कविताएँ ::
सपना भट्ट

अमरता के पार से
इससे पहले कि बीती ऋतुओं की स्मृति
रंध्रों में मीठी सुवास भरती
तलहटी में बुरुंश फूल कर झर भी गया
माघ की पंचमी से पहले
निहोना ही समय हुआ यह तो
कि ठिठुरते माघ में भी
स्वेद बह कर वक्ष को ढक लेता है
नमक से
क्या अबेर होती
जो प्रिय के रोशनी माँद करने पर
डूबता शरद का चंद्रमा!
मर तो नहीं जाती न
जो बाट हेरते ठूँठ हो भी जाती पिंडलियाँ!
देर से पहुँचता वसंत
तो मीठी प्रतीक्षा में
कट जाते ये थोड़े और क्रूर कठिन दिवस
किसी सखी के कान में फूँक देती
उसके नाम के तीन अक्षरों का कौतुक
हँसते-हँसते आँखें भर आतीं
असहमति, तारीख़ और इतिहास
औंधे पड़े रहते अपनी-अपनी जगह
मैं संसार की ओर पीठ किए
बैठी रहती उसकी निषिद्ध देहरी पर चुपचाप
ज़रा देर से फूलता वसंत
तो मृत्यु भी देखती
अमरता के पार से
उसे मुझ तक आते हुए
चाहे कितनी भी
प्रगाढ़ होती लज्जा
चूम लेती चुनरिया की ओट लेकर उसे…
काशी नहीं उत्तरकाशी
काशी नहीं है इस गाँव का नाम
किंतु यहाँ भी एक नदी में बहता है
दो जोड़ी भीगे पैरों का अहर्निश शोक
यहाँ भी नेपथ्य में रोकर
अपने दुःख सुरक्षित कर लेती हैं प्रेमिकाएँ
इस निर्जन घाटी में भागीरथी ही गंगा है
यहाँ भी खींचती है नौकाएँ
सैलानियों के कौतुक भरे उल्लास को
मल्लाह यहाँ भी गाते हैं
दुःख की भाषा में
अभावों के सबसे करुण गीत
तुम नहीं जानते होंगे
किंतु मणिकर्णिका नाम का
एक अभागा घाट है यहाँ भी
रीतियाँ समझाते
नीतियाँ बाँचते पंडे हैं
धर्म-अधर्म के घनघोर अभ्यासों से घिरी
मोक्ष की असाध्य दुर्बोध युक्तियाँ हैं
चिताएँ हैं धू-धू कर जलती हुईं
शवों की दाह-गंध से ऊबते-घबराते
घर लौटने को उद्यत संबंधियों की अधीरताएँ हैं
बेर-कुबेर की अब कौन कहे?
मृत्यु पर किसी का वश नहीं कवि!
वह तो ऐन उस घड़ी भी आ सकती है
जब धोती के छोर में
मीठे हिसर और काफल बाँधे
हेरती होगी कोई पहाड़न
किसी लाटे की बाट
दुर्भाग्य का बीज कहाँ नहीं उग सकता कवि!
उधर जब तुम कविता में
सुरुचि के भव्य फूल चुन रहे होगे काशी में
मैं स्मृतियों की गठरी बाँधे मगहर आ बसूँगी
वहीं त्यागूँगी प्राण
वहीं पुकारूँगी तुम्हें अंतिम बार
मेरी मृत आसक्तियों के फूल चुनने के लिए
तुम्हे काशी नहीं उत्तरकाशी आना होगा कवि!
कुछ कहो
दुखांतिका है जीवन-नाटिका
नेपथ्य में आँखें पोंछ कर
एक तैयार मुस्कुराहट ओढ़ लेते हैं कलाकार
दुनिया के दर्द, ज़रूरतों, अनिद्रा और ठोकरों पर
हो रहे हैं नाट्य-मंचन
हुकूमत, ज़ुल्म और बेबसी
एक ही लय में गा रहे हैं लोग
मानो यही अभ्यास हो, यही भाग्य
पता नहीं आँख पत्थर की है या सीना
निज़ाम को कुछ दिखता ही नहीं
इधर हमारा विषाद
हताशा में बदल कर अन्याय को नहीं
बचे-खुचे रोष को ही नष्ट किए दे रहा है
हम रोना भूलकर हैरान होते हैं
कभी हैरानी में रोने लगते हैं
ज्यों नागरिक न हुए
कटता हुआ कछार हो गए
रोज़ अपने हिस्से को खोता हुए देखते
तुम ही कुछ कहो
तुम्हारी आवाज़ और रोशनाई
तो किसी की ग़ुलाम नहीं!
कहो कि
साँस लेने के ग़ैरज़रूरी उपक्रम से
अधिक ज़रूरी है आवाज़ उठाना
कहो कि अँधेरे के आख़िरी छोर पर
हमेशा झिलमिलाती है रोशनी
नैतिकता और प्रतिबद्धता
केवल शब्द भर नहीं हैं
कहो कि
चुप रहने से ही
कई गुना बढ़ गईं उनकी ताक़तें
रोज़ बढ़ रहे हैं ज़ुल्म
मारे जा रहे है हक़
मर रही है आदमियत
दुनिया से उठ रही है करुणा
दीमकें चाट रही हैं
अहिंसा परमो धर्म: का सुवाक्य
तुम भी कुछ न कहोगे
तो और कौन कहेगा प्यार मेरे!
