दुर्गा प्रसाद पंडा की कविता ::
ओड़िया से अनुवाद : सुजाता शिवेन

दुर्गा प्रसाद पंडा

गाड़ी

ग़रीब हल चलाता है,
चलाता है रिक्शा,
चलाता है ऑटो
चलाता है सवेरे-सवेरे विकराल आवाज करती
मैला ढोती म्युनिसिपालिटी की
लोहे के पहिए वाली गाड़ी।

ग़रीब साइकिल चलाता है,
चलाता है बस और ट्रक
चलाता है एंबुलेंस,
चलाता है ट्रॉली,
चलाता है नाव,
ग़रीब के बच्चे खेलते हुए
चलाते हैं साइकिल का टायर,
लोहे की रिम।

ग़रीब पसीना बहाकर चलाता है
पहिया, कल और नल।

चौराहे का ट्रैफ़िक पुलिस
लेकिन घूरता है ग़ुस्से से
केवल ग़रीब चालक को,
कभी-कभी झड़ी लगा देता है
अश्लील गालियों की
वह महँगी कारों से मगर बरतता है एक दूरी
चेहरा घुमा देता है दूसरी तरफ़
ऐसे मानो उसने देखा नहीं है कुछ भी।

ग़रीब अपने टूटे हुए शरीर को भी
घिसटते हुए चलाता है ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर
भूख को बोरे की तरह पीठ पर लादकर अपने।

इस तरह से पशुओं की तरह चलते-चलते
ग़रीब ख़ुद पर भी चला देता है
दो-चार लाठी
चलते-चलते एक जोड़ी सस्ते चप्पल की तरह
ग़रीब ख़ुद ही घिस जाता है।

धनी यह सब कुछ नहीं चलाते हैं
धनी सिर्फ़ देश चलाते हैं
जिसमें पहिए नहीं होते हैं।


दुर्गा प्रसाद पंडा सुपरिचित भारतीय कवि-लेखक हैं। वह ओड़िया और अँग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। उनसे और परिचय तथा सुजाता शिवेन के ही अनुवाद में उनकी कुछ और कविताएँ पढ़ने के लिए यहाँ देखिए : निरंतर भारी होती जाती है हमारी पृथ्वी

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