ग़ज़लें ::
शिरीष कुमार मौर्य

कैफ़ियत
कोह-ए-सुलेमान से कोह-ए-हिमाल तक तमद्दुन के ज़मीन-ओ-आसमान से सिर्फ़ तूफ़ान और बारिशें नहीं, इंसानियत के चाक पैरहन में लिपटी एक आवाज़ भी आती है। मैं इस आवाज़ को सुनता हूँ तो पाता हूँ कि ये पैरहन ग़ज़ल का है और चाक नहीं, ख़ासा ख़ूबसूरत है।
और ये जो दो जुड़वाँ बहनें हैं हिंदी और उर्दू, इन्हें इस शिल्प में कहने की कोशिश भर इस नाचीज़ या तो अफ़्क़र ने की है। यह एक समूची सांस्कृतिक विरासत है; जिसमें मिथक, प्रतीक और कहन के तरीक़े आपस में घुल-मिल गए हैं, सुना है समाजविज्ञान के विद्वान् इसे सात्मीकरण (Assimilation) कहते हैं।
मिरा तख़ल्लुस—जो ग़ज़लों में कहीं मिलेगा, कहीं नहीं—यूँ तो अफ़्क़र है, पर बह्र की ज़रूरिय्यात में वो कभी फ़क़ीर हो जाता है। कहीं मक़्ते नहीं भी होंगे। दुआ करता हूँ कि इतना भर Assimilation और क़ुबूल होगा आपको। मैं हिंदी का कवि हूँ, उर्दू का शाइर नहीं; पर मुझे नहीं लगता कि ये दो अलग लोग होते हैं या होने चाहिए।
उम्मीद है गुस्ताख़ियाँ मुआफ़ होंगी और पाठकों से कुछ नया सीखने को मिलेगा।
— शिरीष कुमार मौर्य
एक
ख़ुशियों का या ग़मों का होना हमीं से है
जन्नत हो या जहन्नुम सब कुछ यहीं से है
हस्ती है बस तुम्हारी दिल में ‘अज़ीम अब
क़ीमत मकान की भी जो है मकीं से है
जो उसने कह दिया वो मैंने भी सुन लिया
इतना ही लेना-देना सब्र-ओ-यक़ीं से है
जब से बहार आयी गुलशन उदास है
शिकवा भी कुछ इसे तो उस नाज़नीं से है
उस पार बैठता है कोई ख़ालिक़-ए-जहां
जो भी ग़लत हुआ है तो फिर वहीं से है
वो चांद आस्मां का जब छुप गया कहीं
इस रात में उजाला किसके जबीं से है
बंदों से है ख़ुदा की हस्ती पे नूर अब
उस आस्मां के जलवे जो हैं ज़मीं से हैं
चलती है कैसे जन्नत हमको नहीं ख़बर
ये कारोबार-ए-दुनिया शख़्स-ए-अमीं से है
दो
इक मुफ़लिसी का बच्चा भी ऐवान में पला
ऐसे ग़ज़ल का ख़्वाब ये ईरान में पला
आदम की हर कहानी बताती है दोस्तो
थोड़ा-सा प्यार भी दिल-ए-शैतान में पला
बच्चे बड़े हुए तो दिवारें खड़ी हुईं
फ़ितने का एक बीज भी दालान में पला
ऐसा नहीं कि सो ही रहा मैं तमाम शब
ख़्वाब-ए-सहर भी मेरे शबिस्तान में पला
जैसे कि शम्स कोई अंधेरे-से घर में हो
इक ख़्वाब-ए-इंक़लाब भी ज़िन्दान में पला
कोई ख़ुदा हो उसको ये दुनिया भी चाहिए
अल्लाह का नबी भी तो इंसान में पला
तीन
यूं अपना आसमान किसी ने कहा मुझे
इक शख़्स-ए-लामकान किसी ने कहा मुझे
मैं कुछ बना रहा था बना और कुछ मगर
क्यों ख़ालिक़-ए-जहान किसी ने कहा मुझे
ये मैं ही जानता हूं हवाएं किधर की थीं
कश्ती पे बादबान किसी ने कहा मुझे
मैं बोलता नहीं था रक़ीबों से बे-सबब
महफ़िल में बे-ज़ुबान किसी ने कहा मुझे
दौर-ए-ख़राब बुत में ही अल्लाह मिल गया
फिर मुझ को मेरी जान किसी ने कहा मुझे
मैं लिख रहा था ग़ाज़ा तो येरूशलम लिखा
हैरत से ते’हरान किसी ने कहा मुझे
