कविताएँ ::
दुर्गेश कुमार सजल

दुर्गेश कुमार सजल

वे उस समय साथ थे जब…

पिता की मृत्यु के बाद
दुःख से अधिक कठिन था
यह समझना
कि कौन मेरे दुःख में था।

कुछ लोग आए और उन्होंने
संवेदना के चार शब्द रख दिए
मेरे सामने
जैसे कोई
भूखे के सामने
भोजन की तस्वीर रख दे।

उन्होंने कहा :
तुम अकेले नहीं हो,
हम तुम्हारे साथ हैं।

मैंने विश्वास किया
क्योंकि दुःख में
विश्वास करना
शायद मनुष्य की आख़िरी आदत है।

मैंने बाद में जाना…
कुछ रिश्ते
रक्त से नहीं,
अवसर से बनते हैं
और कुछ लोग
संवेदना नहीं देते
उसका निवेश करते हैं।

दुःखी आदमी को छलना
शायद इसलिए आसान है
कि वह उस समय
सत्य से अधिक
साथ खोज रहा होता है।

बहुत बाद में
वे फिर आए
और बोले :
याद है,
हम उस समय
तुम्हारे साथ थे
जब…

तीसरा नियम

मैं उन्हें कुछ नहीं कहूँगा
जिन्होंने मुझसे वह सब कहा
जो पिघले हुए लोहे की तरह
मेरे शरीर पर उड़ेल दिया गया
जिसकी तपन से उधड़ता रहा
शरीर का एक-एक अंग
और भीतर आत्मा का कोना-कोना।

फिर भी
मैं उन्हें माफ़ कर दूँगा
उन पर
नर्मदा का स्वच्छ पानी
उड़ेल दूँगा
और बहा दूँगा
तन-मन का मैल।

शायद इसी तरह
मैं बदल सकूँगा
क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच का
वह पुराना हिसाब
और पलट दूँगा
गति का तीसरा नियम।

सबका पक्ष

वे चाहते हैं
तालाब में
बस कमल ही रहें
और उनमें भी
कुछ केवल मछलियों के पक्ष में हैं

कुछ चाहते हैं
केवल कछुए रहें

कुछ की इच्छा है
बस जलमुर्ग़ियाँ रहें

कुछ केकड़ों के समर्थक हैं
और कुछ सिंघाड़ों के

दरअस्ल
ये सब तालाब को नहीं चाहते

वे चाहते हैं
तालाब में
सिर्फ़ उनका हिस्सा बचे

पर एक प्रजाति का बच जाना
तालाब का बच जाना नहीं है

जिस दिन तालाब से
बाक़ी सबको निकाल दोगे
उस दिन बचा हुआ कमल भी
तालाब में नहीं रहेगा

वह सिर्फ़ एक तस्वीर होगा
सूखते हुए पानी की।


दुर्गेश कुमार सजल [जन्म : 1998] की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। वह बनखेड़ी, होशंगाबाद के रहने वाले है और फ़िलहाल डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर [मध्य प्रदेश] के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। उनसे durgeshkumarsarathe555@gmail.com पर संवाद संभव है।

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