कविताएँ ::
गोविंद निषाद

गोविंद निषाद

जर्जर रिक्शा

पिता पार चले गए
जीवन की अनंतता से
लेकिन छोड़ गए अपना सपना
मेरी आँखों में

अब मैं सोता हूँ
मेरे सपने में आता है
उनका रिक्शा

मैं पूछता हूँ
यह बात कितनी अच्छी है
कि हम तकनीक के शिखर पर सवार हैं
लेकिन क्यों दबे हुए हैं
सदियों पुराने रूढ़िवादी मूल्यों से
क्या वहाँ नवाचार नहीं चाहिए?

अगर है कोई जवाब
तो ज़रूर बताइएगा
मेरा पता
सड़क के फुटपाथ पर खड़ा
जर्जर रिक्शा है।

प्रोफ़ेसर गोविंद रथ के लिए

अ. क्या यह प्रोफ़ेसर हैं?

मैं जब भी गुज़रूँगा
उस सड़क पर
जिसके किनारे
एक मकान में रहा करते थे
एक दुबले-पतले आदमी

किसी ने एक दिन मुझसे पूछा था
कौन हैं ये?

मैंने कहा,
प्रोफ़ेसर रथ

यह प्रोफ़ेसर हैं
लगता तो नहीं…

मैंने कहा,
लगने से क्या होता है

उसने कहा,
होता है
जब धूप होती है तो लगती है
जब बरसात होती है तो लगती है
जब आग होती है तो लगती है

मैंने कहा,
हाँ, वह लगते तो हैं प्रोफ़ेसर
इसलिए कि
दूर पेड़ों से वीरान जगह पर
वह छाया बनकर खड़े रहते हैं
बाढ़ में नाव बनकर
और आग में पानी
तो ऐसे हैं
प्रोफ़ेसर रथ

उसने कहा,
वाह! क्या बात है

मैंने कहा,
हाँ, यही बात है।

ब. रमता जोगी, बहता पानी

वह जब भी मिले
चलते हुए मिले
अपनी धुन में मस्त
धुनी रमाए जैसे चला जा रहा हो कोई जोगी
सारंगी बजाता हुआ
किसी परम ज्ञान की खोज में
यह गाता हुआ
कि उड़ जइहै सुगनवा एक दिन पिंजड़वा के छोड़ के…

यह सिखाता हुआ कि
जब भी जाना लोगों के बीच
उनके हो जाना
भूल जाना तुम कौन‌ हो
कहाँ से आए हो
क्या करते हो…

फिर तुम बनोगे मनुष्य
मनुष्य बनते ही
आत्मा और परमात्मा में नहीं रह जाएगा कोई भेद
तब सृजित होगा कोई ज्ञान
तब तुम हो जाओगे विद्वान्
इसलिए जीवन में सबसे पहले मनुष्य बनना
रिसर्च स्कॉलर नहीं।

स. अमरता

स्मृतियों का परिंदा जब भी गुज़रेगा
सेमिनार कक्ष से
मुझे याद आएगा गुज़र गया वह बादल
जो पूछता था कि
इसमें प्यास कहाँ है?

फिर बताता था
तुम इसे इस तरह देखो
वह आदमी बहुत प्यासा है
इसके लिए तुम्हें ठीक दक्षिण में मिलेगा पानी
किसी बैगा आदिवासी के घर में
तुम उसके घर जाओ
पूछो कि क्या वह दो घूँट पानी दे देगा
जब तुम प्यासे को पिला देना वह पानी
फिर उसकी प्यास बदल जाएगी
एक थिएरी में
जो तुम्हें अमर कर सकती है।

लाश

भीतर तंबाकू नहीं
जल रही हैं मेरी हड्डियाँ
भीतर मेरी लाश‌ भरी हुई है

जब भी बुझने को होती है सिगरेट
मैं एक ज़ोर का कस लेता हूँ
कि मेरी लाश क़रीने से जले
शेष न रह जाए
शरीर का कोई हिस्सा।

मछुआरा

मछुआरा जब जाल डालता है
तब होता है बड़े ही इत्मीनान में
वह इंतज़ार करता है मछली का
इंतज़ार कभी एक पल
कभी एक पहर
कभी पूरा दिन
वह नहीं थकता
अपने इंतज़ार से
उसको भरोसा है
एक दिन
ऐसी मछली ज़रूर फँसेगी
जो उसके दुखों के सारे जाल काट देगी।

मृत्यु

हम नदी को
एक रोज़ विकास में बदल देंगे
और जश्न मनाएँगे कि
देखो-देखो मछली नहीं
मल्लाह मारा गया।

ज़रूरत

जब मैं गिरा कुएँ में
मुझे रस्सी की याद आई
मैं डूबा नदी में
मुझे नाव की याद आई
मैं उदास हुआ
मुझे दोस्त की याद आई
मैं बीमार हुआ
मुझे दवा की याद आई
मुझे प्यास लगी
पानी की याद आई
मुझे गर्मी लगी
सर्दी की याद आई

इस तरह ही मुझे याद आए लोग
हमेशा मैंने याद किया उन्हें ज़रूरत में
सोचता हूँ
अगर ज़रूरतें न होतीं तो क्या होता
मैं किसी को याद करता
हाँ शायद तभी
जब मुझे ज़रूरत होती

मैं चाहता हूँ
दुनिया में सब कुछ ख़त्म हो जाए
ज़रूरतें कभी ख़त्म नहीं होनी चाहिए
वहीं हमें मिलाएँगी
इसके बावजूद कि
ज़रूरतें स्वार्थी होने का पर्याय हैं।


गोविंद निषाद की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह चौथा अवसर है। इस बीच उन्होंने भिन्न-भिन्न साहित्यिक विधाओं में भरपूर लिखाई की है। यह प्रसन्नता की बात है कि यह लेखन हिंदी के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण प्रकाशन-स्थलों पर प्रमुखता से प्रकाशित हुआ और हो रहा है। लिखने-पढ़ने और काम करने के संसार में यह संलग्नता और सक्रियता गोविंद को इस दौर में उल्लेखनीय बनाती है। वह अभी से रीढ़ खो चुके जनसंपर्कवादी नवोदितों से बिल्कुल अलग हैं। उनसे और परिचय तथा ‘सदानीरा’ पर इस प्रस्तुति से पूर्व प्रकाशित उनकी कविताओं के लिए यहाँ देखें : अगम्य अँधेरे में वह‌ खड़ा है शांतकुछ लोगों के नदी पर आने से | आज़ादी की स्मृतियों में

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