ऐन कार्सन की कविताएँ और संवाद ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : विनोद चंदोला

ऐन कार्सन | तस्वीर सौजन्य : london review bookshop

पिता का नीला पुराना कार्डिगन

अब झूलता है वह रसोई की कुर्सी के पीछे
जहाँ मैं बैठती हूँ हमेशा, जैसे वह
रसोई की कुर्सी के पीछे जिस पर वे बैठते थे हमेशा।

मैं पहनती हूँ उसे जब कभी आती हूँ अंदर,
जैसे आते थे वे, झटकते
बर्फ़ अपने जूतों से।

मैं पहनती हूँ उसे और बैठती हूँ अँधेरे में।
उन्होंने न किया होता ऐसा।
ख़ुनकी उतरती है छिल-कतरकर
चाँद के कीकस से आसमान में।

उनके क़ायदे थे रहस्यमय।
लेकिन मुझे याद है वह पल जब मैंने जाना
वे अपने क़ायदों के भीतर होते जा रहे थे बावले।

जब मैं पहुँची, वे घर के रस्ते के मोड़ पर खड़े थे।
नीला कार्डिगन नीचे से ऊपर तक
सारे बटनों से बंद उन्होंने पहना हुआ था।
सिर्फ़ इसलिए नहीं कि यह जुलाई की एक गर्म दुपहर थी
बल्कि उनके चेहरे का रुख़ तक
उस नन्हे बच्चे का-सा जिसे उसकी किसी आंटी ने
सुबह-सुबह कपड़े पहनाकर तैयार किया हो

किसी यात्रा के लिए लंबी
ठंडी रेलगाड़ियों और तूफ़ानी प्लेटफ़ॉर्मों पर
बैठेगा जो अपनी सीट के छोर पर एकदम सीधे
जबकि परछाइयाँ लंबी उँगलियों की तरह
तेज़ी से गुज़रते भूसे के ढेरों से
चौंकाते चलती हैं उसे
कि वह सफ़र कर रहा हैं उलटी दिशा में।

ओ प्रेम के क्षणिक उदास आनंद

है प्रिय मुझे रहना तुम्हारे साथ रात भर आँखें मूँदे।
अहोभाग्य कि हो यहाँ तुम
आ रहे
सितारों के साथ!
मैं रही यात्रा-पथ पर
समूचे मन-मस्तिष्क में
और
थे तुम वहाँ
किनारे मार्ग के घुटना टिकाए बैठे
अपने छोटे-से औज़ार-बक्स से
कुछ ठीक करते हुए।

मुझे दो एक दुनिया,
वह दुनिया ले चले तुम जो मैं थी।

खोना प्रेमी को

किसी प्रेमी को खोने की बाबत
सबसे बड़ी कठिनाई है शायद
बरस को अपने दिन दोहराते देखना
यह ऐसा है जैसे मैं डुबोऊँ अपना हाथ तल में

समय के और झट से निकाल लाऊँ
अप्रैल के ताप की हीरक के आकार की नीली-हरी गोलियाँ
एक बरस पहले किसी अन्य देश में

मैं महसूस कर सकती हूँ
उस दूसरे दिन को दौड़ते हुए इसके नीचे
वीडियो-टेप की तरह।

ऐन कार्सन | तस्वीर सौजन्य : frontline.thehindu.com

बीच से शुरू करें
ऐन कार्सन से येनी रीडेन की बातचीत

येनी रीडेन : हैलो, मैं येनी रीडेन हूँ—नोबेल पुरस्कार प्रतिष्ठान से।

ऐन कार्सन : ओह, अच्छा! ओके, समझी फ़रमाइए।

येनी रीडेन : जी, धन्यवाद! पहले मेरी ओर से बहुत बधाई क़ुबूल करें।

ऐन कार्सन : धन्यवाद! बड़ी अजीब बात है।

येनी रीडेन : कैसा लग रहा है आपको इस वक़्त, कैसे मिली ख़बर आपको? क्या इस बारे में कुछ बताएँगी?

ऐन कार्सन : मैं अभी बिस्किट खा रही हूँ और चाय पी रही हूँ। अभी तक तो वाक़ई कुछ भी नाटकीय नहीं। बस रसोई में बैठी ‘लंदन रिव्यू ऑफ़ बुक्स’ पढ़ रही हूँ, चाय पीते हुए। लगा कि फ़र्श को बुहारने की ज़रूरत है, तो बस यह करने के लिए उठी ही थी। तभी कई बार फ़ोन की घंटी बजी, जिसे मैं बंद करती रही; क्योंकि जब भी फ़ोन बजता है, मैं उसे बंद कर देती हूँ।

रॉबर्ट करी : मैं पति हूँ ऐन का और आपको मेरा आभारी होना चाहिए कि मैंने उसे आपकी कॉल का जवाब देने को कहा।

ऐन कार्सन : हाँ फ़ोन वह ही उठाते हैं। मैं आमतौर पर फ़ोन बंद रखती हूँ। वे ही जवाब देते हैं फ़ोन का औऱ मुझे जवाबी फ़ोन करने को कहते हैं। यह तो थोड़ा-सा पागलपन-सा लगता है। मेरा ख़याल है कि तुम सब पागल हो।

येनी रीडेन : इसमें अजीब और पागलपन जैसी क्या बात हुई? क्या आपको इसकी अपेक्षा नहीं थी?

ऐन कार्सन : ख़ैर, भगवान् के लिए इसकी कौन अपेक्षा करता?

येनी रीडेन : आपने कहा कि आप अपने घर में हैं… और घर है कहाँ?

ऐन कार्सन : रेक्याविक में है समुद्र के क़रीब। आर्कटिक को तकता। माफ़ी चाहती हूँ मैं आपको शायद उतनी नाटकीय न लगूँ। बस एक आम-सा दिन है यहाँ।

येनी रीडेन : क्या आपने इस बात पर विचार किया कि इस नोबेल पुरस्कार का मतलब क्या है आपके लिए?

ऐन कार्सन : नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं सोचा। हाँ, हम ऐसे तरीक़े ज़रूर सोच रहे हैं, जिनसे यह पुरस्कार-राशि कहीं किसी को दी जा सके। हमारे एक दोस्त हैं जिन्हें घर की दरकार है और हम हमेशा ‘डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ को ख़ासा कुछ देते हैं, तो ऐसी ही कुछ चीज़ें।

येनी रीडेन : आप अचानक मिली यह ख़ुशख़बरी कैसे मना रही हैं?

ऐन कार्सन : सच कहूँ तो हम जंगल की सैर के लिए बाहर निकल रहे हैं, ताकि हमें फ़ोन का जवाब न देना पड़े। वहाँ हम शांति को सुनने जा रहे हैं।

येनी रीडेन : बढ़िया! आपके लेखक होने के बारे में आपके काम के बारे में अगर बात करें, उन लोगों को जो आपको बहुत अधिक नहीं जानते आप अपने लेखकीय कार्य कैसे समझाएँगी?

ऐन कार्सन : बेपरवाही में हुई चीज़ की तरह बताऊँगी, मैं इसे जबकि हमेशा कुछ और करने की कोशिश में रही।

येनी रीडेन : अगर कोई आपके बारे में ज़्यादा न जानता हो और आपकी किताबों और काम के बारे में जानना चाहता हो, तो उसे कहाँ से शुरू करने की सलाह देंगी आप?

येनी रीडेन : मुझे नहीं मालूम। यह कहीं के बारे में है। बहुत से लोग आत्मकथा पढ़ते हैं। मैंने पढ़ी है, यह सबकी पहुँच में भी लगती है। लेकिन मैं नहीं जानती। बीच से शुरू करें, मैं हमेशा कहती हूँ।

येनी रीडेन : शुरुआत की बात करें तो जब आप किसी नई किताब पर काम शुरू करती हैं, तो कैसे शुरू करती हैं और आप आपकी लेखन-प्रक्रिया कैसी रहती है?

ऐन कार्सन : बीच से शुरू करो। यही एकमात्र नियम है, जिस पर मैं चलती हूँ।

येनी रीडेन : वह कैसे?

ऐन कार्सन : तो आप उसका जो भी अर्थ लें, बीच की तलाश करें और करें वहाँ शुरुआत।

येनी रीडेन : क्या आपके ऐसे कोई प्रेरणास्रोत हैं, जिनकी ओर आप बार-बार मुड़ती हों?

ऐन कार्सन : होमर।

येनी रीडेन : आप शास्त्रीय रचनाओं की शिक्षिका हैं और आपने इनमें से बहुत-सी कथाओं का इस्तेमाल अत्याधुनिक संदर्भ में किया है। आपको क्यों लगता है कि यह आज के लोगों के लिए प्रासंगिक है?

ऐन कार्सन : ऐसा नहीं है। मैं नहीं समझती कि मैं प्रासंगिकता में अनुरक्त हूँ। मेरी रुचि हमारे उनके प्रति प्रासंगिक होने में है।

येनी रीडेन : मैंने कहीं पढ़ा है कि आपके लिए ऊब, नीरसता से बचना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसका क्या कारण है?

ऐन कार्सन : ऐसा है कि कोई भी ऊबना-उदास होना नहीं चाहता, कोई चाहता है क्या? क्या आप नहीं टालना चाहतीं उसे?

येनी रीडेन : आपके विचार से आपके लिए यह इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?

ऐन कार्सन : यह उतना महत्त्व का नहीं। यह इसकी एक कसौटी भर है कि मुझे दिन में और क्या करना है, आप जानती हैं : फ़र्श बुहारना है, होमर को पढ़ना है। सारा मामला अधिकतर समय ऊब से बचने का ही है। जीवन नीरस-क्लांत है।

येनी रीडेन : आप सोचती हैं?

ऐन कार्सन : इसके साथ कुछ करें।

येनी रीडेन : यह तो बहुत अच्छा सुझाव है। अगर किसी के मन में लेखक बनने की आकांक्षा हो तो उसके लिए आप क्या कोई संदेश देना चाहेंगी?

ऐन कार्सन : कुछ और नहीं, बस वही, बीच से शुरू करो।

येनी रीडेन : मुझे आपके पीछे फ़ोन बजने की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। आपने इतना समय दिया, इसके लिए धन्यवाद। बधाई एक बार और…

ऐन कार्सन : बहुत धन्यवाद!

येनी रीडेन : अभी के लिए बाय-बाय।

ऐन कार्सन : बाय-बाय!

साहित्य के लिए वर्ष 2026 का नोबेल पुरस्कार घोषित होने के बाद नोबेल पुरस्कार की वेबसाइट कंटेंट मैनेजर येनी रीडेन से ऐन कार्सन की फ़ोन पर हुई बातचीत।


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