसलकर धड़ाम् गिरती है और मर जाती है
हम उसके ज़िंदा होने का इंतिज़ार करते हैं रोज़
कि कल एक तितली हमारे ऊपर टिमटिमाएगी
और हम फूलों में बिल्लियाँ नहलाते हुए
इस तरह जाएँगे इस दुनिया से
जैसे धूल में गिरने से बच्चे के खिलौने को लग गई हो कोई गहरी चोट।


सत्यव्रत रजक [जन्म : 2006] की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। इससे पूर्व उनकी कविताएँ ‘समालोचन’, ‘वागर्थ’ और ‘हिन्दवी’ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुई हैं और उन्होंने हमारे काव्य-अचरज, काव्य-विचलन और काव्य-समय तीनों पर ही एक नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया है। सत्यव्रत की कविताएँ समकालीन यथार्थ को किसी घोषणापरक मुद्रा में नहीं; बल्कि उसकी दरारों, मौनों और अंतर्विरोधों के भीतर उतरकर देखती हैं। उनकी काव्य-भाषा अत्यंत प्रयोगधर्मी है और नारेबाज़ और फ़ैशनेबल विमर्शों के मारे अधेड़-अर्धअधेड़ कवियों को सहज ही अप्रासंगिक कर देती है। सत्यव्रत साधारण प्रतीत होने वाले बिंबों और अनुभवों से अर्थ की नई परतें निर्मित करते हैं। उनकी कविताएँ कोई तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं; वे प्रश्न, संघर्ष और व्याकुलता का स्पेस संभव करती हैं। कवि से satyavratrajak@gmail.com पर संवाद संभव है।

1 Comment

  1. Akhilesh singh जुलाई 28, 2026 at 8:03 पूर्वाह्न

    दूसरी कविता ‘रचना’ विशेष तौर पर अच्छी लगी। बाकी भी अच्छी हैं। कवि के पास इतनी कम उम्र में ही ‘ज्ञान’ बहुत अधिक है और अनायासपन कम। हालाँकि, कवि अपने एक ही जीवन में कई बार जन्म लेता है, इसीलिए किसी कवि के भविष्य आदि को लेकर की टिप्पणी स्वयं में हल्कापन है। फ़िलहाल, सत्यव्रत का स्वागत है, इन्हें पहले भी पढ़ा है।

    Reply

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *