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कविता कादम्बरी

कविता कादम्बरी

पलायन

एक चक्रवात उठता है
पाँव से सीने की तरफ़

मरोड़ता है
मथता है
हर रोज़

साझी स्मृतियों के गहरे समंदर में
जो तुम्हें शंख, सीप, माणिक, मोती दिखते हैं
वे तीव्र आलोड़न के साथ
छीलते हुए देह
छेदते हुए आत्म
क्रूर, नुकीले कंकड़-पत्थर ही महसूस हुए हैं

लहूलुहान, आक्रांत
कंकड़-पत्थरों की पीठ पर चलकर
पार हो जाने के प्रयास में
मेरे रक्तरंजित पाँव ही
मेरे पलायन के अपराधी होने का साक्ष्य हैं

जबकि प्रलय की तमाम
आशंकाओं के बीच भी
मेरे आने और निभाने के चिह्न
कितने अदृश्य और अमान्य हैं

आधा हिंदू, आधा मुसलमान

एक

गाँव-गिराँव से दूर
इलाहाबाद में
जब भी ज़रूरत हुई
भाई के साथ की
पिता के बग़ल में खड़े मिले
नन्हे मियाँ

जब भी पुलिसिया नौकरी के द्वंद्वों में उलझे
तो अच्छे मियाँ का हाथ रहा दोनों कंधों पर

पिता ने अनगिनत बार बताया कि
कैसे मन्नान मियाँ को
उनके ही छोटे भाई ने गोली मारी
और अस्पताल में बिस्तर पर लेटे हुए भी उन्होंने पूछा—
‘छोटे भाई ने खाना खाया कि नहीं?’

बज्र सूखे में भी
इन्हीं बातों ने
दिल की मिट्टी को नम रखा

मैं दो छोटे भाइयों की अकेली बड़ी बहन
बहनों के होने का करम समझ पाई
उसी मेड़वारा गाँव में

अज़रा दीदी, नग़मा दीदी,
इफ़्फ़त, राहत और फ़रहीन के साथ

सुर्ख़ा अमरूद के बगीचे में घूमते हुए
सबसे सुर्ख़-मीठे अमरूद मैंने ही खाए

मटर के खेतों की सबसे मीठी फलियाँ
मेरे ही हिस्से रखी गईं

और बत्तख़ों के सबसे बड़े अंडे
मेरी ही रकाबी में आए

गर्मी की रातों में आँगन में
एक चारपाई पर घुस-घुसकर लेटे हुए
दुनिया-जहान की बातें करते-करते
ज़ुबानों पर जाने कब अदला-बदली हुई—
‘या अल्लाह’ और ‘भगवान क़सम’ की

घर पर सत्यनारायण की कथा का प्रसाद
साथ-साथ बनाते
दाल-भात का कौर साझा करते हुए
हम एक दूसरे की मांस-मज्जा में घुलकर
आधे हिंदू और आधे मुसलमान हुए

मेरे इंसान बनने का यही
छोटा-सा इतिहास है
शहर का नाम बदलने से
यह कैसे बदलेगा?

दो

गाँव के दिनों को याद करते हुए
सोचती हूँ कि वे भी क्या दिन थे!
हिंदुओं के पूरे गाँव के बीचोबीच
बस एक मुसलमान परिवार
गुदरी चाचा और मैमून फुआ का
जिनके आँगन में खेलते हुए
हमारे फ्रॉक की झोलियाँ
भूँजे और देशी गुड़ से भर जाती थीं

उस आँगन से इस आँगन में खाते-खेलते
पूरे घर-आँगन में बिखर जाते थे बहुत दाने
जिसे बुहारते हुए माँ कहती थी—
‘आज घर भर में बिया छीटाइल ह
देखिह जा बड़-बड़ गाँछ लहलहा जाई’
(आज घर भर में बीज छीटे-बिखेरे गए हैं,
देखना बड़े-बड़े पेड़ लहलहा जाएँगे)

…और माँ की बात कितनी सच थी

आज भी जब टी.वी. पर
धर्म, दंगा, हिंदू, मुसलमान, ख़तरा… की चीख़ उठती है
जब कुछ लोग कहने लगते हैं
कि हमें एक-दूसरे से डरना चाहिए
वे ही दाने बीज बनकर उग आते हैं
घने दरख़्त बनकर छा जाते हैं
सिर के ऊपर
जिन पर मुहब्बत की बुलबुलें
घोंसला बनाकर रहती हैं
और मेरे भीतर का आधा हिंदू
और आधा मुसलमान
एक दूसरे का हाथ
और भी प्रेम और आश्वस्ति से थाम लेते हैं

