लंबी कविताएँ ::
वीरू सोनकर

वीरू सोनकर

वे अकाल के दिन थे

एक

दूर-दूर तक कहीं कोई
राहत का कुआँ न था
था एक घड़ा मिट्टी का
जितनी प्यास उतरती गले में
उससे भी कम जल तैरता
घड़े के भीतर
वे अकाल के दिन थे

रोटियाँ सूखी ही थीं
उन्हें पानी में भिगोकर
खाने की यादें देकर
पुरखे हुए रुख़्सत

गर्मी के पसीने में भीगी नींद थी
थकान इतनी भारी चीज़ थी
कि स्वप्न में टहल रही
एक देह तक को घेरे रहती
हर चमकती चीज़ को देखकर
ख़ुद पर ही तरस आता

मैं कैसे और किस उम्मीद की बिना पर रोप दिया गया था गर्भ में
पता नहीं!

दो

मेरा वज़न है कुल चौवन किलो
या कहो कि अपने होने की ग्लानि है
कुल चौवन किलो
वासना और भूख और जीवन को जी लेने इच्छा
बस उतनी ही
जितनी होती है सबके पास

अपने होने की धूप में नहीं हुआ रंग काला
पीड़ा से हुआ

प्रेम रहा अपूर्ण हमेशा
बात बस इतनी नहीं कि
सब ऊबते थे मुझसे एक दिन
मैं ख़ुद ही बता देता कि जेब फटी है मेरी
और श्मशान से बदतर है मेरा घर

हड्डियों पर मांस नहीं चढ़ा
उन पर खिले यातना के सूखे फूल

रक्त हमेशा रहा गाढ़ा
पानी की प्यास बनी रही बदस्तूर

मैंने पृथ्वी की धुरी पर बाँधी अपनी पालथी
नदी को लपेटा
अपने स्वप्नों के चारों ओर

जहाँ सब चुप
वहाँ रोप दिए अपने कान।

तीन

मै उदासी का पहला चेहरा हूँ
धरती पर सारे वन-बैल हैं मेरे रक्त-संबंधी
वे सारी निगाहें मेरी हैं
जो टँगी हैं अपने-अपने निशानों पर

मै ही हूँ जिसने चखा था
सबसे पहले वासना का स्वाद
मैने ही जाना था शून्य में होना
मृत होने से बहुत अलग है

मैने भाषा को बरता निहायत अनाड़ी होकर

मैं भाषा में जितनी बार कहता हूँ—मैं
अर्थ चीख़ते हैं
वाक्य से बाहर आकर—
हम! हम! हम!

चार

फिर लौटती है मुझमें तरकीब
फिर लौटता है भूला हुआ दृश्य
फिर से उभरती है एक नदी
फिर से शीतलता का मरहम लगता है देह पर
फिर से दिखने लगता है
दुख की नाव पर बैठा हुआ अतीत
फिर से उगता है छाती पर एक बहुत बड़ा पहाड़
फिर से भूलता हूँ भाषा
अवाक् रहने के लिए कोई कला नहीं चाहिए
चाहिए होता है एक अभिशप्त जीवन

फिर गिरती है छल की धूप देह पर
लोक-कथाओं से भटककर
याद का एक अपशगुनी कौआ
बैठता है पुरानी मुँडेर पर
फिर उठता है सुनसान सड़क से ऊब का उत्सव
और घेरता है वह पूरा परिसर
जो मिथक कथाओं के सुखांत से है
बेतरह चिढ़ा हुआ

एकांत का कुआँ और गहरा हुआ है
डूब की इस चीत्कार को नहीं चाहिए
अब कोई भाषा।

पाँच

फिर नहीं दिखते समीप के प्रलोभन
स्त्री की याद कभी अकेली नहीं आती
साथ लौटते हैं इच्छाओं के मौसम
अधूरी वासना से भीगे स्वप्न
और एकांत का नमक
त्याग दिए जाने के विष में बुझा
कोई तीर फिर से लौटता है
ठीक अपने निशाने पर

यह संसार बहुत सारे
आदर्शों-विश्वासों-वादों से बँधा है
फिर भी कोई भूलता नहीं अपना निशाना

जो एकांतजीवी हैं पूछो उनसे
न काटे जाने वाले दिनों में
कितना ही याद आए पुरखे!

छह

जिह्वा पर महसूस होता है
कि काश मिलता अजन्मे होने का सुख

पैर के अँगूठे टटोलते हैं भूमि
भूमि समझती है
खुरचे जाने की भाषा में
मौजूद है
एक अकेला पड़ गया मनुष्य

कहीं कोई न्याय नहीं
आशा से भरे कल की टूटती किरचें फैलती हैं
एक न दिखते दृश्य में
अँधेरा ध्यान से देखने पर
फिर उभरती है उस पर
दृश्य की छटपटाहट

यूँ ही कोई कैसे ग़ायब हो जाए

यह जो दुख आ रहा है सामने से
वह पहले भी आया है कई बार

मैं उसे ठीक से जानता हूँ, समकालीनो!

सुख हारा है हर बार दुख से
दुख एक मौलिक योद्धा है—
लगभग अपराजित
उसके लौटने की बारंबारता में ही है
जीवन का जंगल
लय का नदी होना
हवा की धीमी चाल है

दुख को अभ्यास है
सबसे गोपनीय जगहों पर भी सेंध लगाने का।

सात

दुख जीवन के सिरहाने खड़ा बेताल है
वह काटे नहीं कटेगा

दुख के पास प्रश्न हैं
पर वह गूँगे का गला है

अपने होने के हड़कंप के साथ
वह लौटता है
फिर-फिर!
जीवन के बरामदे में अकेले देर रात सुबकता
वह ढूँढ़ता है कह देने की भाषा
वह गूँगे का गला है
चीख़ने की तमाम कलाओं का अकेला ज्ञाता

उसके घर कोई नहीं जाता
वह सबके घर हो आता

मैं ठहरा निहायत नंगा और वबाली
प्रार्थनाओं के सात्विक शिल्प में
मैंने बकी हैं अनगिनत गालियाँ

अड़ियल के हिस्से में आते हैं
और भी अधिक अनुशासन

बेंत की मार थोड़ा और सख़्त
पीठ कुछ और होती है पत्थर
आँखों में यातना की पुतली कुछ और चमकदार

फिर कोलाहल
फिर हुंकार
फिर आदिमयुग के कारागार से निकल भागा एक बैल
सड़क पर अकेले दौड़ने के उसके नवाचार से भयभीत हैं
कई सभ्य!

वह दिशाहीन और अदम्य…
छल के विरुद्ध वह और क्या ही करे?

वे अकाल के दिन थे
और मैं पाया गया
बहुत सारे विरोधाभासों के साथ
तर्क की चादर से हर बार बाहर निकलता था मेरा पैर

शून्य की स्लेट पर उभरती थी
कोई लिखावट
उसे पढ़ने की झोंक में
मैं देर तक रोकता अपना मूतना भी

वे अकाल के दिन थे
समकालीनो,
वे थे मेरी निपट मूर्खता के दिन।

आठ

अब मुझे घेरेंगे उपहास
मेरी मनुष्यता का संज्ञान नहीं लेगा कोई

स्थायित्व के सारे इलाक़े को तोड़ती
लय की पहली उपासक पृथ्वी लेगी
मेरी विकलता का संज्ञान

वह मेरे बाद मेरी भटक को टाँग देगी
आकाश के वाष्प पर
हर ठहरे हुए को बताएगी भाषा के बग़ैर
भटकने के भीतर छुपा है जीवन का तात्पर्य

वह हर डूब के भीतर चुप की पुकार लगाएगी

यहाँ इच्छाओं के मृग दौड़ते हैं अनवरत
बताएगी सबसे मूल्यवान है स्मृति
इसे खोने के बाद नहीं बनती कोई कल्पना

पानी के घाट पर चारों तरफ़ हैं प्रतीक्षित भूखे बाघ
यह वह समय नहीं है
कि मासूम मृगछौनों से किया जाए प्रेम
भूख बराबर शिकार!
याद है न जीवन जीने का अलिखित नियम?

नौ

मृत्यु एक घाट का नाम है समकालीनो,
बहुत भटककर क्या मिलता है
उसी घाट पर ठहरी एक नदी बताएगी

तुम्हें जब भी लगे
धार खो रही है कविता
देखना मुझे,
बोध के पत्थर पर
भाषा का चाक़ू पैना करते हुए।

दस

मैं उजाड़ में मिल गया
एक पुराने पानी का कुआँ हूँ
मुझे चखो,
जैसे चखते हो सुख को

यह कुआँ
अपनी जगत खो चुका है

वीराने का कोलाहल नहीं जमने देता
कुएँ की पीठ पर कोई अपशगुन
जैसे बचाए रखते हो तुम
अपनी इच्छाओं का कोई गीत
इस कुएँ ने पकड़ रखी है अपनी उपयोगिता

यह ख़ारिज करने का समय है
पर देखो, ख़ारिज नहीं होता कभी
कोई हिमकुंड, नदी या कोई उपेक्षित कुआँ!

भाषा से प्यार करने वाले घटते जाते हैं
बढ़ते जाते हैं चुप रहने के अलिखित नियम

वे अकाल के दिन थे
पर कोई भी नहीं देखता था खेतों की ओर

वे आधुनिक थे और नए के नाम पर ढूँढ़ते थे
ख़ुद का गला काटने के नए विचार!

वे भाषा को जानते थे
और भाषा के भीतर बेरहम तर्क को भी
चुप से उठा बोध
लौटता था उनके घर के दरवाज़े से

फिर और जानने की ज़िद छोड़ती थी
पृथ्वी का आँगन

फिर स्मृति के भयानक घेराव और हाहाकार के बीच जो
बचने की अकेली उम्मीद या कहूँ कला थी
उस बेहोश होने की इच्छा को भी विलंबित किया।

ग्यारह

वे अकाल के दिन थे और मैं जानता था
कि शोक का भी है अपना घनत्व
जीवन को सबसे कुशल तरीक़े से घेरता है शोक
और फिर यह भी कि
अनुपस्थिति का शोक
किसी अन्य उपस्थिति से नहीं होता विस्थापित

मैं अनंत की चक्करदार सीढ़ियों का प्रहरी हूँ

मैं दुख से नहीं थकता हूँ
पुराने पड़ते जाने की भी अपनी एक चमक होती है
मेरी त्वचा का रंग है तांबई
याद के पानी में पूरे शरीर से डूबी हुई
मेरी हड्डियों को नहीं भाता मीठे का स्वाद
जिह्वा पर चढ़कर बैठा है सभ्यता का कसैलापन

जीवन का स्वाद अब बदलता है
रेत के अँधेरे बियाबान में भटकते किसी सर्प में

मुस्कुराते हुए आदमी देखकर लगता है
कैक्टस की झाड़ी में उगा है पानी का कोई फूल
डँसने के डंक अब बहुत हुए ओ सभ्यता!

बारह

धनाढ्य को लगाता हूँ
फिर बेबस आर्द्र पुकार
फिर गुहार,
फिर पुकार,
बार-बार मनुहार!
मैं उसे विवरणों में समझाता
दान के अलौकिक लाभ में उलझाता
फिर उसकी चुप्पी को देता जी भरकर गालियाँ…
वो स्साला, कुत्ते की जात!
अकाल का अकेला हरामी बाप!

