कविताएँ ::
प्रदीप सैनी

देखो
हर नए खिले फूल के खिलने में
सब कुछ नया है
अभी-अभी लिया गया चुम्बन
पुराने होंठों के लिए भी नया है
सदियों से बहती हुई नदी में
बहता हुआ पानी
हमेशा नया है
मिट्टी पर गिरे ताज़ा लहू को
अनदेखा मत करो
सदियों से हत्याओं के
एक अंतहीन सिलसिले के बावजूद
हर हत्या एक नई हत्या है
देखो,
उसका नए सिरे से विरोध करो।
एक सुंदर दिन का आख्यान
सुंदर दिन स्मृति में ज़िंदा रहते हैं
वहाँ उनसे कभी भी मिला जा सकता है
वह उनका स्थायी पता है
स्मृति के बाहर एक तो वे ठीक से पहचान में नहीं आते
और पहचान में आने पर
उनका स्मृति के बाहर ज़िंदा मिलना
हमें अचरज से भर देता है
ऐसा नहीं है कि वे विरल हों
अपने होने में कोई भी दिन सुंदर हो सकता है
लेकिन उसके होने में उसके आखेट की
असंख्य आशंकाएँ समाई रहती हैं
सुंदरता इतनी क्षणभंगुर होती है कि
एक पूरे दिन में
एक सुंदर दिन की सारी सुंदरता
किसी भी क्षण नष्ट हो सकती है
दुनिया के किसी भी हिस्से पर
जिस दिन भी गिरते हैं मिसाइल और बम
उनके गिरने से पहले हो सकता है
वह दिन एक सुंदर दिन रहा आया होता है
कितने ही सुंदर दिनों की अस्मत लूट ली जाती है
उनके जननांगों से रिसता हुआ ख़ून
एक पूरी ज़िंदगी की चादर पर
एक धब्बे की तरह चमकता रहता है
एक सुंदर दिन एक बच्ची की उँगली पकड़
स्कूल में झूला झूल रहा होता है और अचानक
मलबे में बदल गए स्कूल में दफ़्न हो जाता है
ऐसा भी नहीं कि किसी सुंदर दिन को सिर्फ़
युद्ध या अपराध या हादसे नष्ट करते हों
वह अन्याय, असमानता और अभाव से भरी इस दुनिया में
रोज़मर्रा की तुच्छ व्यवहारिकताओं की भेंट यूँ भी चढ़ जाता है
हर पल न जाने कितने सुंदर दिन
यहाँ-वहाँ नष्ट होते रहते हैं
यह दुनिया सुंदर दिनों की क़त्लगाह है
सुंदर दिनों की इस क़त्लगाह में
एक दिन हम मिले
हम चार थे और चार ही हो सकते थे
न गाड़ी में किसी पाँचवें के लिए जगह थी
और न ही उस कमरे में
जहाँ आने वाला समय हमें ले जाने वाला था
एक ऐसे दिन मिले हम
जिसके सुंदर हो सकने का
कोई अंदेशा नहीं था हमें
जो रात तक किधर भी जा सकता था
ख़राब कवियों की ख़राब कविताओं से ज़्यादा ख़राब होता हुआ
एक लार टपकाती औरत से बच पाने की जद्दोजहद से भरा हुआ
अनंत काल से दुखी शक्ल बनाए घूम रहे
एक किताबों के व्यापारी की मनहूसियत से बेज़ार
वह कुछ भी हो सकता था
झूठी तारीफ़ों, झूठी मुस्कुराहटों और हाथ मिलाने से ऊबा हुआ
पर उसने सफ़ेद और गुलाबी फूलों से लदे पेड़ों का साथ चुना
चुनी मद्धम आवाज़ में गाती हुई एक हरी नदी
वह जा पहुँचा एक हज़ार चार सौ साल से दम साधे खड़े एक मंदिर की चौखट
जिसकी परिक्रमा बच्चे साइकिल से कर रहे थे
जहाँ एक कुत्ता अपने आख़िरी दिनों में
ईश्वर के इतना पास होने पर भी
उसके वहाँ होने से बेपरवाह था
जैसे हम थे बेपरवाह इस बात से कि
सुंदर दिन के साथ इस ऊँचाई पर चढ़ते-चढ़ते
हमारे मुखौटे रास्ते में कहीं गिर गए थे
जिसका पता हमारे चेहरों से आकर टकराए
एक सर्द हवा के झोंके ने हमें दिया
और यह पता भी कि सर्द हवाओं के ख़िलाफ़
सिर्फ़ आग ही काम नहीं आती
भात और मांस भी आता है
मांस-भात खाकर जब हम मछली की तलाश में निकले
