कविताएँ ::
हनीफ़ ख़ान

हनीफ़ ख़ान

संगीत

मैंने संगीत को जाना
पत्थर को साँचे में ढालने वाली
बाबा की उस हथौड़ी की ताल से
जो बिना थमे दिन भर चलती

उस हथौड़ी की धुन को
केवल मजूर जानता है

उसमें गूँज थी
पर साथ बँधे थे
उसमें कुछ दृश्य मेरे भी
मेरी बहनों के भी
ख़्वाब-से उभरते
धुँधले-से दृश्य

इन दृश्यों के बीच
एक अदद हथौड़ी
दिन भर गाती रही

हर ठनक में बसती थी ज़िंदगी
हर चोट में गूँजता था साहस

पत्थर टूटता
बनता साँचा
बजती धुन
स त त…

याद

मैं क्या कहूँ कि तुम्हें भूल चुका हूँ
पर ऐसा नहीं है
अगर मैं पचहत्तर की उम्र में लिखना चाहूँ
अपने जीवन का सिंहावलोकन
उसमें पाँच दशकों तक तुम्हारा ज़िक्र होगा
कैसे भुला सकता हूँ आख़िर!

भूलना एक क्रिया है
लेकिन तुम्हारी याद
भविष्य की एक संज्ञा है
जो सदा साथ रहेगी

मैं अनभिज्ञ था प्रेम से
पर फिर भी
एक नौसिखिये ग़ोताख़ोर की तरह
प्रेम के समुद्र में ग़ोता लगाता रहा

तुम्हारा प्रेम
एक मोती की तरह था
समुद्र की कोख में…

सिंध

मैं एक समय संपूर्ण सिंध था
मेरे नाम से हिंद आबाद हुआ
मेरे सीने में लहू की तरह
सतलुज, ब्यास, चेनाब, रावी, झेलम बहती थीं
सोने के समान थार का अविभाजित मरुस्थल था
मेरे नाम से न जाने क्या-क्या आबाद था
सिंधी लोग, ऊँट, अजरक, मूमल-महेंद्र का प्यार
और भी बहुत कुछ…
अचानक चली एक हवा ने
रसलीन के ‘अंगदर्पण’ के समान
मेरे शरीर को बाँट डाला

बँटवारे के क़त्ल-ओ-आम में
मैंने शांति की मिसाल पेश की
जब ट्रेनों में लाशें जा रही थीं
उस समय भी मैंने
अपनी साँसों में मनुष्यता को बचाए रखा
मैंने ऐसे रिश्तों को टूटने से बचा लिया
जो काँच के समान साबित हुए
जो हवा मात्र से बिखर सकते थे
फिर भी मैंने अपना धैर्य नहीं खोया

मेरी बातें झूठी हो सकती हैं
लेकिन झूठे नहीं हो सकते
सिंध में होने वाले बहन-बेटियों के विवाह
तपते रेगिस्तान के माँदला गाँव जाते समय
लोगों द्वारा राहगीरों को पानी पिलाना भी सच है

मेरा एक जगह से दूसरी जगह जाना
झूठ नहीं हो सकता
मैं अब भी ज़िंदा हूँ
पश्चिम के हरेक इलाक़े की उस साँस में
जिसने मुझे अभी तक बचाए रखा

मैं आज भी जिंदा हूँ
मैं सिंध बोल रहा हूँ।

थार की बेटी

इस दुःख का कोई पार नहीं
इसके भागीदार
सिर्फ़ जीवित ही नहीं
मृत लोग भी हैं

न तो प्यार ही मिला
न ही प्यार करने का अधिकार

माँ बताती है कि
गर्मियों के दिन थे
मैं पाँचवें दर्ज़े में थी
अपने पड़ोस में रहने वाले बच्चों के साथ
गुड्डा-गुड़िया खेल रही थी
तब मुझे बताया गया कि
मैं फ़लाँ के साथ सात जन्मों तक रहूँगी
मैं ख़ुशी से झूम उठी
मुझे घर के आँगन में खेलने का
एक साथी जो मिल गया था

लेकिन माँ ने यह नहीं बताया
कि मेरे प्यार करने पर
दुनिया को देखने पर
वादे करने के अधिकार पर
प्रतिबंध लगा दिया गया है
और नहीं लागू होगा जीवन में
कभी कोई अनुच्छेद-21

मैं किसी वस्तु के समान थी
जिसे समय आने पर
कहीं और स्थानांतरित करना था

अब समाज की नज़रों में
मुझे सीधा चलना था
एकदम नाक की सीध में

मैं चाहती तो भाग सकती थी ज़िम्मेदारियों से
जी सकती थी अपने हिस्से का जीवन
दावा कर सकती थी उन अधिकारों का
जो मिले थे फ़्रांस की क्रांति के समय

पर मेरा भाग जाना
उस समाज में कलंक था
जिसके हिस्से की भी समझदारी
मुझमें ही निहित थी।


हनीफ़ ख़ान [जन्म : 2001] की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह जैसलमेर [राजस्थान] से हैं और फ़िलहाल जामिया मिल्लिया इस्लामिया [नई दिल्ली] के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। उनसे koharihanif@gmail.com पर संवाद संभव है।

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *