चिट्ठियां ::
स्तानिस्लावस्की
के नाम
वाख्तानगोव
अनुवाद : पी. एस. मलतियार
प्रस्तुति : महेश वर्मा

ई. वाख्तानगोव, 13 फरवरी 1883 – 29 मई 1922

स्तानिस्लावस्की को आधुनिक रंगमंच के निर्माताओं में से एक माना जा सकता है. उन्होंने रंगमंच को एक वैज्ञानिक यथार्थवादी मोड़ दिया. उन्होंने रंगकर्म को परकाया प्रवेश के अमूर्त-से सिद्धांतों और नियंत्रणहीन उत्तेजनापूर्ण कार्रवाइयों से बाहर निकालकर शरीर की गतियों, वैज्ञानिक पूर्वाभ्यास, इंप्रोवाइजेशन के सटीक प्रयोग से ऐसी रंग-शैली विकसित की जिसने न सिर्फ मॉस्को आर्ट थिएटर को विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा दिलाई बल्कि समकालीन विश्व रंगमंच के बीच भी एक तार्किक उत्तेजना फैलाई और एक हद तक उसे बदल भी दिया.

यूजीन वाख्तानगोव मॉस्को आर्ट थिएटर के छात्र रहते ही अपने गुरु स्तानिस्लावस्की की निगाह में आ गए थे और स्तानिस्लावस्की उन्हें जिम्मेदारी के काम सौंपने लगे थे, जैसे पूर्वाभ्यासों की सूची बनाना, नए समूह को स्तानिस्लावस्की का सिस्टम समझाना और कालांतर में प्रसिद्ध मेथड एक्टिंग की बारीकियों को समझाना.

स्तानिस्लावस्की के रंगमंच संबंधित सिद्धांतों के वह सबसे प्रमुख व्याख्याकार हुए. वाख्तानगोव ने बाद में अपना समूह तैयार किया जो कैंसर से उनकी मृत्यु के बाद वाख्तानगोव थिएटर कहलाया.

वाख्तानगोव का देहांत 39 वर्ष की उम्र में 29 मई 1922 को रात 9:55 पर हुआ. उनकी मृत्यु का समाचार तुरंत मॉस्को के थिएटरों में पहुंचाया गया. दर्शक उनके सम्मान में खड़े हो गए थे.
अपनी एक तस्वीर जो स्तानिस्लावस्की ने वख्तानगोव को दी थी, पर उन्होंने लिखा : मेरे प्रिय दोस्त, प्यारे शिष्य, गुणवान साथी, एकमात्र उत्तराधिकारी, बुलाने पर सबसे पहले आने वाला, कला में नवीनता पर विश्वास करने वाला, स्कूलों का प्रेरणादाता, एक बुद्धिमान शिक्षक, गुणवान निर्देशक और अभिनेता, क्रांतिकारी कला के सिद्धांतों का निर्माता, रूसी रंगमंच के भविष्य के नायक को समर्पित.

स्तानिस्लावस्की झूठी प्रशंसा न करने के लिए जाने जाते थे.*

यहां प्रस्तुत इन दोनों पत्रों के बीच सिर्फ चार दिनों का फासला है, लेकिन इस बीच जीवन को लेकर वाख्तानगोव के विचारों में हुए आकस्मिक बदलाव की छाया में दूसरा पत्र स्वीकारोक्ति-सा भी मालूम पड़ता है.

गुरु शिष्य के बीच कुछ गलतफहमियों और सैद्धांतिक मतभेद के भी संकेत पत्र में हैं.

दोनों पत्र प्रोग्रेस पब्लिशर्स मॉस्को द्वारा सन् 1982 में प्रकाशित पुस्तक ‘यूजीन वाख्तानगोव’ से लिए गए हैं. इस परिचय में तारांकित गद्यांश सोनिया मूर की पुस्तक ‘स्तानिस्लावस्की सिस्टम’ का सुरेश शर्मा द्वारा अनूदित संस्करण ‘स्तानिस्लावस्की के अभिनय सिद्धांत’ से साभार है.

एक

खिमकी, जकारीयिनो सॅनिटोरियम
मार्च 25, 1919
प्रिय कोन्सतान्तिन सर्जेइविच,

मेरा ऑपरेशन सफल रहा. इस बार यह पिछले बार की तरह आसान नहीं था, शुरुआती छह दिन काफी तकलीफ में गुजरे. मेरी आंत का एक चौथाई हिस्सा निकाल दिया गया है. मेरा वजन काफी गिर गया है जिससे मैं बहुत कमजोर भी हो गया हूं. धीरे-धीरे ही सही, लेकिन मैं निश्चित रूप से स्वस्थ हो रहा हूं. अगर स्थितियां इसी तरह सामान्य रहीं तो मुझे अप्रैल के अंत तक डिस्चार्ज कर दिया जाएगा.

मैं आपको अपने आलेख ‘लोग जो मेथड के बारे में लिखते हैं’ का एक संक्षिप्त अंश भेजने की हिमाकत कर रहा हूं. मुझे माफ कीजिएगा, अगर इसमें कोई बात गलत हो.

गहरे आदर के साथ

आपका
ई. वाख्तानगोव

दो

जकारीयिनो सॅनिटोरियम
मार्च 29, 1919
प्रिय कोन्सतान्तिन सर्जेइविच,

बार-बार पत्र लिखकर आपको परेशान करने के लिए मुझे माफ कीजिएगा, लेकिन इन दिनों चीजें काफी मुश्किल-सी हो गई हैं और इसीलिए आपको पत्र लिखना जरूरी-सा हो गया है.

मैं वे बातें लिखने जा रहा हूं जो मैने आपको कभी साफ-साफ नहीं बताईं. मुझे पता है कि दुनिया में मेरे अब गिने-चुने दिन ही बाकी हैं. मुझे पता है कि मैं लंबे समय तक नहीं जी सकता, और मैं चाहता हूं कि आपके प्रति, रंगमंच के प्रति और मेरे खुद के प्रति मेरा नजरिया क्या है, ये आप जानें.

जब से मैंने आपको जाना है, आपको पूरे दिल से प्यार करता रहा हूं, आपके द्वारा बताए ढंग से जीने के लिए और आप ही के अनुसार जीवन को परखने के लिए आप पर भरोसा करता रहा हूं. जिन लोगों को व्यक्तिगत रूप से आपसे मिलने का मौका नहीं मिला है, उन्हें आपके प्रति अपने प्यार और आदर से चेतन या अचेतन रूप से लगातार आपके बारे मे बताता रहा हूं. मैं जिंदगी का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे मौका दिया कि मैं आपको जान सकूं, दुनिया के एक महान कलाकार के साथ बातें कर सकूं. अगर आप मुझसे मुंह भी मोड़ लें तो भी मैं आपको प्यार करते हुए ही मरना पसंद करूंगा. आपसे बढ़कर मेरे लिए कोई नहीं है और कुछ भी नहीं है.

कला में मैं उसी सत्य से प्यार करता हूं जो आपके द्वारा बताया गया और पढ़ाया गया है. इस सत्य ने न सिर्फ मेरे व्यक्तित्व के उस छोटे-से हिस्से, जो अपने आपको रंगमंच पर अभिव्यक्त करता है, को बदल कर रख दिया है, बल्कि उस हिस्से को भी पूरी तरह से बदल दिया है, जिसे मनुष्य कह सकते हैं. इस सत्य ने मुझे रोज-ब-रोज बदला है और अगर मैं अपने आप में सुधार नहीं ला पाता हूं तो केवल इसलिए कि मुझमें ही कोई बड़ी कमी है. आपके द्वारा बताया गया यह सत्य लोगों के साथ मेरे रोजमर्रा के रिश्ते का पैमाना है, अपने आपसे मेरी मांग है, मेरे जीवन का मार्ग है और कला के प्रति मेरा नजरिया है. उस सत्य को धन्यवाद जिसे मैंने आपसे पाया, मेरा मानना है कि कला का अर्थ है हर एक चीज में मौजूद उदात्तता की सेवा करना. कला किसी समूह या किसी निश्चित व्यक्ति के कब्जे में न हो सकती है और न होनी चाहिए, यह लोगों के कब्जे में होनी चाहिए. कला की सेवा लोगों की सेवा है. एक कलाकार समूह की संपत्ति नहीं हो सकता, वह लोगों की संपत्ति है. आपने एक बार कहा था कि ‘‘आर्ट थिएटर रूस के प्रति मेरी नागरिक सेवा है.’’ यह वाक्य मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है. जब भी मैं कोई काम करने में अक्षम होता था तो यही वाक्यांश मुझे प्रेरित करता रहा है. यह वाक्यांश हर कलाकार के लिए एक धर्म जैसा है.