और उसे पा लेने की व्यग्रता से भरे हुए यहाँ-वहाँ भटक रहे थे
तभी सुंदर दिन ने हमें धीरे से बतलाया कि
अपनी संपूर्णता के लिए वह चाहता था एक सुंदर रात
जिसकी तलाश में वह हमें एक जंगल की तरफ़ ले गया
जंगल जो हमारे पुरखों का भी घर था कभी
हमें अचानक आए हुए देख थोड़ा सकपकाया
हमें डर से बचाने के उपक्रम में वह
अपने साथ खेल रहे भालू को कहीं छुपा आया
हमारा सुंदर दिन जंगल के भीतर से अपनी ढलती हुई शाम के रंगों को बर्फ़ से लदे हुए पहाड़ों पर बिखरते देख सोचने लगा कि जल्द ही वह सुंदर रात की गोद में सिर रखकर उसे बताएगा कि उसने अपनी सुंदरता को बचाने के लिए कितना लंबा सफ़र तय किया और यह भी कि सुंदरता को बचा पाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।
इस तरह हम एक सुंदर रात के इंतिज़ार से भर उठे और एक हल्की बेचैनी से घिर गए कि कई मर्तबा सुंदर चीज़ें अचानक खो जाती हैं।
हमारे पास सुंदर चीज़ों को ख़ुद से बर्बाद करने के असंख्य अनुभव थे और जिन इंतिज़ामात के साथ हम यहाँ तक पहुँचे थे उनके अपने जोखिम थे।
फिर हमारे सुंदर दिन से मिलने
एक सुंदर काली रात आई
जिसके अँधियारे में हम पर वह जादू नुमायाँ हुआ
जो दिन के उजाले में आँखों से ओझल था
सुंदर काली रात के आँचल में हम चारों
अपने संग-साथ में किसी तारामंडल की तरह चमक रहे थे
तब हमने जाना कि सुंदर दिन और सुंदर रातें
दुनिया की तमाम सुंदरता से नहीं
संग-साथ से सुंदर बनते हैं
जिस संग-साथ की रौशनी में हमने जाना
कि अंट-शंट बातों में बिताई गई रात भी
एक महान् कविता जितनी हसीन हो सकती है।
फ़िलहाल
कुछ कहना चाहता हूँ
जिसे कह नहीं पा रहा हूँ
एक अबूझ बड़बड़ाहट
लगातार चल रही है अंदर
उसे ठीक वैसे कहना चाहता हूँ
जैसे अंकुर के फूट पड़ने पर
धरती से कहता है एक बीज
या एक पौधा फूल की शक्ल में
हवा से कुछ कहता है
उसे वैसे भी कहा जा सकता है
जैसे आसमान इस धरती से
बारिश-सा कुछ
कहता ही रहता है अक्सर
फ़िलहाल मुझे एक खदबदाती चुप्पी
और इंतिज़ार से भर जाना चाहिए।
इस क़दर
भूख लगती है तो नंगई खाता हूँ
नींद नहीं आती तो नंगई ओढ़ लेता हूँ
काम नहीं मिलता तो नंगई समय का पता नहीं चलने देती
प्यार नहीं मिलने पर यही नंगई काम आती है
सरकार को गाली दे नहीं पाता तो इसी नंगई पर थूक आता हूँ
सच बर्दाश्त से बाहर होता है तो यही नंगई
झूठ से ऊब जाता हूँ तो यही नंगई।
यह कितनी अच्छी बात है
देश में क़ानून का राज है
और संविधान सर्वोपरि है
संविधान सर्वोपरि है
और देश में क़ानून का राज है
यह कितनी अच्छी बात है
यह कितनी अच्छी बात है
कि देश के सभी नेता ईमानदार हैं
अफ़सर उनसे भी ज़्यादा
और न्यायधीश तो सभी के सभी
सबसे बड़े ईमानदार हैं
यह कितनी अच्छी बात है
कि कहने की आज़ादी है
और इतनी ईमानदारी के बीचोबीच
कोई बेईमान कवि
एक निरी बेईमान कविता कह सकता है
यह कितनी अच्छी बात है।
जब कभी
कभी जब रात भर गिरता है पानी
और तड़के उठ नहीं पाती है धरती
लिए करवट देर तक रहती है लेटी
ओढ़े हुए महकती एक चादर गीली
मैं तुम्हें याद करता हूँ…
मिथ्या प्रमेय
पुरुष व्यभिचारी होते हैं…
इसे एक सिद्धांत की तरह
बड़ी सरलता से कहते हो आप!
