कविताएँ ::
अजय नेगी

अंधी भिखारन
अपनी आदतों से बाज़ आए बग़ैर
मैं उसे चकमा देता आया हूँ
वह अपनी उँगलियाँ गोलाकार घुमाती है
कोई आहट पाकर खाँसती है
फ़र्श पर कटोरा बजाती है
उसे हम जैसे अदृश्य लोगों का सहारा है
जो अपना वजूद रखते हैं।
प्रेम-परिणति
हम दोनों साक्षी हैं :
कि इस समय जब सारा संसार
ध्यान में डूबा हुआ है
हमने आकाश की आत्मा के आलोक में
होंठों का स्पर्श ओढ़ लिया है
यही वे क्षण हैं जब
सारी संभावनाएँ सौंदर्य में बदल जाती हैं
और सारा प्रेम पवित्रता में!
सरस्वती-स्मरण
सरस्वती!
ये श्रावणमास के दिन हैं
सरस्वती!
ऐसी धारासार वर्षा है कि मत पूछो
सरस्वती!
तुम्हें याद करने का यही समय है
सरस्वती!
तुम न जाने कहाँ छिपी हुई हो
सरस्वती!
तुम कई बरसों से शांत हो
सरस्वती!
क्या तुम्हारा गला सूखा हुआ है?
सरस्वती!
क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?
क़ब्रिस्तान
क़ब्रिस्तान अभी दूर था
उनके पाँव धूल से अटे हुए थे
और बदन टूट रहा था
वे तीर्थयात्रियों की तरह थे
वे क़ब्रिस्तान पहुँचकर साँस लेना चाहते थे
उस रात जब मुझे मिट्टी दी जा रही थी
उस रात सब ज़िंदा थे
उस रात मैं मरा हुआ था।
दोज़ख़ी
आँखें बंद थीं
समय ध्वस्त हो चुका था
वजूद ने जो कुछ ओढ़ा हुआ था
उसे उतारा जा रहा था
मैं कहाँ था, यह तो ज्ञात नहीं
लेकिन मेरे साथ जो होने वाला है
आप उसकी कल्पना कर लीजिए।
क़ैलूला के वक़्त
वे दोनों जुड़वाँ बहनें
जो पटरियों को रास्ता समझ बैठी हैं
ट्रेन के ज़ोरदार हॉर्न से बे-ख़बर
आगे बढ़ती जा रही हैं
मैं पागलों की तरह उनके पीछे दौड़ता हूँ
उनके क़दमों को सीध में
अचानक मृत्यु मुझसे टकराती है…
हम तीनों पटरियों पर चलते हैं
एक-दूसरे से बतियाते हुए।
क्रिया
उसकी आँखें अंदर चली गई हैं
उसके होंठ काले पड़ गए हैं
उसके स्तन सूख चुके हैं
उसकी चर्बी लटक गई है
वह थकन से चूर सूर्य को
देख रही है घर लौटते
इधर मैं खड़ा-खड़ा सोच रहा हूँ :
उसके जीवन में किस चीज़ की कमी है!