जैसा कि मेरे प्रति अपना खुद का नजरिया है, न मुझे अपने आप पर विश्वास है, न मैं खुद में कुछ पसंद करता हूं, न मुझमें कुछ अभिन्न करने का साहस है और मैं खुद को आपके छात्रों में से सबसे कमतर मानता हूं. आपकी ओर उठाए गए अपने हर कदम के लिए आपके सामने शर्मिंदा हूं और मैं हमेशा यह मानता हूं कि आप जैसे अद्वितीय व्यक्ति के सामने अपने आपको, अपने काम को दिखाने के काबिल नहीं हूं. समूह के युवा लोग जिनके साथ मैं काम करता हूं जिन्हें मैंने उसी तरह प्यार करना सिखाया जैसा मैने आपसे और सूलेरजितस्की से सीखा था, अब आपके पास आते हैं. इन युवा लोगों ने मुझ पर विश्वास करना बंद कर दिया है. मुझे नहीं मालूम कि वे आपसे क्या कहते हैं या वे कैसे बोलेंगे. मुझे नहीं मालूम कि वे मेरे बारे में और आपके प्रति मेरे नजरिए के बारे में क्या कहते हैं.

मैं पत्र लिख रहा हूं ताकि आप सत्य को जान सकें, देखें कि मुझमें जड़ता नहीं आई है और मेरे बारे में सीधे मुझसे ही जान सकें. यदि आपको मुझ पर भरोसा है तो आप मेरा विश्वास करें कि एक इंसान जिसके पास गिने-चुने दिन हैं, उसके पास झूठ बोलने का कोई कारण नहीं है. अगर आपको लगता है कि मैं आपको संबोधित करने में निःस्वार्थ हूं, तो आपको विश्वास होगा कि मेरा कोई भी कदम और काम आपके नाम के प्रति विशुद्ध, सरल और श्रद्धापूर्ण भाव रखते हुए किया गया है.

मैंने आपके नाम और काम की पवित्रता को समझा है और दूसरों को भी इसकी पवित्रता समझने के लिए कहता आया हूं. मुझे आपको अपने काम का एक अंश दिखाने से रोका गया था, और अब अन्य कामों को दिखाने से रोका जा रहा है क्योंकि वे आपके ध्यान देने योग्य नहीं हैं. मुझे अपने समूह को एक मौलिक स्वरूप देने के लिए दो साल की जरूरत है. अगर आप अनुमति दें तो मैं एक प्ले आपको दिखाना चाहता हूं ताकि आप सिर्फ एक अंश या मेरे काम की एक डायरी की बजाय मेरे समूह की मनोवैज्ञानिक और कलात्मक परिपक्वता देख सकें.

मैं आपसे दो साल का समय मांग रहा हूं ताकि अगर मैं काम करने की स्थिति में रहा तो मैं आपके प्रति अपने प्यार, सम्मान और भक्ति को सिद्ध कर सकूं. कृपया विश्वास करें कि अपने करियर के बारे में मेरी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, और तो और कोई बड़ी भूमिका निभाने की अश्लील इच्छा भी नहीं है. मुझे न केवल मेरी क्षमताओं में बल्कि अपने इरादे की शुद्धता पर आपका विश्वास चाहिए.

आपका
ई. वाख्तानगोव

***

पी. एस. मलतियार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंगकर्मी हैं. महेश वर्मा हिंदी के सुपरिचित कवि-कलाकार हैं. उनकी कविताओं की पहली किताब ‘धूल की जगह’ शीर्षक से कुछ माह पूर्व ही राजकमल प्रकाशन से शाया हुई है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 18वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.

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