धार्मिक देश में अपराध नहीं होते हैं

एक

बलात्कारी का कलंक माथे पर लगाए
सलाख़ों के पीछे ही मर गए कितने बेगुनाह

न जाने कितने विष्णुओं, बोदुओं और तौक़ीरों ने
अपनी उम्र से बड़ी क़ैद काटी

‘बाइज़्ज़त’ बरी होकर लौटे तो
बूढ़े पिताओं ने तालाब में कूदकर
दे दी थी जान

माँएँ विलपते हुए मर गईं
मानसिक संतुलन खोकर
सालों से गुमशुदा थी बीवी
बेटे न्यूमोनिया के इलाज के बिना मर गए
और बेटियों को बहका ले गए दलाल
कलकत्ता की गलियों में

दो

वे जो हत्या और बलात्कार के सिद्ध अपराधी थे
उन्होंने चंदन-त्रिपुंड की तरह
उसे माथे पर धारण किया

गीता पर हाथ रखकर क़सम खाई
और उनका जघन्यतम अपराध
धार्मिक उपलब्धियों में तब्दील हो गया

उनके शिश्नों पर चढ़ाई गईं
बड़ी-बड़ी मालाएँ
बाँटें गए नैवेद्य
शौर्य की गाथाएँ गाई गईं
और शिश्नों की तस्वीरों को मढ़वाकर
पूजा-घरों में रखा गया
कि बच्चे बड़े हों तो
धर्म-अधर्म का फ़र्क़ कर सकें

तीन

ऐसा ही होता है कि
बंद पट्टी के आगे
चलते हैं कितने ही खेल
कितने ही खटकों की आवाज़ आती है

इत्मीनान से खोली जाती हैं हथकड़ियाँ
और फेंक दी जाती हैं
तराज़ू के अपने वाले पलड़े पर

अब जेलों के टूटने की
ख़बरें कहाँ आती हैं!

जेलों की चाभियाँ
धर्म और धनपशुओं के कूल्हों के
नीचे से निकलती हैं
खुल जाते हैं सब द्वार

…और क़ानून की देवी
अपने कपड़े सँभालते हुए
भकुआई खड़ी रहती है

चार

जेलें जो अपराधियों से ख़ाली रह गई हैं
इसका अर्थ यह भी तो हो सकता है
कि अपराधों में कमी आई है

और यह भी कि जेलें
अब अपराधियों से ख़ाली हों
निरपराधियों से भर गई हैं

और यह भी कि जेलें अब
दीन-दयालुओं की सेवादारी का
अड्डा बन गई हैं
जहाँ मुफ़्त में रोटी, कपड़े, छत
और ‘धर्म की शिक्षा’ का इंतज़ाम किया जाता है
भूखों, नंगों और अधर्मियों के लिए

गर्भगृह का देवता

गंध, धूप, धुआँ, सीलन…

उमस से उकताकर
बीमार होकर मर जाने के भय से
वह बाहर निकल आया है

परिक्रमण पथ के स्तंभों पर बनी
मांसल देहों के बीच अपनी तस्वीरें खोज रहा है!

नहीं मिल रही तो!
नाख़ूनों से खरोंचकर
उन पर अपना चिह्न
अंकित करना चाहता है!

अकुलाहट में

घुप्प अँधेरे में
इस देह की भीत के भीतर
बार-बार हाथ लगा रहा है

खोज रहा है
प्रेम की विविध भंगिमाओं के चित्र
अंक में भींच लेने की इच्छाओं का चिह्न!

उसके व्याकुल हाथों से लगकर
ताखे की भुक्क-भुक्क करती
आख़िरी ढिबरी भी गिरकर फूट गई है

उसकी भूख नैवेद्य भरे थालों से कम नहीं होती
उसकी अकुलाहट नहीं दबती
अपराध क्षमा की स्तुतियों से

यथा :
‘देव! कुछ चेहरे परिक्रमण पथ के स्तंभों पर शोभा नहीं देते।
प्रभु! सभी दीपक भीतों पर नहीं रखे जाते।’

वह कहता है :
‘देवता होने और क़ैदी होने में
आस्था भर का ही फ़र्क़ है’

‘मुझे मुक्त करो देवी’

‘मुक्त करो’

‘मुक्त करो’

इग्नोर इट

एक

प्रेम कहने वाले
सूक्ष्मदर्शी लेकर आए
वे मेरी कविताओं की
पड़ताल कर लेना चाहते थे
कि कहीं किसी कोने में
छुपकर बैठा न हो कोई और पुरुष
वे बुहारकर निकाल देना चाहते थे
हर ‘अवांछित’ तत्त्व
जो मुझमें जज़्ब रहा