पर छोड़ो,
ख़ैर!
वे अकाल के दिन थे
और मेरा चेहरा दमक रहा था भूख की ज्वाला से
बस मैं ही जानता था पुरानी हो चुकी भूख के परिसर में नहीं घुसती कोई अन्य इच्छा

वे अकाल के दिन थे
हर संभावित पाप की लज्जा से लगभग मुक्त

मुझे याद आई स्त्रियाँ
बहुत भूखे होने पर भी जिन्हें पता होता है
भोजन का कोई गोपनीय जादुई उपाय

यह सुख है कि पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक फैली हैं अनगिनत स्त्रियाँ…

अन्यथा,
वे जो अकाल के दिन थे
वे साक्षात् काल के दिन थे!

जीवन सिर्फ़ सहने की याद न बन जाए

दाह के बाद मुझ पर चढ़ते हैं पुष्प
चढ़ता है दुग्धमिश्रित जल
मेरे सभी पुरखे मिलकर मुझे बनाते हैं
अगर कहूँ कि नींद और जाग के बीचोबीच
मुझे मिलती है गंध मानव-राख की
तो हाँ यह एक संशय के साथ-साथ
एक सच भी है

याद अब व्यक्तिगत नहीं रही
वह एक परंपरा में बदल रही है
जो मुझे पर नहीं बीता
वह भी है याद की क्रमबद्धता में क़ैद

भूगोल एक जाल में बदल गया है
इच्छा की पहली शर्त हो गई है अभिशप्त होना

तमाम विचार बस इतने ही कि मुझे कुछ नहीं मिलेगा
ख़ाली रह जाना एक विरासत की तरह लगता है

मैं अपने घेराव में घेरता हूँ दिशाओं की दूरियाँ
जहाँ तक देखता हूँ याद का उजाड़ दिखता है

कविता में त्यागता हूँ क्रमबद्धता
कि भूख और इच्छा कभी भी कहीं भी आ सकते हैं
तो कविता में क्यों नहीं?

गद्य की भाषा खोने की कगार पर खड़ा हूँ
कि कविता ने बस यही छीना मुझसे
लय का परिसर है ही इतना लुभावना
कि भाषा में नीरस होने के पाप से डर लगता है
जीवन की नीरसता से ज़्यादा डरता हूँ
जीवन के निरस्त होने से
भोगने की भट्टी से जो निकला बस यूँ ही नहीं गुज़रेगा
यह एक चमकीली पंक्ति है
पर ख़तरा तो है ही कि इस एक अदद वीरू सोनकर का जीवन कोई फ़रियादी फ़ाइल नहीं जो आपके सामने आई और निरस्त हो गई!

यह खेल नहीं है कि
व्यग्रता को अनसुना कर दें आप
पीड़ा को नाटक कहें
कवि को कहें कि इसकी कविता अपारंपरिक है
इसकी भाषा में ख़ुशामदी नहीं है?

इसकी भाषा के पैर तोड़ने होंगे
यह कैसे संभव है कि एक का अतीत महान्
और दूसरे का अतीत असंज्ञेय?

सब आप ही तय कर दे रहे हैं
यह भाषा के भीतर की भड़वागीरी है
सब आपसे ही शुरू है—यह मक्कारी है

जीवितों की देह पर बैठने लगी है राख
और आप कहते हैं कि लड़ाई अब शुरू हुई है?

इस चश्मे से बहुत पीछे तक नहीं देख सकते आप
भुगतने की पीड़ा बनती है हमारा चलचित्र
जहाँ आप तय करते हैं हमारी चुप्पी
हमें वहीं मिलती है भाषा

भाग्य-भाग्य कहकर आपने पीछे धकेला है विचार

हमारे अतीत और इस देश की सामूहिकता का
एक ही हथियार से किया है संहार
इतने बड़े संहारक हैं आप
और लज्जा फिर भी नहीं!