मैं पूछता हूँ कि कैसे?
यह उनके स्वभाव में है… कहते हो आप
अपनी बात को ज़्यादा स्पष्ट करते हुए
आप कहते हो कि विवाहित पुरुष
विवाहेतर संबंधों में होते ही हैं
मैं पूछता हूँ कि क्या सभी?
तक़रीबन सभी… कहते हो आप
चलिए आप कहते हो तो ऐसा मान लेते हैं
आप कहते हो कि वे एक समय में ऐसे
कई संबंधों में एक साथ होते हैं,
लगभग कितने?
हो सकता है कि वे ऐसे एक, दो या पाँच संबंधों में हों…
कहते हो आप
आगे बढ़ने से पहले
मान लेते हैं कि एक विवाहित पुरुष
विवाह से बाहर औसतन तीन संबंधों में है
जिनमें एक कुँवारी और दो विवाहित स्त्रियाँ हो सकती हैं
या एक विवाहित और दो कुँवारी
तीनों विवाहित या तीनों कुँवारी भी हो सकती हैं वे स्त्रियाँ
आपके कथनानुसार
दुनिया के अधिकतर विवाहित पुरुष
विवाह से बाहर संबंधों में हैं
तो इस तरह यह मान लेने पर
उनसे तीन गुणा विवाहित या कुँवारी स्त्रियाँ
उनसे संबंधों में होनी चाहिए
अब आप कह रहे हैं कि
अविवाहित पुरुष भी
ऐसे ही एक से ज़्यादा संबंधों में हैं
तो यह तय है कि आपसी सहमति पर टिके
ऐसे संबंधों का एक पूरा कारोबार चल रहा है इस संसार में
मान लिया जाए कि पुरुष इतने व्यभिचारी हैं
कि उनका जीवन ऐसे संबंधों के बिना चल नहीं सकता
तो वे स्त्रियाँ जो इन संबंधों में हैं और जो संख्या में
निश्चित ही पुरुषों से कई गुणा होंगी
उनके बारे में क्या कहा जाए?
मेरे इस प्रश्न के उत्तर में
बड़े संयत भाव से कहते हो आप
कि स्त्रियों को इन संबंधों तक प्रेम लाया होगा
जबकि पुरुषों को व्यभिचार
यदि मान ही ले यह तर्क भी तो फिर
इस दुनिया में पुरुषों की तुलना में
कई गुणा स्त्रियाँ होनी चाहिए!
आप जो कहते हैं कि
दुनिया का सारा व्यभिचार पुरुष की पैंट से जन्मा है
दरअस्ल, आपने गणित की क्लास में हवाई जहाज़ उड़ाए हैं।
प्रदीप सैनी की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह तीसरा अवसर है। इस बीच उनका एक कविता-संग्रह दुनिया के होने की आवाज़ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की जगह धीमे-धीमे बन रही है, जबकि इस संग्रह की कुछ कविताएँ बहुत तीव्रता से चर्चित हुई थीं। दरअस्ल, प्रदीप अपने कवि को कवि की तरह ही देखते हैं; यह अलग बात है कि आजकल इसे अवगुण की तरह देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यह एक जेनुइन कवि होने की सबसे बड़ी निशानी है। कवि जोखिम ले सके, इसके लिए ज़रूरी है कि कवि बतौर कवि ऐसे काम अपने ऊपर न ले जो उसके लिए दूसरे भी कर सकते हैं… यहाँ प्रस्तुत कविताएँ हमारा सामना एक ऐसे ही कवि से करवाती हैं जो अपना काम बख़ूबी जानता है। कवि से और परिचय के लिए यहाँ देखिए : स्थानीयता के सारे संघर्ष ख़तरनाक हैं | स्मृति भर नहीं होती स्मृति