मेरा क्या है
मैं तो कविता में
तुम्हारे ख़्याल का रूमान बुनती हूँ
मेरे डूबने के अवसान पर
जब गिर जाएगा पर्दा
तब भी बजती ही रहेंगी तालियाँ…
खंडित इंदराज
वह नहीं लौटेगी
शब्द में
कोलाहल में
धीरज के दुष्कर आख्यानों में
किसी इंदराज में नहीं पैठेगी
अभी यह दुर्दम्य असमर्थता
अति भावुकता से ग्रस्त इन कविताओं में
भरी रहेगी बलि के पशु-सी निरीहता अभी
उन्माद और अवसाद के मध्य
गूँजता रहेगा स्मृतियों का सहगान
अलौकिक आत्मरति से भी न मिटेगी
स्नायुपथों में दुबकी यह आतंकप्रद उदासी
गाड़-घटवार सूखे पड़े रहेंगे
केवल हिया रहेगा
सौंण भादों-सा भीजता पसीजता
वरना और क्या है
बिछोह की यह कल्पित दैन्यता
वासनाओं की चिर अमरता के सिवा!
अभी संताप के
खंडित महानाद से कोई मुक्ति नहीं
इसी पृथ्वी की ओट लेकर
ओझल रहेगी वह इस पृथ्वी से अभी
अभी यह दुनिया नहीं जानेगी उसका पता
अभी वह कुछ दिन
अपनी निस्संग चुप के घर में रहेगी।
अपगति
वे पत्नियाँ नहीं
प्रेमिकाएँ थीं
दर्प अभिमानिनी पत्नियों पर शोभता था
जबकि अदिष्ट प्रेयसियों पर शोक
उनके अंतर्बोध और तर्कणाओं की पराजय के वृत्तांत
प्रेमियों ने अपनी गृहस्थी के अलिखित प्रारूपों में
अँगूठे लगवाकर सहेज लिए थे
वे पार्श्व की सहनायिकाएँ थीं
नेपथ्यों की अस्फुट ध्वनियाँ भर
उनके होने न होने से
नाट्य-लीलाओं में अधिक अंतर न आता था
भ्रम उनके मस्तक पर गौरव-सा छपा था
मध्यरात्रि का लज्जित संभोग
उनकी देह के पानी को कुम्हलाता था
प्रातः सूर्य का शुक्ल तेज
उनके दुर्भाग्य को प्रकाशित कर देता था
स्थानीयता की भी
अपनी एक निरुपाय यातना होती है
कोई उत्सव हो कि शोक
भय उनकी ही एषणा की
पराजित उपकथाएँ कहता था
पूर्वजों की छाया
उनकी अछूत देह की सँवलाई धूप तक न छूती थी
यौवन की लाज ब्रह्मांड की ओट से भी न छिपती थी
पवित्रता केवल
सद्य सुहागनों के ललाट का वैभव थी
प्रेयसियाँ नैतिकता
और न्याय के कटघरे की रहवासी थीं
यह निहोनी काली ऋतु
इस पृथ्वी पर यूँ ही न चली आई थी
किसी दिन विकल होकर
एक भले आदमी ने
एक अभागी औरत से
उसका काँपता हाथ
अपने हाथों में लेकर कहा था
कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ
यह सुन दसों दिशाएँ हँस पड़ी थीं
अवांछित होने का अपयश द्वार पर जो खड़ा था
अंतरिक्ष ने इस खंडित मृषा को पहले ढका
क्षिति पर यह अपगति उसके बाद आई।
पराजय
और एक दिन सहसा
उसकी भाषा बदल गई
किसी सस्ते तिलिस्म की तरह
आसक्तियों के रुपहले मुलम्मे उतर गए
भाव का शोक
व्याकरण दोष की तरह
दुनियावी संधि और समास में उलझ गया
तमाम चमकीले बिंबों का सौंदर्य
अंत मे घटते चंद्रमा सरीखा फाँक भर रह गया
मुझे भी कहाँ कुछ सूझता था—
अधिक मीठा विष होता है पथ्य नहीं
अतिदया की हिंसा छिपती ही नहीं
अधिक मुलायम स्पर्श से
रक्त निकल आता है
आत्मा से छलछलाकर
अब न स्पर्श बचा है देह में
न हृदय में करुणा ही
संज्ञा सर्वनाम में भी नहीं बचे
उसके सच्चे-झूठे वृत्तांत
अब कोई राग
कोई अनुताप नहीं
मेरे उपालंभ
मेरे दुर्वाक्य भी कहाँ बचे
इस असंभव पार्थिवता में अब
यह पराजय विशुद्ध मेरी है
और मेरा है यह अपयश
जिसे मस्तक पर गौरव की तरह किया है धारण
यह कथा मेरी है
केवल मेरी
यह प्यार भी तो
मेरा ही था न
उसका अब इधर कुछ भी नहीं
कंठ में यह रुँआसा स्वर अनायास है
और यह कविता कोई आर्त्त पुकार नहीं
मृतक की देह से
अंतिम बार लिपटने का
सचेत और नाटकीय अभ्यास है।
सपना भट्ट सुपरिचित-सम्मानित कवि हैं। उनकी कविताओं की दो किताबें चुप्पियों में आलाप [2022] और भाषा में नहीं [2024] शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। यह चौथा अवसर है जब उनकी कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित हो रही हैं। उनसे sapnabhatt2525@gmail.com पर संवाद संभव है। इससे पूर्व-प्रकाशित कविताओं के लिए यहाँ देखिए : रोने के लिए जगहें कहीं नहीं थीं | अंतर्विरोध के मारे पंडित प्रेम को गल्प कहते थे | यह जानते हुए भी कि मुझे कहाँ रास आता है प्रेम