उनके हाथों में भारी-भरकम ज़ंजीरें थी
कि मेरी कोई भी यात्रा
उनकी देहरी के पार न जा सके

उनके हाथों में अटूट ताले थे
मेरी क़ैंची ज़ुबान के लिए
जो भव्य बाज़ारों से मोल लिए गए थे

उनके हाथों में प्रेम के आदर्शों की लंबी फ़ेहरिस्त थी
गहरी नींद और बीमारी से झकझोरकर
मुझे बार-बार उठाया गया

प्रेम की उनकी तमाम परीक्षाओं के लिए
जिन्हें रट लिया जाना अपेक्षित था

उन्होंने प्रेम के बड़े और
वैभवशाली स्कीमों के पोस्टर छपवाए
स्टार मार्क के साथ

उन्होंने प्रेम में टकराव की स्थिति में
धर्मग्रंथों की क़समें खाईं

प्रेम साबित करने को उन्होंने
बंदूक़ों की बटों पर हाथ रखा

प्रेमालाप के दौरान उन्होंने पूजा-स्थलों के
टूटने और बनने पर गीत गाए

प्रेम में डूबकर वे भूल गए
पिता के शव पर खेलते दुधमुँहे बच्चे के बारे में

प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों में
वे इंसान के इंसान का दुश्मन होने का
मुहावरा दुहराते रहे

प्रेम मेरे जीवन में ऐसे ही उतरा
ज्यों ख़ूबसूरत घाटियों में उतरती है दहशतगर्दी

मैं प्रेम की तमाम दहशतगर्दियों से भागती रही दूर

दो

और तुम—
मेरी ठंडी-सीली यात्राओं के अद्भुत साथी
ज्वर से तपती इस देह के लिए
जितनी बार जलाते हो अलाव
मैं उड़ेल देती हूँ पानी

गीली राख तुम्हारी आँखों में
गहरी निराशाओं की तरह बैठ रही है
परत-दर-परत

फिर भी जितनी बार मुझे देखते हो
तुम्हारी उदास आँखों में
पूरी उष्ण-आर्द्रता के साथ उमगता है प्रेम
और घास के मैदानों पर ओस बिखर जाती है

तमाम निराशाओं से घिरकर भी
दुःख मोल लेने का तुम्हारा हौसला
‘इग्नोर इट’ कह देने भर से नहीं भूलता

हा! मैं क्या करूँ
मैं प्रेम से भागी हुई स्त्री हूँ
तुम्हारी ‘ख़ालिस’ प्रेम भरी आँखों में
देखने से डरती हूँ

बंजर होने का घोषणापत्र

मिट्टी की देह बंजर ही रहने दो
मैंने नहीं स्वीकारे बीज
धतूरे के

कितने ही बाज़ार से लौटे प्रेमियों ने
रोपने चाहे अपने होंठों के गुलाब
मेरे माथे पर

मैंने उनके हाथ देखे
वे किसान नहीं थे

और उनकी देह
इत्र के भभके से भरी हुई थी

मेरी मिट्टी ने नहीं दी उन्हें
एक रोप की भी जगह

बच्चों का भूख से मर जाना
जब रोज़मर्रा की ख़बर हो
तब बाज़ार की बेहयाई ही है
गुलाबों की खेती

मेरी मिट्टी ने रास्ता देखा
धान के बीज से भरे
एक किसानी हाथ का

मेरे माथे ने प्रार्थना की
कि छूट जाएँ कुछ चिह्न उन पर
एक किसानी गीत के

लेकिन
धरती के भू-मानचित्र पर
कोई किसान बचा हो तभी तो लौटे!

धरतीख़ोरों ने उन्हें ढकेल दिया है गर्त में
भू-मानचित्र की सीमाओं के बाहर

और अब मेरे माथे पर उग आईं
बड़ी-बड़ी दरारें
बंजर होने का मेरा आख़िरी घोषणापत्र हैं


कविता कादम्बरी की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं। उन्होंने समकालीन कविता के दो मुख्य पैमानों—जिनमें से एक विचलित करने और दूसरा चौंकाने से संबंधित है—के पार जाते हुए एक नए काव्यानुभव के लिए विवश और प्रेरित किया था। यहाँ से होते हुए उनकी कविताओं ने एक व्यापक प्रसार ग्रहण किया, लेकिन कविता कादम्बरी की यहाँ प्रस्तुत नई कविताएँ बताती हैं कि काव्य-प्राप्तियों से अछूता और अप्रभावित रहना भी एक बड़ी विशेषता है। कहना न होगा कि इधर दुर्लभ हो चली यह विशेषता ही है जो कवि और कविता दोनों को ही नष्ट होने से बचाती है।

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