कविताएँ ::
विनय सौरभ

सहिष्णु
उनकी शैक्षणिक डिग्रियों पर मत जाओ
अब यह बहस पुरानी और बेमानी हो चुकी है
उन दिनों उसके कपड़ों पर भी ख़ून के छीटें थे
और वे ख़ूब चमक रहे थे
और जिनकी याद अब भी देश के ज़ेहन से गई नहीं है
फिर भी वह संसद की चौखट तक पहुँचा
उसने देश को मंदिर कहा
ख़ुद को सेवक और
भावुक होते हुए एक नदी को अपनी माँ कहा
याद है तुम्हें?
उस वक़्त वह किसी दार्शनिक की तरह
अनंत शांति में दिखा था
देश के लिए कृतज्ञ, व्याकुल और बेचैन
इस तरह से उसने संसद की गरिमा बढ़ाई
और फिर देश को धीरे-धीरे बदलते देश ने देखा
यह जो सात हत्याओं में शामिल समाजसेवी
तुम्हारे सूबे की सबसे ऊँची कुर्सी पर
क़ाबिज़ हो गया है
इसे तुम्हें बर्दाश्त करना ही होगा
क्योंकि तुम सहिष्णु हो,
बर्दाश्त करना सीख गए हो!
प्रधानमंत्री की डिग्री
यह वह दौर था
जब न्यायपालिका की भूमिका भी
धीरे-धीरे बदलती हुई दिख रही थी
उनके अजीब-ओ-ग़रीब फ़ैसले
विस्मित कर देते थे पूरे देश को
पर इस मसले पर मुझे इतना ही कहना है कि
तुम्हें एक प्रधानमंत्री की डिग्री में
इतनी दिलचस्पी क्यों है?
तुम क्यों उसके पीछे
हाथ धोकर पड़ गए हो?
वह नहीं दिखाता
इसके पीछे कोई कारण होगा
इस कारण को तुम जानते हो
फिर भी ज़िद ठाने बैठे हो
तुम नेहरू की डिग्री क्यों नहीं देखना चाहते?
क्या तुमने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ पढ़ ली है?
और वे बाक़ी पंद्रह प्रधानमंत्रियों की डिग्रियाँ
कभी तुमने उनकी डिग्रियों को लेकर
कोई बावेला नहीं मचाया
कोई जिज्ञासा भी नहीं व्यक्त की
कभी उत्सुक नहीं हुए तुम
यह नाइंसाफ़ी है
वह इतना बढ़िया भाषण देता है
देश से मन की बात कहता है
बस थोड़ी मुश्किल है कि
कई मौक़ों पर चुप लगा जाता है
वह मणिपुर नहीं जाता
पर पत्रकारों को शॉल भेंट करता है और
गरिमा से भर कर मुस्कुराता रहता है
वह रोज़ नए कपड़े पहनता है
दुनिया भर की यात्राएँ करता है
पर दुख है कि कहीं पहुँच नहीं पाता
लेकिन राष्ट्राध्यक्षों से मिलने के समय
उसका हुलसना तुम्हें विस्मित कर सकता है
और तो और जब वह कहता है कि
देश के हर प्रांत से
उसके ताल्लुक़ात कितने पुराने हैं
तो उस समय तुम्हें पैदल चलकर
दुनिया नाप लेने वाले किसी
ऐतिहासिक चरित्र की याद आती होगी
लेकिन हद तो यह है कि आज़ाद भारत में
परिधानों से सबसे गहरा प्रेम करने वाले
प्रधानमंत्री के ड्रेसिंग-सेंस की
तुम कभी तारीफ़ नहीं करते
ख़ैर, मैं फिर कहता हूँ
उसकी डिग्री में ऐसा क्या देख लोगे
कि चैन से सो पाओगे
आख़िर न्यायालय ने जब कह दिया कि
कतिपय स्थितियों में उसकी डिग्रियाँ
सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं
यह निजता का मामला है
तो ज़िद न करो
कोर्ट के माननीयों ने कुछ सोचकर ही कहा होगा
क़ानून और अधिकारों की
किसी पृष्ठभूमि में ही कहा होगा
हाई-वे पर खड़ी पुलिस तो नहीं हो तुम
जो किसी भी गाड़ी को रोक लेती है हाथ देकर
कहती है कि दिखाओ
अपनी गाड़ी के सारे काग़ज़ात
तो सब कुछ सही रहते हुए भी
सहमे हुए से तुम
कैसे उसके चेहरे की तरफ़ ताकने लगते हो
और जिनके पास डिग्रियाँ हैं
उन्हें ही कौन पूछ रहा है इस देश में
वे धकियाए जा रहे हैं बरसों पढ़ाने के बाद
विश्वविद्यालयों से और कई दूसरी नौकरियों से
डिग्रियाँ ही तो हैं इस देश में
सबसे उपेक्षित और किनारे पड़ती हुईं
सड़ती हुईं समय के साथ
लंबी लाइनों में लगी हुईं ऊबती हुईं
आत्महत्याएँ करती हुईं!
भाई, वह प्रधानमंत्री है…
कोई चपरासी क्लर्क और मास्टर नहीं
माननीय उच्च न्यायालय की थोड़ी क़द्र करो
जब उसने कहा है कि
सार्वजनिक नहीं होंगी प्रधानमंत्री की डिग्रियाँ
तो उसके पीछे कोई दर्शन होगा
कोई लोकहित ही होगा देश का
नादान मत बनो
क्या करोगे देखकर उसकी डिग्रियाँ
अब क्या ही बाक़ी रह गया है देखने को
जब तुमने उसका सब कुछ देख ही लिया है।
अभिनय
अपने चुनावी दौरे में
वे उस माँ के पैरों पर झुके
जिसकी बेटी की बलात्कार के बाद
हत्या कर दी गई थी
उनका झुकना…
यह दृश्य अप्रत्याशित था
उनकी भावुकता
पश्चाताप
एक स्त्री के लिए सम्मान
और सहानुभूति का यह रूप देखकर
हमें हैरान हो जाना पड़ा
यह तीसरे दर्जे का हास्यास्पद अभिनय था
छी: आप यहाँ तक आ पहुँचे!
कठुआ और हाथरस और मणिपुर की
उन लड़कियों की भी माँएँ थीं
वहाँ नहीं गए?
उन माँओं के पैरों पर नहीं झुके?
चुनाव आते ही
उन जैसों के अंदर का ‘मनुष्य’ कैसे जाग जाता है!
वे नित नए रंग बदलते हैं
और देश भयाक्रांत हो उठता है
कहाँ से लाते हैं ऐसे लोग इतनी क्षुद्रताएँ!
ऐसी बेहयाई
ऐसी बेशर्मी
क्या उनकी आँखों में
थोड़ा भी पानी नहीं बचा?
उनका अभिनय पहचाना जा चुका है
यह जानते हुए भी वे रोज़ नया भेष धरते हैं
लेकिन बेनक़ाब हो जाते हैं
सब कहते हैं कि उनकी आँखें
एक शिकारी की आँखें हैं
उन जैसों की हँसी में कितनी विरूपता है
कितने क्रूर लगते हैं वे
जब यह कहते हैं—
देश सर्वोपरि है!
विनय सौरभ से परिचय के लिए यहाँ देखिए : दयाशंकर चक्रपाणि का जीवन