कविताएँ ::
हर्ष पाठक

पोखर के गीत
अमूमन जब भी कोई
गीत लिखा जाता है तब
वह एक खोज ही होता है
यथार्थ के कंधे पर
कल्पना की बंदूक़ रखकर
गोली दाग़ने जैसी
आवाज़ आती है शब्दों से
और कई कविताओं के
चीथड़े दीखते हैं दूर-दूर तक
किंतु पोखर के गीतों में
कल्पना का कोई स्थान नहीं
वास्तविकता वहाँ
कुंडली जमाए बैठी रहती है
अधेड़ स्त्रियों की भद्दी आवाज़ में
पोखर के गीत
कोहबर में बैठकर
एक नए रागाविष्कार की तरह कौंधे होंगे
समाई होगी उन स्त्रियों के
हृदय की करुणा
उबाऊ और बेसुरे गीतों में
वे पुरुषों के जीवन का वैविध्य और
स्त्री-जीवन की निराशा के संगम से
पोखर-किनारे की सींकों से रचे गए होंगे
टूटी चारपाई के पटिए पर
स्त्रियाँ अपने गीतों में रच ही लेती हैं
अपनी सारी संभावना
आश्चर्य कि कहीं कोई आवाज़ नहीं आती
सिवाय पोखर के गीतों के!
यह समय
इस समय
कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है
लेकिन अच्छा दिखाई दे रहा है
अच्छा दिखाई देना
अच्छा लगना नहीं होता
किताबें देखता हूँ तो
उबकाई आती है
और बैठा रहता हूँ ख़ाली तो
जीवन ख़ाली दिखाई देने लगता है
जैसे हमने कितनों को खोया है
कितने बहुत दूर चले गए
किसी के स्पर्श से
हम रह गए महरूम
और किसी से मिलना तो
असंभव-सा हो गया है
दो लोग जो ज़माने से छिपकर मिलते थे
उनका न मिलना
ज़माने की उम्र में कमी ला सकता है
घोड़े के खुर से रौंदा हुआ लगता है दिन
और शाम घुप्प अँधेरा लाने को आतुर
दुःखों को एकटक देखते रात कट जाती है
मारे डर के टीवी नहीं खोलता हूँ
कि कहीं कुछ भयावह न सुनना पड़ जाए
अख़बार का संपादकीय पृष्ठ
लिखा गया होता है
अधिनायक की बड़ाई में
आईटी सेल की नाकामी
कुछ जलने से रोक देती है मेरे भीतर
इस समय
जैसे जीवन से हताश निराश लोग
आशा का ऑक्सीजन खोजते हैं
कविताएँ लिखने के लिए
वैसे ही शब्द खोज रहा हूँ मैं
दुःख, मृत्यु, उदासी…
इन शब्दों से नहीं रच सकता
मैं कविता
मेरी धमनियाँ प्यासी हैं
थोड़े-से जीवन की
इतना जीवन कि
अगला शेखी न बघार सके…
जीवन कुछ नहीं है
अरे, जीवन सूखने में भी है!
आकर लेट जाता हूँ
नींद की खोह में
बहा देता हूँ चादरों को
अपने ऊपर से
मैं घिरा हुआ हूँ
खुलना चाहता हूँ
इसे ख़बर मानकर फैला दो—
मुझमें कुछ सूख रहा है…
उदास लोग
हम उदास लोग हैं
और हमारी दुनिया अलग है
हम उदासी पोसते हैं
उसे इंच-दर-इंच बढ़ते हुए देखते हैं
हमारे अंदर लज्जा की सीमा
एक निश्चित बिंदु पर
आकर सरक गई है
हम पलकें झपकाते हैं तो
हमारा अंधा अतीत
हमें चबा जाने को आतुर रहता है
शब्द जिन्हें हम परोस देना चाहते हैं
बासी लगते हैं
ऊर्जा निशाना साधे
मचान पर से उठती है
और धम्म से पीठ के बल
ज़मीन पर धूल खा जाती है
हम उठते हैं तो सिर चकराता है
हम एक सोची-समझी बिसात हैं
स्मृतियों के दौरान
अपने ही द्वारा निर्मित
व्याकरण में संधि-से टूटते हैं
हमारे अंदर का कलरव
चुपचाप धूप में भीगता है
हम मैले-कुचैले परदों से अपना
गंदा मुँह पोंछ लेते हैं
हमारे हिसाब से
दुनिया केवल और केवल बढ़ती है
हमारे लिए यह रुकी नहीं कभी
सूखी दूब,
चमकती ओस,
बेतरतीब सुबह,
उजाड़ रास्ते,
नुकीले कंकड़
और उदास कवि…
इन सबका सिमटना
अचकचाहट पैदा करता है
फुनगी न बन सके इनके लिए
हम तहों में दब जाते हैं
दरारों में फँस जाते हैं
और घाटियों में धँस जाते हैं
और उचकते रहते हैं
एक शृंखलाबद्ध दुनिया पाने को
जो हमारे क़दमों पर चले
तुम डरोगे एक दिन
जब हम बनाएँगे आकाश दुबारा
तुम हँसोगे हम पर
जब हम आंदोलन करेंगे
उदास रहने के हक़ के लिए
तुम स्वयं पर चीख़ोगे-चिल्लाओगे
दिनों-दिन हमारी बढ़ती जमात देखकर
हम ऐसा करना नहीं चाहते
पर क्या करें
हम उदास लोग हैं और
हमारी दुनिया बहुत अलग है।
उदासी
एक शहर खाँसता है
लड़खड़ाता है उसमें
चौड़े कंधों का कूड़ा-करकट
दम भरता है दुम हिलाता कुत्ता
और नाख़ून मार लेता है ख़ुद को ही
ढिबरियाँ हाँफती हैं शहर की
और थक-हारकर बेहोश हो जाती हैं
मुझे धुँधला दिखता है
तुम ही देखो
मुँह अँधेरे कौन
मुँह उठाए
चली आ रही है?
