कविताएँ ::
अजेय

अजेय

गिरना

पहाड़ चढ़ने को
हम बहुत
अहमियत नहीं देते

हमें याद है
कि हम चढ़ते हुए ही
यहाँ पहुँचे थे

हम सतर्क रहते हैं अलबत्ता
कि नीचे न गिरें
क्योंकि हम ऊपर रहते हैं

जीना

तुम मुझे गिन नहीं सकते
गिन कर क्या करूँगा

तुम मुझे नाप नहीं सकते
नाप कर क्या करूँगा

क्या मैं तुम्हें जान नहीं सकता
जान कर क्या करोगे

तुम मुझे जियो

तुम्हारे साथ

मैंने अपने हाथों में
पेड़ की शीतल टहनी पकड़ ली

मैं नंगे पाँव
ठंडी कच्ची मिट्टी पर खड़ा हो गया

मैं अपनी देह से कपड़े उतार कर
सुबह की किरणों के नीचे लेट गया

दिन भर हवाएँ चलती रहीं
शाम तक मैं जागता रहा
रात होने तक
मेरी उँगलियों से होकर
हरियाली
मेरी बाँहों और गर्दन तक
उतर आई
रात होने तक
मेरे पाँव मटमैले
और देह काली थी

रात होने तक
मेरी आँखों में सूरज का नूर था

तुम अलग हो

लोग मुझसे जवाब चाहते हैं
हाँ या नहीं
तुम मुझसे बस इतना चाहती हो
कि मैं सुनता रहूँ
यह बहुत अलग है
तुम्हारी संगत में मुझे बार-बार
अपने वे उत्तर रोकने पड़ते हैं
जो अनजाने ही
मेरी आदतों में ढल गए होंगे
कई बार लगता है
अगर मैं जल्दी बोल दूँ
तो वह आवाज़ छूट जाएगी
जिसे हम दोनों
सुनने की कोशिश कर रहे हैं
युगों से

तुम एकदम अलग हो
इसी ख़याल ने मुझमें
तुम्हारे लिए प्रेम रोप दिया था
वह चाहे बीज था
पनीरी थी
या क़लम थी
उसमें जो प्यारी आसक्ति थी
और उसने जो प्यारी तृप्ति दी थी
वह चाहे भ्रम ही था
और बहुत ही क्षणिक था
मुझको वह अच्छी लगी
और तुम भी

और
तुम स्त्री न सही
मेरे लिए एक ख़याल बनी रह सकती हो
बिना हड़बड़ाहट के
बिना संशय या संकोच के
हमारा प्रेम
पृथ्वी और मनुष्य के बीच
किसी अदृश्य पुल पर लेटा रह सकता है
उसकी सारी आवाजाहियों को दर्ज करते हुए

क़द्दावर मनुष्यों के साथ एक बहस

हम छोटे थे
इसलिए दरारों में जीवन देख लेते थे

तुम बड़े थे
तुमने दरारों में रास्ते देखे
फिर सुरंगें
और अंततः
पूरे पहाड़ को
दरार बना दिया

हम छोटे थे
इसलिए बीजों को
नाम से याद रखते थे

तुम बड़े थे
तुमने केवल जंगल देखे
और उन्हें लकड़ी मान लिया

हम छोटे थे
नदी पार करते समय
पानी से अनुमति लेते थे

तुम बड़े थे
तुमने नदी से पूछा ही नहीं
और उसका रास्ता बदल दिया

हम छोटे थे
हमारे पाँव
घास को याद रहते थे

तुम बड़े थे
तुम्हारे जूतों ने
मिट्टी की याददाश्त ही
मिटा दी

हम छोटे थे
हमारे लिए आकाश
उतना ही था
जितना पेड़ों के बीच से दिखता था

तुम बड़े थे
तुम्हें पूरा आकाश चाहिए था
और तुमने
सारे पेड़ काट दिए

हमने पहाड़ों पर
नए रास्ते नहीं बनाए
क्योंकि हमें पुराने रास्ते याद थे

बहुत कठिन नहीं है
हमारे दिलों को हासिल कर लेना
लगभग असंभव है
हमारी पात्रता हासिल करना
हम धरती के भीतर नहीं रहते
धरती हमारे भीतर रहती है
हम हिमालय के हैं
हिमालय हमारा नहीं है
उसका ऋण उतारने के लिए
हम कुछ देर के लिए यहाँ हैं
जितनी देर में तुम लोग यहाँ पहुँच जाओ
फिर हम दोनों मिलकर एक दूसरे को
मनुष्य मान लेंगे
सभी जानवर अंततः
एक दूसरे को मनुष्य मान लेते हैं
और सभी मनुष्य अंततः
जानवर हैं

सभ्यताएँ स्मारक बनाती हैं
हम विन्यास बदलते हैं
सभ्यताएँ हस्ताक्षर करती हैं
हम अपने पीछे
आपसदारी की विरासत छोड़ जाते हैं

हम इसलिए अदृश्य नहीं हैं
कि हम तुमसे नज़रें चुराते हैं
या तुम्हारी बनाई कोई भी चीज़ चुराते हैं

हम इसलिए अदृश्य नहीं हैं
कि हमें किसी क़िस्म की शर्म है
या कोई डर है
हम अदृश्य इसलिए हैं
कि हम अपने कारनामों का श्रेय नहीं लेते
जिस गाँव में किसी ने
अपने किए हुए का श्रेय नहीं लिया
उस गाँव से होकर शायद
कोई छोटे क़द का मनुष्य गया है।


अजेय [जन्म : 1965] हिंदी के सुपरिचित कवि-लेखक हैं। हिमालय उनके जीवन और काव्य दोनों में केंद्रीय स्थान रखता है। उनकी कविताएँ पर्वत और पर्वतीय जीवन को महज़ दृश्य भर हो जाने की विडंबना से उबारती हैं। यह संवेदनात्मक ज्ञान को सरलतम भाषा में व्यक्त करना है, और काफ़ी कठिन है। अजेय की तीन पुस्तकें—इन सपनों को कौन गाएगा, इस आदमी को बचाओ [कविता-संग्रह] और रोहतांग : आर-पार [कथेतर गद्य]—आधार प्रकाशन [पंचकूला] से प्रकाशित हैं। उनसे ajeyklg@gmail.com पर संवाद संभव है।

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