लंबी कविता ::
जयंत शुक्ल

जयंत शुक्ल

क्या पता

वह कौन?
भीतर पैठ जमा रहा है
हृदय खरोंचता
भीतर से
जो भरे हुए टोकरे को
ख़ाली करने की होड़ में लगा है।

मुझे बताओ
जब बताना चाहो
पर बताओ
मैं एक उम्र से सुनना चाहता हूँ तुम्हें
बिना कहे कितना समझूँ
प्यार करने से
दैवीय नहीं हो गया हूँ।

मेरे बहुत बोलने का उत्तर
हो सके तो
बहुत…
बहुत बोलने से दो।

ऐसे अकेले रहना
दूर रहना सबसे
कैसे रहा जा सकता है?
मैं जानता हूँ
यह तुम्हारा ख़ालीपन है
जो बाहर तक फैला जा रहा है
इसे भर जाना चाहिए
इसे भरना होगा!

ओ रजस्वला!
संकट मोचन कैसे उबारेंगे
वह ख़ुद एकांत में बैठे
सेनुर मले
क्या वह सोचते भी हैं
स्त्रियों के बारे में?
वहाँ उनका अकेलापन
तुम्हारा एकांत
उनके ही जैसे
सबको मन में बसाए
सबसे दूर होने की कामना।

दूर मत रहो प्रिया!
साथ रहो
रोज़ मिलो
बोलती रहो
बताती रहो
पूछती रहो
मुझे देखती रहो
मुझे देखने दो
समझने दो
जीवन को मुझमें
ख़ुद में उतरने दो।

एक कविता लिख रहा हूँ
एक कविता सुना रहा हूँ
अपना प्रेम उड़ेल रहा हूँ
मुझे भरने दो तुम्हारे भीतर प्रेम अपना
मुझे भरने दो भरम अपना, अहम् अपना।

इस एक बात के हज़ार मानी निकालो
फिर मेरे बारे में सोचो
मैं किस मानी से लिख रहा हूँ
फिर मुझसे पूछो
मैंने किस मानी में लिखा है,
मैं बहुत ख़राब हूँ कुछ समझाने में
पर मुझसे पूछो
मुझे घूरो
मुझे पकड़ो
मुझे सहलाओ
मुझे समझाओ
पर
कुछ कहो!
कुछ कहो!!
कुछ कहो!!!

कुछ कहो न प्रियंवदा!
क्या तुम भी वसंत हो जाओगी?
क्या तुम्हारा आना भी संदिग्ध होगा?
क्या कल्पना और अतीत में ही मिलोगी?
कहो न प्रियंवदा!

अपना स्पेस तोड़ दो न
उसका विस्तार करो
मुझे जकड़ कर रखो उसमें
दूर फेंकने की बात न करो।

मेरे जीवन में कितने ही दोस्त हैं
और उनमें कितनी ही स्त्रियाँ
जो मुझे कुछ सिखा सकें
जो निचोड़ सकें मुझे
पितृसत्ता का कीचड़ निकाल सकें मुझसे।

तुम हो, माँ हैं, फिर दूर कहीं एक दोस्त और
पर अब जो नींद टूटती है
तो जोहता हूँ सन्नाटा
ध्यान से सुनता हूँ माँ की साँसें
अब डर लगता है
कि नींद में न चली जाएँ माँ
समस्त यातनाएँ
छोड़कर
मुझे
अपने देवता के वहाँ।

मृत्यु ही तो सच है
आएगी ही,
मुश्किल हो या आसान
जल्दी या देरी से
प्रेम की दहलीज़ से पैर लड़ाकर
लौटना किसी गर्त में
अँधेरे में जीना तमाम उम्र
या ख़ुशियाँ बटोर लेना
और भारी साँसें बुहार देना
यादों की देहरी से।

चुनाव भीतरी है
छूट जाना लोगों का
छोड़ जाना लोगों का
सबका अपना, कोरा सपना
क्या बेहतर है?

चुनाव बेहतर हो सकता है
पर यह हाँ या न का विकल्प नहीं
एक या दूसरे का विकल्प नहीं
जटिलता है
जीवन की
मृत्यु की
रिश्तों की
चुनाव की।

चुनाव है
शून्य को भरने का
या अनंत से भर जाने का,
मैं समस्त यातनाओं से भरा हूँ
ख़ाली हो जाना चाहता हूँ
तुम भी यातनाओं से भरी हो
पर और-और भर जाना चाहती हो
ख़ालीपन से डर रही हो
पर कहीं ख़ालीपन से ही भरी हो।

काश हम एक शून्य बना सकते
जहाँ हम रह सकते
और कोई नहीं
उस शून्य को अपनी यादों से भर सकते
जहाँ तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ न होता
जहाँ तुम्हारी इच्छाओं के अनुकूल मैं रहता।

कोशिश है ऐसा एक स्पेस बनाने की
जहाँ तुम रह सको
घर से दूर
मुझसे दूर
तीन दोस्तों के अलावा सबसे दूर।

बस उससे पहले
मैं तुम्हें गले लगा लूँ
(तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध)
कहीं अकेले घंटों तुम्हारा हाथ थामे बैठूँ
(तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध)
तुम्हारे होठों पर बोलता रहूँ
(तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध)
फिर सब तुम्हारे कहने से हो
और मैं महज़ कुछ कविताएँ लिखता रहूँ
तुम्हारी इच्छाओं के अनुकूल।


जयंत शुक्ल से परिचय के लिए यहाँ देखिए : यह संसार एक पेड़ है और अब इस पर सिर्फ़ एक पत्ती बची है | मृत्यु और सांत्वना

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