रफ़्तगान
वे लोग
जो ट्रेन के नीचे आकर कट गए
जिन्होंने अपनी शक्लें खो दीं
उन्होंने भी पाई है मंज़िल।
समय का क्षण
यह अंधकार अतीत है
यह धुंधलापन भविष्य है
तुम जहाँ खड़े हो
वहाँ कुछ भी नहीं
जब तक जीवित हो
कहीं के नहीं हो
न अंधकार के
न धुंधलेपन के
न कहीं और के…
अजय नेगी की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। आज से लगभग दो वर्ष पूर्व उनकी कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित हुई थीं। अजय सरीखे दुर्लभ कवि आपको इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता का चेहरा दिखाने वाले कविता-विशेषांकों या फ़ोटोज़ में नज़र नहीं आएँगे। हो सकता है कि वे किसी गई सदी या बहुत संभव है कि आगामी सदी की कविता का चेहरा हों : जहाँ कविता झिलमिलाती हो—नारे, पोस्टरानुकूलता, संगठनप्रियता, अकादमिकता और विमर्शबाज़ी नहीं। कवि से और परिचय के लिए यहाँ देखिए : कोई एक कविता बचा लेगी मुझे
अजय नेगी की कविताओं में उर्दू शायरी की तरह ही किफ़ायत दिखती है। उनकी काव्य पंक्तियाँ चमकदार होती हैं और प्रायः किसी गहरे निहितार्थ की ओर इशारा करती हैं। लेकिन कई बार उनकी कविताओं के बारे में इसका उलट भी सच है। वे किसी अबूझ बात की खोज में बड़े निहितार्थों से रिक्त हो पड़ती हैं।
इधर इक्कीसवीं सदी के बिल्कुल हाल में आये कवि प्रायः दो बातों में फँसते हुए दिखते; एक― वे छा जाने के सस्ते सूत्रों की राह पकड़ते हुए, एक कृत्रिम अस्मिता के निर्माण में दुहराव भरी बकझक करते हैं। दूसरे― सारे संसार को निजीकरण की उपलब्धि मान लेने की तात्सामिक क़वायद करते हैं और शिकायत रखते हैं कि उनका मर्म लोग समझते नहीं हैं। अजय नेगी के यहाँ यह दोनों बातें न के बराबर हैं।
फिर भी, अभी उनका काव्य कौशल बिल्कुल खुलकर सामने नहीं आया है या यूँ कहें कि अपर्याप्तता में आया है। इसलिए, उनको लेकर कुछ अलक्षित कहना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन, जैसा कि निजी बातचीत में वह दावा करते हैं कि वे अपनी कविताओं पर बहुत मेहनत करते हैं; उनसे यह अपेक्षा रखी जा सकती है कि वे अपनी तमाम मेहनत को अपने संवेदन के विस्तार में खर्च करते हुए उसे हिंदी कविता की महान परंपरा के साथ गहन संवाद में झोंकेगे।
साथ ही, उनकी यहाँ प्रस्तुत ‘सरस्वती-स्मरण’ और ‘अंधी भिखारिन’ जैसी कविताएँ समीक्षात्मक जार्गनों से अधिक एक टीका की मांग करती हैं। ‘सरस्वती-स्मरण’ में वे कविता को पुकार रहे हैं―जब कविता के संभव होने के लिए सारे ताम-झाम उपस्थित हैं तो वह कहाँ हैं!
‘अंधी भिखारिन’ में उन्होंने, इसी पात्र के हवाले से सारे आँख वालों को जिस संवेदना और अदायगी से ‘अदृश्य’ कहा है―मौजूँ है। ‘क्रिया’ शीर्षक की कविता में उन्होंने भाषा और स्थिति के टकराव को ग़लत काटते हुए जैसा रूप दिया है; दृश्य-कूटों से बनती हुई भाषा के इस युग में यह भी मानीखेज़ है।
हिंदी संसार के कुनबापरस्ती में फँसे हुए बड़े पत्रिका संपादकों को
अजय नेगी और उनके समकालीन अन्य कई नये कवियों की तरफ़ बड़े इसरार से मुख़ातिब होना चाहिए।
अजय नेगी की कविताएँ न सांत्वना चाहती हैं, न सांत्वना देती हैं। Libido और thantos के गहरे बोध की कविताएं। “समय का क्षण” सबसे अधिक दार्शनिक कविता है, जो वर्तमान की शून्यता को रेखांकित करती है। गहरे आत्मचिंतन और असंतोष से जन्मी हुई कविताएँ। मौन और अभाव के बर-अक्स एक बेचैन आह्वान। मनुष्य, ज्ञान और प्रेम— तीनों के संकट और संभावनाओं की सुंदरतर अभिव्यक्ति। अजय नेगी को शुभकामनाएं।