सीमस हीनी की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज

सीमस हीनी

अगरौटा*

गोल अगरौटे पे
खींच दीं उलझी गझिन रेखाएँ किसने,
बालियाँ अनाज की जैसे
और ये दाँते? कड़े नाख़ून-से निकले?
घोंप देना चाहते हो कोई पैना टूटा काँच गोया, कलेजे में
सहे ही क्यों भला मक्खन मुलायम, यह कठोर काठ बीचोबीच सीने पर

खा लिया था एक बाली तोड़ कर एक बार छुटपन में
तब से जैसे कि कटनी कर रहा हँसिया-सा गले में,
खेत में पक्की फ़सल कोई खड़ी जैसे
धार हँसिया गड़ गई है और अंदर नोंक, सब छिलता रहा
खाँस कर, फिर खाँस कर, फिर खाँसते उगला अड़ा टुकड़ा

अब ज़रा-सी साँस आई—आह! स्वर्ग की साँसें,
हुआ चंगा
निहारूं बाली के टुकड़े,
अगाथा देखती है उस नुकीले अवशेष को
कि जिससे हत हुई थी।

*अगरौटा : बक्सर, शाहाबाद क्षेत्र में ठेकुआ के साँचे को कहते हैं। यह लकड़ी का बना होता है। कवि के इलाक़े में जो बटरप्रिंट है, वह मक्खन का साँचा है।

एक कॉल

“बस अभी उन्हें बाहर से बुलाती हूँ, रुकना ज़रा”
—उसने कहा
‘‘दरअस्ल, मौसम यहाँ इतना अच्छा है कि
बस मौक़ा मिलते ही निराइ-गुड़ाई में लग गए’’

तो मैंने देखा कि
वह हाथ और घुटनों के बल कटनी मशीन के बग़ल झुके
एक-एक डंडी को, जाँच-परख कर अलगा रहे थे
जो भी ठीक से खिला नहीं था या कमज़ोर रह गया था
या पत्ते नहीं उग पाए थे जिन पर
उन सब छोटे-मोटे पौधों को काट कर ख़ुशी-ख़ुशी फेंक देने में लगे
हालाँकि थोड़े अफ़सोस के साथ भी…

तभी मुझे एहसास हुआ कि
हॉल की घड़ियों की टिक-टिक की भारी आवाज़
और कई गुना भारी होकर गूँज रही है
पेंडुलम धूप में चमक रहे हैं
चुप पड़े आईने में फ़ोन अकेला इंतज़ार कर रहा है

और तब मैंने ख़ुद को सोचते हुए पाया :
कि अगर वे दिन आजकल की तरह होते तो
मौत हर आदमी को ठीक इसी तरह बुलाती।

आगे उसने जो भी बोला
मैंने तपाक से बस कह ही दिया
प्यार है मुझे तुमसे।

कह आओ

अब जाओ, भूत की तरह दौड़ कर भागो बरख़ुरदार!
कह आओ अपनी माँ को
ख़ुशी का एक बगूला उड़ा दें
कि मेरे मन में हुलास भरने को—
और मेरी इस टाई की गाँठ बाँध दें।

लेकिन मालूम है मुझे वह अब भी ख़ुश थे
जब मैं अपनी जगह से हिला नहीं तो
झेल गए
वह मुस्कान जिसने मात दे दी थी
उनकी मुस्कुराहट को
और उनके बेतुके काम को
शायद अब वह अगली चाल का इंतज़ार कर रहे थे।

खुदाई

तनी हुई बंदूक़ की मानिंद
मेरे अँगूठे और उँगली के बीच तत्पर—तैनात
ये नन्ही फ़ौलादी क़लम

पथरीली ज़मीन को चीरते कुदाल की
खड़खड़ाती आवाज़
खिड़की से साफ़ सुनाई देती है
देखता हूँ उस तरफ़ तो
खुदाई में लगे हैं मेरे बाप

आलू की क्यारियों में तने हुए उनके पुट्ठे
झुकते ही चले गए—नीचे और नीचे
जहाँ लगे थे वह खुदाई में।