ख़ुशी की पैमाइश
कई भाइयों ने देखा
मेरी अनुपस्थिति में उपजा ख़ालीपन
जोकि कुछ नहीं है
उनके भूले-भटके मन की
दुर्गति के सिवाय
वह सब छोड़ो
इधर ध्यान दो
काफ़ी उथल-पुथल है
इस गोलाई में
जैसे दोग़ले चाँद पर खुदे निशान
सूरज के कानों में कच्चा माल
ग्लोब में दुनिया जितनी छोटी दिखती है
क्या वाक़ई में है?
सूरज का यौवन मई में दिखता है
नहर का पानी सिंचाई के बाद आता है
और रात गहरी होती है तो
मन की बिवाई के सिले जाने की
गुंजाइश रहती है
मेरे माथे पर गिरता है
नमी बनाए रखने के लिए
मैदान पर छिड़का गया पानी
पर मुझे कहीं भी
कुछ भी भिगो नहीं पाता
कुछ छीना जा रहा है मुझसे
और सबमें बारी-बारी से बाँट दिया जा रहा है
मेरी आवाज़ को नोचा जा रहा है
आँखों की रेत कौन देख पाता है
मेरे पास कुछ है भी तो नहीं
केवल कविता के दम पर
कब तक लड़ता रहूँगा?
लगता है इस झुंड से निकलकर
एक दिन बुत हो जाऊँगा
जैसे हुआ हूँ पशु
दस्तावेज़ तैयार नहीं है
फिर भी कह रहा हूँ कि
बुत होना ही पड़ेगा
कमरे में मुँह पर हाथ रखकर
ज़ोर से चीख़ रहा हूँ—
मैं बहुत ख़ुश हूँ
मैं अकेला नहीं हूँ
सब मेरे मन का भ्रम है
मैं कहीं से दुत्कारा नहीं गया हूँ…
मैं अब सच में ख़ुश हूँ कि
दुबारा किसी ने नहीं सुनी मेरी चीख़ें
मेरी ख़ुशी की पैमाइश का आँकड़ा
केवल रात के पास दर्ज है।
आयाम का चुनाव
हम सुलगते रहेंगे
ताउम्र बिना चिंगारियों के
बादल झरता रहेगा
एक छलनी से छाने जाने तक
सड़क का डामर पैर को
काला कर देगा
और चिपककर फ़र्श पर
घर में फ़ैल जाएगा।
यह दुनिया
ग्लोब में भी
सुलगती हुई
सिगरेट की तरह है
यह रोशनी नहीं
सबको
अपने हिस्से से
अधिक चाहिए होता है
एक आयाम चुनना होता है
हमने सुलगना चुना
हम झड़ जाएँगे
दियासलाई से चिपकी
राख की तरह
फिर भी
कुछ देर
जलते रहेंगे।
हर्ष पाठक [जन्म : 2001] की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ ‘सदानीरा’ को सुपरिचित कवि-लेखक बसंत त्रिपाठी के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं, इस परिचय के साथ—“हर्ष पाठक बिल्कुल नए कवि हैं। अब तक कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। वह सिद्धार्थनगर [उत्तर प्रदेश] से हैं और फ़िलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। मुझे ये कविताएँ अच्छी लगी सो भेज रहा हूँ। उनसे pathakkarharsh9670@gmail.com पर संभव है।”