दिल जुड़ गया मेरा तो ये आंखें छलक उठीं
सहरा में जब किसान किसी ने कहा मुझे
हाथी था जंगली मैं भटकना नसीब था
ख़ुद को मेरा अलान किसी ने कहा मुझे
यूं भी तो मैं ‘फ़क़ीर’ उसी की गली का था
मुझको गली की शान किसी ने कहा मुझे
चार
क्या जाने किसकी आ जा आ जा में आ गया
मैं जानता नहीं क्यों दुनिया में आ गया
सहरा-ए-दिल पे मेरे ऐसी थीं बारिशें
जो दूर था समन्दर दरिया में आ गया
वो मग़रिबी कुआं था ये मशरिक़ी धुंआ
येरूशलम का यीशू गाज़ा में आ गया
अल्लाह का फ़रिश्ता क्यों जानिब-ए-नबी
सारा ग़ुबार ले के का’बा में आ गया
ज़रख़ेज़ एक टुकड़ा दिल की ज़मीन का
देखो किसी की याद-ए-सहरा में आ गया
कुछ तो बदल गया था दिल मेरा दफ़’अतन
फिर से पुराने अपने शेवा में आ गया
कोई नहीं था मेरा दौर-ए-बहार भी
हमवार एक बुत था ख़ाना में आ गया
अफ़्क़र था इक गली थी फिर ये जहान था
उसका सदाएं देना चर्चा में आ गया
पाँच
वीरान रास्ते हैं मेरे गर्मियां भी हैं
मुझको पुकारने को नई नद्दियां भी हैं
आबाद शहर है जो तेरे मेरे दरमियां
उसके वजूद से ये परे बस्तियां भी हैं
हमको ही अब नदी का सफ़र कम’अज़ीज़ है
धारे हैं यूं रवां तो कई कश्तियां भी हैं
मेरा ही है कुसूर कि मैं साथ-साथ हूं
तेरा तो क्या है अब तो तेरी मर्ज़ियां भी हैं
बस अश्क भर नहीं हैं ये बहते हुए यहां
उस चश्म-ए-नम में आज कई बिजलियां भी हैं
सग हैं कई जो मुझको दिखाते हैं रास्ता
फिर राह काटने को यहां बिल्लियां भी है
ऐसा नहीं कि तुझको भी मेरी ख़बर नहीं
तेरी नज़र में मेरी कई अर्ज़ियां भी हैं
माथे पे चांद है तो तुझे वो पसन्द है
लेकिन गले में उसके कई हड्डियां भी हैं
कितने असोज1आश्विन मास शिवालिक या मध्य-हिमालयी इलाक़ों में सूखती घास को काट कर सर्दियों में पशुओं के खाने के लिए सहेजने का महीना है। यह शिवालिक की औरतों के लिए कमर-तोड़ मेहनत का महीना है। हैं कि जिन्हें काटना है अब
पूले हैं घास के तो नई रस्सियां भी हैं
मैं भी कहां से आया हूं किसका मुरीद हूं
कैसा फ़क़ीर हूं कि मेरी गद्दियां भी हैं
छह
जाते कहां हैं आप सफ़र जोगियों के हैं
ये राह और इन पे गुज़र जोगियों के हैं
ये आपकी गली है ये बाज़ार आपका
इन बस्तियों से दूर ही घर जोगियों के हैं
दिखते हैं बादलों से घिरे दूर जो कहीं
जंगल नहीं हैं वो तो नगर जोगियों के हैं
वो रक़्स आस्माँ पे किसी देवता का है
चिमटे जो बज रहे हैं इधर जोगियों के हैं
महके हैं आपके ये बदन किस गुमान से
ये सारी ख़ुश्बुएं ये इतर जोगियों के हैं
जोगी ही बन गया था कोई देवता यहां
उस देवता पे सारे असर जोगियों के हैं
कासे हैं हाथ में तो कहीं चाक पैरहन
दुनिया पे सब हुक़ूक़ मगर जोगियों के हैं
जिस राख ने जहां को बनाया बहिश्त है
उस राख में ही सारे बसर जोगियों के हैं
लगते हैं आपको जो समर आपके मगर
बस याद ये रहे कि शजर जोगियों के हैं
क्या जानिए ये कैसा गणित है जहान का
हासिल हैं आपके तो सिफ़र जोगियों के हैं
सात
जो भी है सो इधर तो इन्हीं जोगड़ों का है
हमको ख़ुदा पे शक है यक़ीं जोगड़ों का है
अल्लाह आसमान पे क़ाबिज़ तो है उधर
लेकिन ये इख़्तियार-ए-ज़मीं जोगड़ों का है
बुत हैं तो ये ख़ुदा है हरम भी हैं दैर भी
जिसका भी हो मकान मकीं जोगड़ों का है
लिपटा हुआ वो राख में दिखता है हर जगह
मरते हो जिसपे माह-जबीं जोगड़ों का है
जीते है आप लोग फ़क़त इस जहान में
जीना तो दूर और कहीं जोगड़ों का है
चलते हैं तीर तो भी ग़ज़ल के लिबास में
सय्याद का नहीं ये कमीं जोगड़ों का है
जगमग हैं रात भर जो हनेरे में बस्तियां
जितना भी है कमाल हमीं जोगड़ों का है
चलते हैं रात भर जो ग़म-ए-दिल निथार कर
दिल का चराग़ है तो उन्हीं जोगड़ों का है
अफ़्क़र तू ही तो है ये तेरा ख़ानदान है
शजरे में देख नाम कहीं जोगड़ों का है
आठ
धूप में हैं पड़े मेरी रातों के पर
नोच डाले किसी ने ये ख़्वाबों के पर
पहले उड़ते थे वो हर समय साथ में
अब तो खुलते नहीं हम-ख़यालों के पर
ये हवाएं ही क़ातिल हैं परवाज़ की
इन हवाओं में झड़ते हैं चिड़ियों के पर
मैं ही आया नहीं उनकी हर बात में
फड़फड़ाए बहुत उनकी बातों के पर
गर्मियां आ गईं आस्मां तप गया
ये पंखे हैं या हम बे-क़रारों के पर
अपने दिल के परिन्दे को समझाइए
कट चुके हैं यहां पे हज़ारों के पर
मैंने बारिश में ग़ज़लों को परवाज़ दी
धूप से ही चुराए थे लफ़्ज़ों के पर
घोंसले में रहा कोई बच्चा यहां
आस्मां पे थे उसकी निगाहों के पर
मैं शजर हूं शजर कोई उड़ता नहीं
फड़फड़ाए भले लाख पत्तों के पर
कितनी सड़कों के अरमान कुचले गए
गाड़ियों पे उगे आज शहरों के पर
बे-ख़बर थे तो था इस ज़मीं पर अमन
ख़ून बरसा गए ख़ास ख़बरों के पर
उड़ चले लोग फिर वादी-ए-इश्क़ में
है बदन ख़ाक का और कपड़ों के पर
कोई अफ़्क़र से पूछे कि सोया कहां
कर रहे थे हवा क्या सितारों के पर
नौ
कि जिस दुकान पे शाइर ने कंघियां बेचीं
उसी दुकान पे हमने तो कॉपियां बेचीं
वो सोचता है फ़क़त रेत बेचता है वो
वो जानता ही नहीं उसने नद्दियां बेचीं
समझते थे जिसे राह-ए-सुख़न थी कब फिर वो
बनाई राह नई और गाड़ियां बेचीं
ज़ुबां-दराज़ हुआ जाता है अगर बच्चा
उसी के बाप ने सड़कों पे गालियां बेचीं
ख़रीदने के लिए शाह की तरफ़दारी
ग़लीज लोग थे अपनी ही बच्चियां बेचीं
गुनाह ये भी हमारे परबतों पर देखा
पकड़-पकड़ के किसी ने हैं तितलियां बेचीं
कमा जो कुछ न सके नाम पर अगर अपने
किसी का नाम लिखा और तख़्तियां बेचीं
ये राह-ए-हक पे हुआ और इसका ग़म है अब
फ़क़ीर मार दिए और आबिदा बेचीं
यही सुख़न है हमारा यही तो हासिल है
हमीं ने सहरा चुना और कश्तियां बेचीं
फ़क़ीर ने भी तो ब्योपार ही किया लेकिन
ख़रीदने को ये कासा वो बस्तियां बेचीं
दस
उनको दाढ़ी पे रंग-ए-हिना चाहिए
उम्र-ए-रफ़्ता को कुछ तो अदा चाहिए
आस्मां पर ख़ुदा याद तक अब नहीं
और सबको ज़मीं पर ख़ुदा चाहिए
मैं मनाने की आदत न भूलूं कभी
कोई मुझको भी शख़्स-ए-ख़फ़ा चाहिए