आलू खोदते खुरपे से
निकलते चले आए बारी-बारी
एक पर एक
एक लय में बीसों साल

घुटनों के पीछे कुदाल की बेंट
टेक लगाए भिड़ा था पूरे दम-ख़म से
खुरदुरे बूट जमे थे पूरी ताक़त से अपनी जगह
कुदाल की चमकती फ़ाल से
अंदर जड़ तक मारते
उखाड़ डाले उन्होंने सब के सब बड़े लंबे डंठल

फैलाते नए आलू की फ़सल चारों ओर
जिन्हें उठा कर अपने हाथों में
महसूस करते थे हम
उनकी नर्म ठंडी शक्लें
और सख़्त आकार

क़सम से क्या ही कमाल
चलाते थे वह कुदाल
ठीक अपने बाप की तरह

इस लिसड़ाते पंकिल इलाक़े में,
पूरे जवार में, किसी और किसान से
ज़्यादा खुदाई कर डालते थे
मेरे बाबा एक दिन में

एक बार मैं उनके लिए
कागज़ से जैसे-तैसे फँसाए
ढीले-ढाले ढक्कन से बंद
एक बोतल में
दूध लेकर गया
घूँट भरने भर को वह सीधे हुए
और फिर जुट गए खेतों में
एक-एक परत काटते-छाँटते-उलीचते
कंधों के ऊपर से
पीछे को फेंकते
ही चले गए,
एक ही साँस में
जब तक खोज ही न डाली
खेती के लिए मनमुआफ़िक़ मिट्टी

अब मेरे माथे में उग आए
ताज़ी पक्की चोट लिए
कुदाल की धार लगे
सजीव जड़ों से
चेथराए आलुओं की कच्ची गंध
घुसती है नथुनों में
फचफचाते पतवार,
चफ़नाए डाढ़ियों-पत्तियों की चपर चपर
सुन पड़ती है।

लेकिन नहीं है मेरे पास
उनके रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए
कोई कुदाल या खुरपा

बस ये नन्ही फ़ौलादी क़लम
टिका है मेरे अँगूठे और उँगली के दरमियान
करूँगा मैं अब खुदाई इसी से।

Digging

शुरुआती शब्द

सुबह की नदी का पानी जैसे—
गंद से भभकता, भलभल बह उठता है
आवरण और आमुख के—
तो शुरुआती शब्द तो मलिन हो गए।

अतल चेतना की गहराइयों से
उबर आए अर्थ-रस की बूँद-बूँद ही मेरा अमृत है
जिसे पीता है उन्मुक्त पंछी,
सोखता है ठोस पाषाण,
हरी घास गटकती रहती है।

बहते चले जाने दो सब कुछ
अग्नि तक, जल तक, भूमि तक, वायु तक
जाने दो उन चारों तक सब कुछ।

स्मृति-स्तंभ

दुनिया में जो भी पोथियों में मुकम्मल तौर से दर्ज था
वह सब काफ़ूर हो गया
पत्थरों पर लिखी इबारतें आसमान तक सिर उठाए
खंभों की शक्ल में तिरछे अड़े शब्द,
किसी कहानी में स्मृति-स्तंभों की तरह खड़े हुए-से

वर्जिन के उस पवित्र तीर्थ से एक ज्योति उठी
और लोरेटो की पहाड़ी पर जा बैठी
ऊँघती आस्थाओं के धुँधलके में
अपनी आँखें खोलता हूँ
कि आख़िर क्या बचाए रखता है सच को
यहाँ से वहाँ तक ले जाते हुए पार्थिव शब्दों को रूहानी मानी बख़्शता।


सीमस हीनी (1939–2013) संसारप्रसिद्ध आयरिश कवि हैं। वर्ष 1995 में उन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी यहाँ ‘खुदाई’ शीर्षक कविता को छोड़कर शेष कविताएँ अँग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद करने के लिए उनके कविता-संग्रह The Spirit Level से चुनी गई हैं। सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज हिंदी कवि-लेखक और अनुवादक हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : बातों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा

2 Comments

  1. सतीश जुलाई 10, 2021 at 8:56 पूर्वाह्न

    हिंदी में अनुवाद करने के लिए आपका आभार।

    Reply
  2. Anshuman जुलाई 10, 2021 at 2:54 अपराह्न

    शब्दो का चयन अदभुत🙏🙏

    Reply

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