विचार का पहला दुख यह
कि उसे सुना ही नहीं गया
आदमी का पहला दुख
कि उसे गिना ही नहीं गया

जीवन सिर्फ़ सहने की याद बन जाए
उससे पहले याद करना होगा
कि वह सिर्फ़ याद है
जिसने हमे पशुता से आगे निकाला

आप लौटते हैं वहीं बार-बार!

समानता को लांछन की तरह
वे जब फेंकते हैं हमारी ओर
तब याद आता है
कि अब कह दिया जाए
जो आम्बेडकर को दे गाली
उस पर जूते से करो प्रहार

हम भाषा की मछली हैं
शब्द अभी तक चमकते हैं हमारी नींद में
अभी तक छिली हुई देह को
मिलता है मरहम स्वप्नों में

अभी तक इच्छा करने की हिमाक़त कर लेते हैं हम
आकाश पर अभी तक बनते हैं हमारे पुरखों के चित्र

अभी तक आते हैं हमारी आंखों में आँसू
पूरी परंपरा का ख़ून नमक बनकर घुला है
हमारे आँसुओं में

ऐसा क्या है आपके भीतर,
इस पर भी ग़ौर करे
कि जब-जब आपका न्याय
हमारे मुहल्ले में घुसता है
अन्याय हो जाता है!

सहने की याद आपके भीतर कैसे नहीं बनती?
और फिर वह क्या है जो आपने पाया और हमने खो दिया!

क्या इतना कठिन है
न्याय और अन्याय के बीच की रेखा को पहचानना?
फिर अंत में क्या मैं यह कहूँ कि आइने में छुपे हैं सब जवाब
आइना देखेंगे?

यह कैसी सीढ़ी है कि आप चढ़ते चले गए
और हम उतरते ही रहे

यह कैसी भाषा है कि हम यहाँ अब आए?

आपकी भाषा में बढ़ गई है काहिली
बढ़ गए हैं ढोंग
मिथकीय नौटंकी से भर गई है आपकी भाषा

अगर भाषा एक तलवार है
तो मैं मूठ पर जमाता हूँ अपना हाथ
यह तुमसे लड़ने के लिए नहीं है

हिंदी का अर्थ बस हिंदू होना नहीं
भूत-भभूत-टीका-मंत्र-तंत्र नहीं
मूठ पर हाथ है और मैं कह रहा हूँ तुमसे अशालीनो,
भाषा की पहली ज़रूरत है—
अपनी पीड़ा बताना और दूसरों की जानना…

यह याद रहे
मेरे समकालीनो,
ओ बहरो,
ओ चुप्पो,
अबे ओ शातिरो…
अनंत धिक्कारो के सुपात्रो!


वीरू सोनकर की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह तीसरा अवसर है। इससे पूर्व सितंबर 2018 और जनवरी 2019 में उनकी कविताएँ ‘सदानीरा’ पर आई थीं। इसके बाद उनकी कविताओं के दो संग्रह [मेरी राशि का अधिपति एक साँड है (2020) और मैं बेहोशी का एक पत्थर था (2025)] प्रसिद्ध हुए हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी दो लंबी कविताएँ विचलित और चकित एक साथ करती हैं। इनमें ग़ज़ब की उद्धरणीयता भी है और एक दुर्लभ सघनता भी। इस कवि-समय में वीरू की काव्य-प्रतिभा—काव्य-भाषा, काव्य-संवेदन और काव्य-आक्रोश तीनों ही स्तर पर—बहुत सशक्त है और फ़िलहाल इस मामले में उनके निकट और कोई नहीं है। वह प्रिकॉसिटी, एजेंडा और पोलेमिक होने की तीन अनिवार्य कवि-शर्तों का निर्वाह भी बहुत प्रभावी ढंग से करते हैं। उनकी कविता-सृष्टि में वाक्य-वैभव, उक्ति-प्रभाव और संदर्भनीयता का एक अद्वितीय संयोजन दृश्य होता है। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : यह कवियों के काम पर लौटने का समय है | ज़रूरी के लिए एक ग़ैरज़रूरी हाशिया

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