आज मंज़िल की चाहत तो जाती रही
पांव को अब यहां आबला चाहिए
मेरे सिर पे ही गंगा उतरती रही
आब मुझको किसी से तो क्या चाहिए
फिर रहा हूं वही चांद सिर पर लिए
अब तो आ जा कि इसको घटा चाहिए
मैं पुकारूं तुझे आज गंधार में
ये ही सुर तो गले में सधा चाहिए
कुछ तो पंचम में कोयल ने मुझसे कहा
शुद्ध धैवत का अब आसरा चाहिए
थाट कल्याण हो शाम शब में ढले
राग कोई मुझे सांवला चाहिए
बिल्लियों की तरह शब गुज़रती रही
सग उठा दर पे भैरव का सा चाहिए
कश्तियों के मुसाफ़िर से पूछे कोई
क्या ज़मीं पे तुम्हें आसरा चाहिए
सब ही करने लगे मेरी दिल-जोई अब
यार कोई मुझे दिल-जला चाहिए
मैं तमद्दुन का राही हूं डूबूं जहां
मुझको गंगा नहीं दाबका2जिम कार्बेट बाघ अभयारण्य रामनगर में एक ग्रामीण बरसाती नदी। चाहिए
एक ज़ेर-ए-बहस बस रहूं मैं रवां
कौन कहता है कि फ़ैसला चाहिए
आज अफ़्क़र के कासे में कुछ भी नहीं
थक के आया है ये बिस्तरा चाहिए
ग्यारह
इक वा’क़िआ लिखूं कि कोई हादसा लिखूं
मुश्किल में पड़ गया हूं मैं आज क्या लिखूं
तुम भी लिखो मुझे भी यूं फ़ारसी में अब
फिर नागरी में मैं भी कुछ रेख़्ता लिखूं
मेरी ग़ज़ल में हैं जो आहू का क्या करूं
इक बाघ का अगर मैं बस नक्श-ए-पा लिखूं
देखूं मैं बंदगी के सारे रिवाज़-ओ-रस्म
अल्लाह में है कितना अब हौसला लिखूं
लिखना है ज़िन्दगी के पेड़ों पे तब्सिरा
मुरझाए हैं लिखूं कि बस काटना लिखूं
लिक्खूं न हाल-ए-जन्नत कार-ए-जहां कहूं
इन मंज़िलों का क्या है बस रास्ता लिखूं
बस इक किताब की है तबलीग़ हर तरफ़
जो छप रही है उस पर मैं तब्सिरा लिखूं
मैं क्या करूं कि अर्ज़ी मेरी क़ुबूल हो
मैं इश्क़ भर लिखूं या नाम-ए-ख़ुदा लिखूं
रातों की मेरी अब तक कोरी सलेट पर
जागूं मैं चौंक कर फिर इक ख़्वाब-सा लिखूं
ये हाथ भर नहीं है दस्त-ए-फ़क़ीर है
कासा रखूं कि इस पे कोई दुआ लिखूं
बारह
हैं गर्मियां तो गूल3खेतों में मेड़ों के बीच या बाग़ों में पेड़ों के बीच पानी के लिए बहुत छोटी-सी नहर। बनानी ही चाहिए
अब तो शजर को आपसे पानी ही चाहिए
रातों के बीच यूं ही भटकने के दौर में
तारों की एक नेक निशानी ही चाहिए
मंज़ूर है ये आपकी सारी सितमगरी
रस्म-ए-जहान है तो निभानी ही चाहिए
तेरी गली की ये भी कोई रस्म है नई
जां चाहिए इसे तो निशानी ही चाहिए
गर सिलसिला वही है तो रहना है चुप भला
बातें हैं गर नयी तो बतानी ही चाहिए
खेतों को यूं ही ख़ाली भी रखना गुनाह है
मिट्टी में कोई पौध लगानी ही चाहिए
क़िस्से सुना रहे हैं सभी लोग अब मुझे
इस ज़िन्दगी को आज कहानी ही चाहिए
मत रोकिए इसे कि कहीं सूख जाएगा
दरिया को राह-ओ-रस्म-ए-रवानी ही चाहिए
वीरान आस्मां के तले चांद देखकर
उठती है गर जो पीर दबानी ही चाहिए
तेरा फ़क़ीर हूं तो ये तू ने ही दी मुझे
कासे में जो गदा है वो खानी ही चाहिए
तेरह
ग़ुस्ताख़ी-ए-बशर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
इस बे-समर शजर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
राहों में साथ दे न वो मुश्किल में हौसला
ऐसे तो हमसफ़र की मुआफ़ी करे ख़ुदा
कहने नहीं थे पर यूं ही हम शेर कह चले
रुस्वाई-ए-हुनर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
जिस पर मिरे जबीं का ये दाग़-ए-लहू पड़ा
उस एक संग-ए-दर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
इक रम्ज़ मेरे दिल की पता सबको चल गई
हर सू मेरी ख़बर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
मैं तो तवाफ़-ए-वक़्त से बाहर निकल गया
इस रात इस सहर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
जैसी इधर है ख़ल्क़ ये मैंने बनाई है
मुझको मगर उधर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
अश्कों के बीच भी है ये आतिश छुपी हुई
इस आब में शरर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
जाना पड़ा पलट के ही आख़िर फ़क़ीर को
महबूब तेरे घर की मुआफ़ी करे ख़ुदा
चौदह
कहीं रुकूं तो ये तौहीन-ए-शान होती है
सफ़र दराज़ है मुझको थकान होती है
कहीं पे बैठ के तुम ग़म का तब्सिरा कर लो
गली-गली में खुली ये दुकान होती है
दिलों को रम्ज़ में यूं ही पुकार लेने दो
नमाज़ छोड़ दो लेकिन अज़ान होती है
किसी मकान में रहते हैं रात भर हम भी
ख़ुदाई शान मगर ला-मकान होती है
कोई पुकार के कहता है हर ख़ुशी अपनी
किसी की पीर बड़ी बे-ज़ुबान होती है
कोई ज़मीन पे खाता है ठोकरें इतनी
किसी के पास हवाई उड़ान होती है
फ़क़ीर का भी कोई राज़-ए-ज़िन्दगी होगा
वगरना किसकी गदाई में शान होती है
पंद्रह
कितने हसीन ख़्वाब हवा ले गई कहीं
हाथों से सब गुलाब हवा ले गई कहीं
हाथों में मेरे कैसा ये पंजाब रह गया
इससे दिल-ए-चनाब हवा ले गई कहीं
अब गूंजती हैं गोलियां वादी में हर तरफ़
अफ़्ग़ान के रबाब हवा ले गई कहीं
मदहोश करती थी जो मुझे हर निगाह से
उस आंख की शराब हवा ले गई कहीं
सहरा में बारिशों का भी कितना करें गुमां
क्या खोजना जनाब हवा ले गई कहीं
जलता था इक दिया-सा जो दिल में कहीं यहां
वो रश्क-ए-आफ़ताब हवा ले गई कहीं
जिस पेड़ पर हमेश से हज़रत को फ़ख़्र था
उस पेड़ के सराब हवा ले गई कहीं
मैं गर ज़कात दूं तो मैं कैसी ज़कात दूं
मेरा तो हर निसाब हवा ले गई कहीं
रहबर के साथ नारा-ए-तकबीर भी लगा
रहबर का ज़िंदाबाद हवा ले गई कहीं
उसमें हिसाब-ए-दर्द-ए-बशर दर्ज़ था मगर
मुफ़्ती से वो किताब हवा ले गई कहीं
तेरे भी सब सितारे ही खोए नहीं यहां
मेरा भी माहताब हवा ले गई कहीं
कुछ तुमसे ले गई ये जो अफ़्क़र सही-ग़लत
उनसे भी हर हिसाब हवा ले गई कहीं
शिरीष कुमार मौर्य सुपरिचित हिंदी कवि-आलोचक-अनुवादक हैं। यहाँ प्रस्तुत ग़ज़लें उनकी कविता-सृष्टि का नव्य, प्रयोगमय और अनुपम विस्तार हैं। इनमें न कथित हिंदी-ग़ज़ल की संदिग्धता है, न भारतीय उर्दू-ग़ज़ल की संकीर्णता। कवि से और परिचय के लिए यहाँ देखिए : राग पूरबी | रितुरैण